सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
अष्टादशः सर्गः २०३ गृहे गृहे माथुरकामिनीनां मुखाम्बुजेभ्यश्चरितं मुरारेः । आकर्णयन् कंसवधादिवृत्तमस्यां जनो ह्यस्तनमेव वेद ॥४०॥ घर-घर में मथुरा की स्त्रियों के मुख-कमलों से भगवान् श्रीकृष्ण का कंसवध आदि चरित्र सुन कर लोग उसे कल ही हुआ समझते हैं ॥४०॥
अश्मन्ततीर्थं स कृती जगाम यत्र स्थितो दानपतिः प्रतीतः । अज्ञानजान्ध्यं विजहौ जलान्तर्मग्नोऽपि दामोदरवैभवेन ॥४१॥ पुण्यात्मा राव सुर्जन फिर अश्मन्त तीर्थ पहुँचे जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से अक्रूर ने (यमुना के) जल में निमग्न होकर भी (जड़ता अर्थात् मूर्खता में निमग्न होकर भी अथवा जड़ पदार्थों में आसक्त होने पर भी) अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को दूर कर दिया था ॥४१॥
वसन्तमुख्यैः समयैः स्वभावविरोधमुद्वास्य परस्परेण । निषेव्यमाणं युगपन्नृपोऽसौ वृन्दावनं पावनमन्वविन्दत् ॥४२॥ फिर राव सुर्जन उस [...] तीर्थ में पहुँचे जहाँ वसन्त आदि छहों ऋतुयें परस्पर विरोध छोड़ कर एक साथ रहती [...] द्वारा से [...]
स्मरस्य सेव[...]न्वशेषितश्रीर्वयसा नवेन । यत्कुञ्जभूमिर्भगवान् मुकुन्दः कृतार्थयामास पदार्पणेन ॥४३॥ काम[...] करने का अवसर देने वाले नवयौवन के कारण विशेष शोभा वाले भगवान् श्रीकृष्ण[...] वन की कुञ्जभूमि को अपने चरणारविन्दों के स्पर्श से धन्य बनाया था । (जैसे [...]म-पुत्र कामावतार प्रद्युम्न भगवान् के चरणों की सेवा करते थे, उसी प्रकार स्वयं कामदे[...] महायोगेश्वर के चरणों में ही लोटता रहता था ) ॥४३॥
[...] यत्र सनाथयन्तः शिखण्डिनामुन्मदताण्डवानि । [...]भिरूर्ध्वीकृतकण्ठनादा जगुर्मरालाश्च वनप्रियाश्च ॥४४॥ वृन्दावन में मोरों के मादक नृत्य का निरन्तर साथ देने के लिये कोयल और हंस, परस्पर स्पर्धा से, अपने कंठस्वर को ऊँचा करके गाया करते हैं ॥४४॥
(४३) स्मरस्य कामस्य कामावतारप्रद्युम्नस्य च । कामोऽपि श्रीकृष्णस्य पदाम्बुजमेव आश्रयति स्म । तदुक्तं श्रीमद्भागवते (१०-३३-२०) 'रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया' इति, 'यत्पादपंकजपरा- गनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः । स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः ॥' (१०-३३-३५) इति च ।
२०४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मनोजमौर्वीरवमेदुरेण क्वचिद्द्विरेफावलिहुङ्कृतेन । क्वचिच्च षड्जस्वरपारगानां केकाभिराकारितमन्मथाभिः ॥४५॥ विलासिनीशंसितपेशलाभिः क्वचित् पिकालीमृदुकाकलीभिः । अन्योन्यरागादनुबन्धिनीभिः क्वचित् कथाभिः शुकसारिकाणाम् ॥४६॥ रतप्रवृत्तोन्मदसारसाक्षीसाकूतकण्ठध्वनिकोमलेन । आकर्षता संयमिनोऽपि चेतः क्वचित् कपोतीघनघूत्कृतेन ॥४७॥ नृत्यत्तभ्रू रशनानिनादहृद्यैः क्वचित् सारसकण्ठघोषैः । नितम्बिनीनूपुरशिञ्जिताभैर्मरालयूनां निनदैः क्वचिच्च ॥४८॥ दात्यूहपारावततित्तिरीणां प्रत्यूहशून्यप्रतिनादभाजाम् । कोलाहलेन क्वचिदादधानं मनो जनस्य श्रवणैकतानम् ॥४९॥ कहीं पुष्पधन्वा कामदेव की धनुष-प्रत्यञ्चा की टंकार क समान मनोहर, भ्रमरों की गूँज सुनाई दे रही है। कहीं षड्ज स्वर के पारगामी विद्वान् मोरों की कामदेव को बुलाने वाली केका ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं विलासिनी कामिनियों की प्रणय-कथा के समान चतुर, कोयलों की कूकें श्रवणगोचर हो रही हैं। कहीं परस्पर अनुराग का अनुसरण करने वालीं, तोता मैना की प्रणयकथायें हो रही हैं। कहीं सारस के समान लाल नेत्रों वाली सम्भोग में उन्मत्त रमणी के साभिप्राय रति-कूजित के समान मृदु तथा संयमी पुरुषों के भी चित्त को आकर्षित करने वाले कबूतरियों के गहरे घूत्कार सुनाई दे रहे हैं। कहीं नृत्य करती स्त्रियों की रशना (करधनी) के स्वरों के समान मनोहर सारस पक्षियों के कंठस्वर और नितम्बिनी सुन्दरी (नर्तकी) के घुंघरुओं के शब्दों के समान सुन्दर, युवक हंसों के निनाद सुनाई पड़ रहे हैं। कहीं दात्यूहों (नीले कंठ वाली चिड़िया), कबूतरों और तीतरों का निर्विघ्न प्रतिध्वनि से प्रपूरित कोलाहल सुनाई दे रहा है। इन विविध शब्दों के कारण वृन्दावन में जाने वाले पुरुष का मन पूर्णतः ही एकाग्र हो जाता है ॥४५-४९॥ विचित्रकल्पद्रुमवेदिभाजां नानामणीनां खचितैर्मयूखैः । यत्रार्कपुत्री वलयिप्रवाहा बलद्विषश्चापरुचिं बभार ॥५०॥
- विचित्र कल्पवृक्षों की वेदी पर स्थित नाना प्रकार के मणियों की किरणों की परम्परा से यमुना, अपनी भँवर के कारण, इन्द्रधनुष की शोभा धारण कर रही थी ॥५०॥ मुरजिन्मुखवीजितस्य वेणोः कलगीतामृतनिम्नगानि मग्नाः । जगदुत्तरतां जगाहिरै ता हरितो हेलिसुतासमीपभाजः ॥५१॥ यमुना के पास की दिशायें, भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से बजाई गई बाँसुरी के मनोहर गीत रूपी अमृतनदी में डूब कर संसार में अलौकिक लग रहीं थीं ॥५१॥ (४७) यथोक्तं—‘कान्ते तथा कथमपि प्रथितं मृगाक्ष्या चातुर्यमुद्गतमनोभवया रतेषु। तत्कूजितान्यनु- वदद्भिरनेकवारं शिष्यायितं गृहकपोतशतैर्यास्याः ॥’ इति । (४५-४९) श्रीमद्भागवते (३-१५-१८) उक्तं—"पारावतान्यभृतसारसचक्रवाकदात्यूहहंसशुकति- त्तिरिबर्हिणां यः। कोलाहलो विरमतेऽचिरमात्रमुच्चैर्भृङ्गाधिपे हरिकथामिव गायमाने ॥" इति ।
अष्टादशः सर्गः २०५ अवलम्ब्य कदम्बशाखिमूलं चिरमुल्लासितचारुचिल्लिवल्लिः । अहरत् कुतुकेन यत्र गोपीर्मुरलीकूजितकौशलेन कृष्णः ॥५२॥ इस वृन्दावन में कदम्बवृक्ष के तने का सहारा लेकर 'चिल्लि' नामक लताओं को झुमाते हुये भगवान् श्रीकृष्ण अपनी वंशीध्वनि के कौशल से गोपियों (के हृदयों को यों ही) हर लेते थे ॥५२॥ यस्य स्मृतावपि सपत्नतिरस्कृताया निःसीममम्बरमभूद् द्रुपदात्मजायाः । यत्राम्बराणि स लसत्कलसस्तनीनामस्तेनयद् विकचनीपवनीविलासी ॥५३॥ दुर्योधन दुःशासन आदि शत्रुओं द्वारा अपमानित द्रौपदी का वस्त्र, जिनके स्मरणमात्र से, सीमारहित बन गया, इस वृन्दावन के विकसित कदम्ब-कुञ्जों में विलास करने वाले उन भगवान् श्रीकृष्ण ने भी यहाँ कलशों के समान सुन्दर स्तनों वाली गोपियों के वस्त्र चुराये ॥५३॥ रासोत्सवे मण्डलिकाविलासमुपेयुषि प्रेयसि वल्लवीनाम् । भानूद्भवाया भ्रमिभङ्गभाजो विलुप्तमद्यापि न यत्र चिह्नम् ॥५४॥ जब गोपियों के प्राण भगवान् श्रीकृष्ण स्थल पर मंडल बना कर रासलीला करने के बाद गोपियों के साथ यमुना में वारिविहार के लिये उतरे, तब यमुनाजल में रासलीला का जो मंडल बना उस मंडलाकार चिह्न को आज भी यमुना अपनी भँवरों के रूप धारण कर रही है और वह चिह्न आज तक [विलुप्त नहीं हुआ] ॥५४॥ आकीर्य र... निकुञ्जकेलीशयनानि सायम् । गायन्ति यस्मि... द्वन्द्वानि नित्यं वनदेवतानाम् ॥५५॥ (इस वृन्दावन के क... सायंकाल कुञ्ज में भगवान् श्रीकृष्ण की रतिशय्या पर मनोहर पुष्प फैला कर) वनदेवताओं के मिथुन नित्य भगवान् के प्रशस्त चरितों का गान करते हैं ॥५५॥ ...हितधियां शमिनां समन्तादुल्लासितं मुररिपोर्ललितैः पदाङ्कैः । ...ने सुकृतकौतुकवर्धनं तं शैलं जगाम स यशोधनसार्वभौमः ॥५६॥ [यशस्वियों के सम्राट् राव सुर्जन उस पुण्य-वर्धन गोवर्धन पर्वत पर गये जो चारों ओर भगवान् श्रीकृष्ण के सुन्दर पदारविन्दों के चिह्नों से कृतार्थ हुआ था जिनका ध्यान विशुद्ध बुद्धि वाले मुनिजन किया करते हैं ॥५६॥ ...त्रपदमूयुषि तीव्रवृष्टिमूर्च्छत्सवत्ससुरभीकुलजीवनाय । ...वस्य गोपवपुषो विभराम्बभूव बाहुर्महेन्द्रमणिनिर्मितदण्डलक्ष्मम् ॥५७॥ (इन्द्र के कोप से होने वाली) भयंकर वर्षा के कारण व्याकुल बछड़ों, गायों (और गोप- गोपियों) के समूह की जीवनरक्षा के लिये जब गोवर्धन पर्वत छत्र बना, तब गोपवेशधारी भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ ने उज्ज्वल नीलम मणियों से निर्मित छत्रदंड की शोभा धारण की ॥ ५७ ॥ (५२) चिल्लिः लताविशेषः । (५४) श्रीमद्भागवते (१०-३३-२४)—'सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः प्रेम्णेक्षितः प्रहसती- भिरितस्ततोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः ॥' इति ।
२०६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
तिरोहिते कौतुकतो मुकुन्दे तदङ्गसंसर्गविशेषहृद्यैः । यद्धादुरागैर्विहिताङ्गरागा दधुः स्वजीवं व्रजनीरजाक्ष्यः ॥५८॥ (रासलीला के समय) जब भगवान् श्रीकृष्ण कौतुकवश अन्तर्धान हो गये तब उनके अंगों के संसर्ग के कारण विशेष रूप से मनोहर, गोवर्धन पर्वत के गेरु आदि का अपने शरीर पर लेप करके व्रज की कमलनयनी गोपियों ने अपने प्राण धारण किये ॥५८॥
अथ घनजलधारारुद्धदिक्चक्रवालं तिमिरतिमिगभीरं मग्नसोमार्कबिम्बम् । हुतवहमनिवार्यं वारिरन्तर्दधानं समजनि घनवीथीमण्डलं सिन्धुकल्पम्॥५९॥ उसके बाद वर्षा ऋतु के कारण बादलों का समूह समुद्र के समान शोभित हुआ—वह घनी जलधाराओं से दिशाओं का मंडल व्याप्त कर रहा था, अन्धकार रूपी मगरमच्छों से गहरा लग रहा था, सूर्य और चन्द्र उसमें डूब जाते थे और वह जल में अनिवार्य अग्नि (बिजली; बड़वानल) छ
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अष्टादशः सर्गः २०७ पवनेन पुरोभवेन भूयो मधुराभिर्नवनीरधोरणीभिः । तपतीव्ररविप्रतापद्ग्धा वनराजीरदजीवयद् वनश्रीः ॥६४॥ वनलक्ष्मी ने ग्रीष्म के प्रचंड सूर्य के ताप से जली हुई वन की पंक्तियों को पुरवाई हवा से और नवीन जल की मधुर धाराओं से फिर जिला दिया ॥६४॥ चिरान् निवृत्तस्य घनागमस्य गाढोपगूढेन हरिद्वधूनाम् । हारा निपेतुश्छिदुरा विदूरात् पयोधरेभ्यः करकामिषेण ॥६५॥ बहुत समय बाद प्रवास से लौटे हुये वर्षा-काल द्वारा दिग्वधुओं का गाढ़ आलिंगन करने पर उनके पयोधरों से (बादलों से; स्तनों से) हारों के मोती टूट टूट कर ओलों के बहाने गिरने लगे ॥६५॥ सुहृदः समुपागतान् पयोदान् स्मृतनन्दात्मजदेहकान्तिपूराः । ददृशुः स्रवदस्रवः कथञ्चिद् बत वृन्दावनवासिनो मयूराः ॥६६॥ वृन्दावनवासी मोर, समीप आये हुये मित्र मेघों की ओर, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर की कान्ति के स्मरण में लीन होने के कारण, आँसू बहाते हुये, किसी प्रकार, देख सके ॥६६॥ बर्हेण येषां विदधेऽवतंसं कंसस्य शत्रुः स्वयमुज्झितेन । कलापिनः प्रे[म्णार्द्रने]त्रास्ते विलोकयन्ति स्म घनं सबाष्पाः ॥६७॥ कंसशत्रु भगवान् श्री[कृष्ण] द्वारा भी स्वयं गिरे हुये पंख को अपने सिर का आभूषण बनाते थे, वे (वृन्दावनवासी) [मोर प्रेमार्द्र नेत्र] कर, (घनश्याम के समान) मेघ की ओर, आँस बहाते हुये, देखने लगे ॥६७॥ विनापि बाणं रविलम्ब्य तावदिन्द्रायुधं निर्गुणमप्यनङ्गः । संमोहयद् विश्वमनन्यतन्त्राः काङ्क्षन्ति सिद्धौ न तु हेतुमन्यम् ॥६८॥ अ[नङ्ग (कामदेव)] ने निर्गुण (ज्यारहित) इन्द्रधनुष से ही, बिना बाण चलाये, सारे संसार को मोह[कर दिया। वास्तव] में स्वतन्त्र पुरुष कार्यसिद्धि के लिये अन्य हेतु की अपेक्षा नहीं रखते ॥६८॥ कादम्बि[नी...] भुजङ्गजाया प्राणान् पिपासुः पथिकप्रियाणां । ऊर्ध्वां[...ऽ]म्भोदफणा सनादं व्यलोलयद् विद्युतमग्रजिह्वाम् ॥६९॥ काल[...]-की पत्नी मेघमाला, विरहिणियों के प्राणवायु को पीने के लिये (सर्पों को पवनशन[...]) है), अपने काले बादल रूपी फण को फैला कर (मेघगर्जन के बहाने) फुँफ- कारती हुई, बिजली रूपी तेज जीभ हिलाने लगी ॥६९॥ विलुप्तमर्यादमुदीरितैर्जलैर्भग्नास्तटस्था अपि मेदिनीरुहाः । [किं] न कुर्वन्त्यसमञ्जसं गताः परां विवृद्धिं तरला हि निम्नगाः ॥७०॥ चपल नदियों ने बरसाती पानी से अत्यधिक बढ़ कर तथा मर्यादा छोड़ कर, अपन बाढ़ के जल से तट पर स्थित वृक्षों को भी उखाड़ फेंका ; वास्तव में नीच पुरुष, जो स्वभाव से ही चंचल हों, यदि भाग्यवश अत्यन्त समृद्ध बन जाँय, तो अपनी मर्यादा खो कर तटस्थ पुरुषों को भी कष्ट देते हैं और क्या क्या उलटी बातें नहीं कर बैठते ? ॥७०॥
२०८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पुर एव नीपपवनोतिदारुणोऽदलयद् वियोगिमिथुनानि मर्मणि । किमुत प्रफुल्लनवचारुमालतीपरिरम्भसम्भृतविशेषसौरभः ॥७१॥ कदम्बों से सुगन्धित पवन ने, पहले ही भयंकर बन कर, वियोगी मिथुनों को मर्मान्तिक पीड़ा दी और जब वह नव विकसित मनोहर मालती का आलिंगन करके विशेष सुरभित हो गया, तब तो उसकी बात ही क्या ! ॥७१॥ घनान्धकारेष्वपि वीतशङ्कं ययुः प्रियं कुङ्कुमगौरगात्र्यः । अनारतोद्दामवितायमानसौदामिनीदामनि लीनदेहाः ॥७२॥ अभिसारिकायें, अपने गोरे शरीर पर केसर का लेप करके, निरन्तर वेग से चमकने वाली बिजलियों की आभा में अपने शरीरों को एक करती हुई, गहरे अन्धकार में भी, निःशंक होकर, अपने प्रियतमों के पास चली गईं ॥७२॥ आस्वाद्य जम्बूरसमन्यपुष्टश्चकूज यद्गर्जिति तोयवाहे । भेरीमुखे भाङ्कृतिभाजि तन्त्रीक्विक्वाणवत् तद्द्वितयं बभूव ॥७३॥ जामुन का रस पीकर कोयल, मेघ के गरजने पर भी, कूकने लगी; मेघ की गर्जना के साथ कोयल की कूक ऐसी लगी जैसे नगाड़े की ध्वनि के साथ वीणा का (मंजु) स्वर हो ॥७३॥ निर्जीवं विरहिगणं करोतु कामं निर्जी[वोऽयमवन्ध्य] चापः । आश्चर्यं यदमृतवृष्टिरब्दकीर्णा पा[न्थानामत्ति] दीर्घमायुः ॥७४॥ निर्जीव (ज्यारहित) इन्द्रधनुष यदि विरही व्यक्त्यि[ों को निर्जी]व (जीवनरहित) बनाये तो आश्चर्य नहीं है, किन्तु इसका आश्चर्य अवश्य है कि मेघों से बरसने वाली अमृतवृष्टि (जल- वृष्टि) भी विरही पथिकों की दीर्घ आयु को खा रही है ! ॥७४॥ नभसि सान्द्रतमःस्पृशि विश्वदृङ्मुषि तमोमणयः स्फुरिता[...] घनघट्टविकुट्टितचन्द्रमःप्रकटरेणुनिभाः परिबभ्रमुः ॥७५॥ घने अन्धकार से व्याप्त आकाश के संसार की दृष्टि को हर लेने [पर] चमकने वाले खद्योत (जुगनू) ऐसे लग रहे थे मानों बादलों की (गरजने वाली) चक्की में पिस गये [चन्द्रमा] के कण हों ॥७५॥ द्युमणिकनकगोले तोयदाङ्गारगर्भे कुलिशकृतहुताशे प्रावृषा धम्य[माने] । प्रबलपवनवेगात् सर्वतः सारितार्चिःप्रततिरचिररोचिर्व्याजितो जृम्भते स्म ॥७६॥ वर्षाकाल रूपी सुनार चन्द्रमां रूपी सोने के गोले को बादल रूपी कोय[लों] के बीच में रख कर वज्ररूपी आग में प्रबल पवन के वेग से धौंक रहा है जिससे बिजली रूपी ज्वा[ला चा]रों ओर उठ रही हैं ॥७६॥ (७४) निर्जीवो ज्यारहितः । अब्दकीर्णा मेघमुक्ता । अमृतवृष्टिः जलवृष्टिः । (७५) तमोमणयः खद्योताः ।
२७ अष्टादशः सर्गः २०९ घनतमसि विलीने सोमसूर्यप्रसङ्गे जगति जलनिमग्ने कैरवे पङ्कजेऽपि । विरगमनुभवन्ती सङ्गमं च स्वभर्त्रा रजनिदिसवभेदं चक्रवाकी विवेद ॥७७॥ चन्द्र और सूर्य के बादलों के घने अन्धकार में छिप जाने पर तथा कुमुद और कमल के जल में डूब जाने पर, अपने पति का वियोग और संयोग अनुभव करने वाली चकवी ही रात और दिन के अन्तर को जानती थी ॥७७॥ प्रावृड्वल्ली जलधरदलस्यान्तरे द्योतिताशं विद्युद्दन्त्याजात् कुसुमनिकरं यत् करालं बभार । तस्योद्रिक्तं समजनि फलं हन्त ! तत्कालमेव प्राणत्यागो रमणविरहव्याकुलानां वधूनाम् ॥७८॥ वर्षा ऋतु रूपी लता ने मेघ रूपी पत्तों में बिजली रूपी भीषण और चमकीले पुष्प-समूह को धारण किया जिसमें शीघ्र ही प्रियतमों के विरह से व्याकुल रमणियों का प्राणत्याग रूपी बड़ा फल लगा ॥७८॥ गुरुध्वानेनैव प्रतिनगरमध्वन्यसुदृशां [जनयंश्च] दूरो मूर्च्छां सपदि कृतकृत्योऽपि कुतुकात् । व्यपेतज्या[चापा]मपि शर्बलभिदो [शो]भाद् वपुषि विभरामास मुदिरः ॥७९॥ कामदेव का मित्र मेघ भयंकर गर्जना से ही प्रत्येक नगर में विरहिणी स्त्रियों को मूर्च्छित करके यद्यपि कृतकार्य हो गया था, तथापि कुतूहलवश अपनी शोभा बढ़ाने के लिये उसने प्रत्यञ्चारहित इन्द्रधनुष को शरीर पर धारण किया ॥७९॥ [अथ] नरपतिवर्यः प्रावृषं यापयित्वा यदुपतिपदलक्ष्म्याऽलङ्कृतासु स्थलीषु । नभसि [परिरिक्ते] मुक्तनिद्रे मुकुन्दे प्रमथपतिनगर्याः सेवनाय प्रतस्थे ॥८०॥ इस[प्रकार] राजाओं में श्रेष्ठ सुर्जन, भगवान् श्रीकृष्ण की पद-लक्ष्मी से अलंकृत स्थानों में (वृन्दा[वन] आदि में) वर्षा ऋतु बिता कर आकाश के मेघरहित हो जाने पर और भगवान् विष्णु के जाग जाने पर (देवोत्थापिनी एकादशी के बाद) भगवान् शिव की काशी पुरी का सेवन करने के लिये रवाना [हुए] ॥८०॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये अष्टादशः सर्गः (७९) मुदिरो मेघः।
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
एकोनविंशतितमः सर्गः नीत्वा दिनानि कतिचित् पथि कौतुकेन तीर्थानि पावनतमानि निषेवमाणः । स्वर्वाहिनीथमुनयोः प्रमना मनोज्ञं सम्भेदमप मकरस्पृशि चण्डभानौ ॥ १ ॥ प्रसन्न राव सुर्जन, मार्ग में, कुतूहलवश, पवित्रतम तीर्थों का सेवन करते हुये, कुछ दिन बिता कर, (माघ महीने में ) मकरसंक्रान्ति के समय गंगा और यमुना के सुन्दर संगम पर (प्रयाग) पहुँचे ॥ १ ॥ यस्मिन् बबन्ध सुषमाम्रविन्दबन्धोः पुत्री समेत्य सुरलोकतरङ्गवत्या । निर्यद्विमुक्तविशदच्छविकञ्चुकार्धा पापावलीकवलने प्रसुतेव सर्पी ॥ २ ॥ संगम में सूर्यपुत्री यमुना भगवती गङ्गा से मिल कर इस प्रकार सुशोभित हो रही है मानों पाप-समूह को निगलने के लिये बढ़ने वाली साँपिन हो जि[सके शरीर से] चमकती हुई केंचुल आधी उतर
एकोनविंशतितमः सर्गः २११ वारां भ्रमे कमलवल्लभकन्यकायाः पाथः क्वचिन्मिलितमम्बरशैव लिन्याः । आभासते स्म शतपत्रमिवावदातं नाभीह्रदान्तरगतं पतगेन्द्रकेतोः ॥ ६ ॥ और कहीं पर यमुना की भँवर से गंगा की लहर मिल कर इस प्रकार सुशोभित हो रही है जैसे भगवान् विष्णु की नाभि में लगा हुआ श्वेत कमल हो ॥ ६ ॥ निर्वर्त्य कृत्यमुचितं रुचिरं च तत्र दानं स दानवरिपौ विनिवेशितात्मा । तप्त्वा तपांसि तपसि प्रसितो यशोभिर्विश्वेशदर्शनसमुत्कमनाः प्रतस्थे ॥७॥ भगवान् विष्णु में मन लगाने वाले राव सुर्जन प्रयाग के त्रिवेणी संगम में उत्तम दान देकर और उचित कार्य समाप्त करके तथा तप करके यश से शुभ्र बने हुये, भगवान् विश्वनाथ के दर्शन की उत्कंठा के कारण काशी की ओर रवाना हुये ॥ ७ ॥ 'निःश्रेयसश्रिय उदार विहारभूमिः सौभाग्यसिद्धिरखिलावनिमण्डलस्य । प्राप्ता प्रिया पुररिपोरथ पार्थिवेन वाराणसी सुकृतसारभूतामुपास्या ॥८॥ इसके बाद राव सुर्जन भगवान् विश्वनाथ की प्रिय नगरी काशी पहुँचे, जो पुण्यात्मा पुरुषों द्वारा सेव्य ह, जो समस्त भूमंडल की सौभाग्यसिद्धि है और जो मोक्ष-लक्ष्मी की उदार विहार- भूमि है ॥ ८ ॥ आनन्दसान्[...]ङ्गमन्तःप्रसादविशदाननमीशमुख्याः । गोपाल इत्य[...] व्यासोऽवदत् विदिततीर्थवरप्रभावः ॥९॥ [...]तीर्थ श्रेष्ठ वाराणसी [...]ले राजपुरोहित गोपाल व्यास ने आनन्द के कारण होने वा[ले] घने रोमांच से यु[...]ङ्ग वाले और हृदय की प्रसन्नता के कारण खिले हुये मुख वाले राजा स[...] से इस प्रका[र] निवेदन किया ॥ ९ ॥ [...]लतमेघघटाविमुक्तमर्यादसागरजलेऽपि न या निमज्जेत् । [...]पयति कल्पसमीरणोऽपि याऽपेक्षते क्वचन नापि गुणाभियोगम् ॥१०॥ [...]तारयत्यखिल[...]तरमन्तरेण यत्रेश्वरः सपदि दक्षिणकर्णधारः । दुष्पार[...]महार्णवलङ्घनाय काऽप्यीयमायतिमती तरणिर्नराणाम् ॥११॥ यह क[...] जो प्रलय काल
२१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आरोहतः कुतुकतो रजनीष्वमुष्याः प्रासादशैलशिखरं शशिशेखरस्य । सद्यस्तिरोहितशिरःस्थितबालचन्द्रः पूर्णः कलानिधिरुपैति किरीटभावम्॥१२॥ जब (पूर्णिमा को) रात में कुतूहलवश भगवान् शिव इस काशी के विशाल महल के शिखर पर चढ़ते हैं तब (आकाशस्थित) पूर्ण चन्द्र, भगवान् के मस्तक पर विराजमान बालचन्द्र को ढक कर स्वयं किरीट बन जाता है ॥१२॥ निर्मथ्य नोरनिधिमुद्धतमादितेयाः पीत्वाऽमृतान्यपि भयं मुमुचुर्न मृत्योः । मृत्युः स्वयं प्रवितरत्यमृतं यदस्यां कीटोऽपि येन सुतरामकुतोभयः स्यात् ॥१३॥ देवों ने समुद्र को अत्यन्त वेग से मथ कर अमृत पिया, फिर भी उन्हें मृत्यु के भय से छुटकारा नहीं मिल सका, किन्तु इस काशी में स्वयं मृत्यु अमृत बाँटती है जिस कारण तुच्छ कीड़ा भी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। (काशी में मरने वालों की मुक्ति हो जाती है।) ॥१३॥ आख्याय कर्णपदवीमनुजन्मभाजां मन्त्रं मृगाङ्कमुकुटः किल तारकाख्यम् । आश्चर्यमत्र भगवान् गुरुरप्यदम्भमात्मानमन्तसदि सादरमर्पयेद् यत् ॥१४॥ काशी में मरने वालों के दाहिने कान में स्वयं भगवान् शिव तारक मंत्र सुनाते हैं और आश्चर्य है कि भगवान् शिव, गुरु होकर भी, अपने आपको सर्वतोभावेन उस शिष्य को सादर अर्पण कर देते हैं ! (लोक में तो जब शिष्य अपने आपको सर्वतोभावेन गुरु को सादर अर्पण कर देता है तब गुरु उसे मंत्रोपदेश देते हैं, किन्तु यहाँ भगवान् शि[व...] अपने आपको शिष्य को अर्पण कर देते हैं अर्थात् उसका भवबन्धन छुड़ा क[...] देते हैं) ॥१४॥ ज्योतिर्मयो जयति पञ्चमुखस्य पञ्च[...] जगदुज्ज्वलश्रीः । पञ्चत्व
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- 14 - 9 = 5 SYLLABLES!
- And
तनुं द्वितीयाम्= त (1) नुं (2) द्वि (3) ती (4) याम् (5) = 5 SYLLABLES! - Let's check the meter for Quarter 1: -एतामनङ्गदमनस्य तनुं द्वितीयां- 14 syllables! - Let's check Vasantatilaka: -त(--v): एताम -भ(-vv): नङ्गद -ज(v-v): मनस्य (म=v, न=v, स्य=S? Wait, स्य is followed by त, so स्य is S. But न is v. So v v S? Wait: म (v) न (v) स्य (S)? But Vasantatilaka is v - v!
२१४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यत्रोद्भवत्युपरमो भ्रमतो जनस्य यत्र प्रबोधजननी किल दीर्घनिद्रा । अन्तोऽप्यनन्तविभवं वितनोति यत्र यत्रान्धकोऽपि भवति ध्रुवमन्धकारिः ॥२३॥ इस काशी की महिमा अद्भुत है। संसारचक्र में घूमने वाले पुरुष का यहाँ भ्रम (भ्रान्ति ; माया) छूट जाता है; यहाँ मृत्यु भी विशुद्ध ज्ञान को उत्पन्न करती है; यहाँ अन्त होने पर अनन्त वैभव प्राप्त होता है; यहाँ अन्धा भी अन्धक दैत्य के शत्रु शिव के समान बन जाता है ॥२३॥ कल्पान्तकन्दलितताण्डवविभ्रमेण संवृत्य कृत्यनिपुणो निखिलप्रपञ्चम् । अस्यां गुणातिगतनौ सगुणं शरीरं देवो निलीनयति दिव्यधुनीवतंसः ॥२४॥ परमकुशल गंगाधर भगवान् शिव प्रलयकाल में अपना तांडव नृत्य दिखला कर, इस सम्पूर्ण प्रपञ्चात्मक जगत् का संहार करके, अपने सगुण शरीर को गुणातीत शरीर वाली इस काशी में छिपा देते हैं ॥२४॥ यस्मिन्नचिन्त्यविभवे भुवनैकहेतौ ब्रह्माण्डगोलकशतानि परिप्लवन्ते । गङ्गेति बिभ्रदतिपावननामधेयं सोयं पुरः प्रवहते पयसां समूहः ॥२५॥ जिसकी महिमा अनिर्वचनीय है, जो जगत् का एक मात्र कारण है और जिसमें सैकड़ों ब्रह्माण्ड रूपी गोले तैरा करते हैं, वही जलसमूह, अ[तिपावन 'गंगा'] नाम को धारण करके यहाँ बह रहा है। (मनु के अनुसार सबसे पहले ब[्रह्मा ने जल का नि]र्माण किया और उसमें जो जगत् का बीज छोड़ा वही ब्रह्माण्ड बना ।) दृप्यत्त्रिविक्रमपदाक्रमणेन भिन्नब्रह्माण्डभाण्डा[त् ... ] रयात् पतन्तीम् । विश्वस्य पावनकरीं विधुमौलिरिमां स्रग्दामवत् सपदि शेखरयाञ्चकार ॥२६॥ जब वामन भगवान् का बढ़ा हुआ पैर स्वर्ग में पहुँचा तो उसकी ठोकर [से ऊपर] रखे हुये ब्रह्माण्डरूपी भांडे में छेद हो गया और उसमें से (सृष्टि का आदि कारण तथा [विश्व को पवित्र] करने वाला जल-समूह 'गंगा' नाम से वेग से नीचे गिरने लगा, तब भगवान् शिव ने (उनके मस्तक पर पहले से ही (अमृत बरसाने वाला) चन्द्रमा विराजमान [था, अतः] गंगा को उस अमृत वर्षी चन्द्र से भी उत्कृष्ट समझ कर) शीघ्र ही पुष्पमाला के समान अपने [मस्तक का आभूष]ण बनाया। (जब वामन भगवान् ने राजा बलि की दी हुई तीन पैर भूमि नापने [के लिये अ]पना एक पैर स्वर्ग में रक्खा तब ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डलु के जल से उस पैर को पूजा और [वही ज]ल 'गंगा' बन कर तीनों लोकों में बहने लगा ।) ॥२६॥ (२३) दीर्घनिद्रा मृत्युः । 'काश्यां मरणान् मुक्ति' रिति । (२६) वामनो ब्रह्मचारिस्वरूपं धृत्वा यज्ञं कुर्वतो बलेः पदत्रयपरिमाणां भूमिमयाचत [तत]श्च तस्यां उन्मापनाय एकं पदमूर्ध्वं प्रक्षिपतो वामनस्य ब्रह्मलोकं गतं तत् ब्रह्मा स्वकमण्डलुजलेन प्रक्षालितवान् । तदेव जलं गङ्गास्वरूपेण त्रिभुवनं पवित्रयति । तत्र कविनोत्प्रेक्षितं ऊर्ध्वं प्रेरितेन पदेनोपरिस्थितो ब्रह्माण्डकटाहो भग्नस्तदानीं विभिन्नात् कटाहात् जलमुपरिस्थितं गङ्गारूपेण प्रावहत् । ब्रह्माण्डं च कारणजलराशिमध्ये तिष्ठ- तीति 'अप एव ससर्जादौ' इति मानवधर्मशास्त्रे स्थितम् ।
एकोनविंशतितमः सर्गः २१५ तीव्रेण तेन तपसेह भगीरथस्य भाग्येन भूतलजुषामथवाऽवतीर्णा । सोढुं विभोर्विरहखेदमपारयन्ती सेयं पुरीं पुररिपोः परिरभ्य तस्थौ ॥२७॥ यह गंगा भगीरथ के तीव्र तप के कारण अथवा मर्त्यलोक के निवासियों के सौभाग्य के कारण यहाँ उतरी है। अपने स्वामी भगवान् शिव का विरह कष्ट न सह सकने के कारण यह गंगा, भगवान् शिव की नगरी काशी का आलिंगन करके रुक सी गई है (काशी में गंगा बहुत धीरे बहती है। सगर राजा के वंशज भगीरथ अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिये तीव्र तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये थे। इसीलिये गंगा का नाम भागीरथी पड़ा। उस समय स्वर्ग से गिरने वाली गंगा को भगवान् शिव ने अपनी जटा में रोका था। ॥२७॥ प्रागेव पुण्यसलिलाऽथ हरेःपदाम्जं प्राप्ता ततोऽनुपरिपुष्टहरोत्तमाङ्गो । धर्मद्रवी यदि पुनर्मिलितेह काश्यां कोऽस्या महित्वमभिधातुमहोक्षमःस्यात् ॥२८॥ । यह गंगा (ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रहने के कारण) पहले ही अत्यन्त पवित्र जल वाली थी, फिर विष्णु भगवान् के चरणारविन्द को पाकर यह और भी पुनीत हुई; और फिर भगवान् शिव के मस्तक का स्पर्श पाकर तो इसकी पवित्रता अनिर्वचनीय हो गई, और जब यह शिवपुरी काशी से मिल गई तो इसका जल, जल न रह कर, द्रवीभूत धर्म बन गया; ऐसी गंगा की महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है? ॥२८॥ अम्भोमयी त[नुरियं हि शिवस्य दैवी] काशी पुरी पुररिपोः प्रकटेव मूर्तिः । अन्योन्यसङ्ग[मवशादुभयं समेत्य] कस्तारतम्यमनयोस्तनुतां मनीषी ॥२९॥ [य]ह गंगा भगवान् [शंकर का जलमय श]रीर है और यह काशी पुरी भगवान् शिव की साक्षात् मूर्ति [है;] अतः दोनों ने [आप]स में मिल कर एक दूसरे को पवित्र बना दिया है। कोई भी बुद्धिमान् इनका [ता]रतम्य नहीं बता सकता ॥२९॥ [... ]य वसतिं विधिवत् सपर्यां विश्वेशितुविशदभक्तिविशुद्धचेताः । [...म् ।] व्रतमनुज्झितवानकामः शेषं समापय वयः समयैर्मुनीनाम् ॥३०॥ [महाराज ! ...] इस काशी में रह कर भगवान् विश्वनाथ की विधिपूर्वक सेवा करते हु[ए पवि]त्र भक्ति[से अ]पने चित्त को विशुद्ध कीजिये और निष्काम भाव से नित्य नैमित्तिक कर्म करते हुए [मुनियों] के समान, अपनी शेष आयु व्यतीत कीजिये ॥३०॥ [इतीरि]हितवचो नृपतिर्निशम्य सम्यक् समाहितमनाः स्वहितानुबन्धि । [तपश्च]दानादिसुकृतान्यधिकाधिकानि सत्वोर्जितानि विदधे विधिवद् विधिज्ञः॥३१॥ [के...पु]रोहित के ये हितकारक वचन सुन कर नियमों को जानने वाले राजा सुर्जन अपने मन क[ो समाहि]त बना कर, सत्वगुण के आधिक्य के कारण दानादि पुण्य कर्म विधिपूर्वक अधिक [मात्रा] में करने लगे ॥३१॥ (२८) धर्मद्रवी द्रवीभूतधर्मस्वरूपा। (२९) रघुवंशे (१३, ७८) 'लंकेश्वरप्रणतिमंगदृढव्रतं तद् वन्द्यं युगं चरणयोर्जनकात्मजायाः । जेष्ठानु- वृत्तिजटिलं च शिरोऽस्य साधोरन्योन्यपावनमभूदुभयं समेत्य ।।' इति ।
२१६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ये येऽत्र सन्ति बधिरान्धकदीननग्ना गृह्णन्तु ते द्रुतमुपेत्य समीहितानि । एवं वदद्भिरनुगैः प्रतिसंध्यमस्य नित्यं निदेशपटहः परिटाड्यते स्म ॥३२॥ नित्य सन्ध्या समय राजा के अनुचर ढोल पीट पीट कर सूचना दिया करते थे कि जो जो बहरे, अंध, अपाहिज, नंगे और दीन व्यक्ति हों वे सब शीघ्र आकर अपनी इच्छित वस्तुयें ले लें ॥३२॥ अन्नप्रवाहमनुवेलमनङ्गशत्रोः पुर्यां प्रवर्षति विशालकृपाकुलेऽस्मिन् । तद्वासिनां तनुभृतां भरणेषु चिन्तासन्तानमुज्झितवती चिरमन्नपूर्णा ॥३३॥ महान् दयालु राव सुर्जन के शिव पुरी काशी में प्रति दिन अन्न की वर्षा करते रहने के कारण भगवती अन्नपूर्णा ने, बहुत समय तक, वहाँ रहने वाले प्राणियों के भरण पोषण की चिन्ता छोड़ दी थी ॥३३॥ विश्राणयत्यनुदिनं ननु दीनबन्धौ तस्मिन्नसीमवसनान्यविशेषदृष्ट्या । आत्मस्वभावपरतन्त्रतया स्वतन्त्रोऽप्येकः परं पुरहरोऽजनि कृत्तिवासाः ॥३४॥ दीनबन्धु राव सुर्जन के प्रतिदिन, समदृष्टि होकर, असीम वस्त्र वितरण करते रहने के कारण केवल एक स्वतन्त्र भगवान् शिव ही ऐसे बच रहे थे जो अपने स्वभाव से लाचार होकर गजचर्म धारण करते थे ॥३४॥ म्लानानि हन्त वदनानि वनीयकानामालोकि... भूमिभर्ता । दैन्यं तु दानविभवेन परोक्षमेव तेषां... चकार ॥३५॥ दयार्द्रहृदय राव सुर्जन याचकों के मुरझाये हुये... ते थे इसलिये उन्होंने पहले ही अपने दान वैभव से लोगों की दीनता जला डाला... वीक्ष्य द्विजातिगणकर्मपरीक्षणेषु कालातिपातमयमायतमान्तरायम् । विश्राणनव्यसनवान् विससर्ज वित्तं यज्ञोपवीतमवगत्य स वीतमाय... ॥३६॥ दान देना ही जिनका व्यसन था और जो माया के आवरण को हटा चुके... र्जन ब्राह्मणोचित कर्मों की परीक्षा करने में विलम्ब रूपी बड़े भारी विघ्न को देख कर क... पवीत देख कर ही (लोगों को ब्राह्मण मान लेते थे और) उन्हें दान दे देते थे ॥३६॥ कैलासकौशलभृतो रचिता नृपेण देवालया रुरुचिरे दिवमु... न्तः । सिक्तस्य दानसलिलैः सततं तदीयैः शङ्के यशोमयतरोस्तरुणाः... ॥३७॥ राव सुर्जन ने कैलास के समान शुभ्र, सुन्दर और विशाल तथा आकाश को... ले देव मन्दिर बनवाये जो ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानों उनके दानसंकल्पों के जल से निरन्त... सींचे गये यश रूपी वृक्ष के नवीन अंकुर हों ॥३७॥ खाताश्च तेन परितो विपुलास्तडागाः पद्माटवीपटिमरजितर... येषु प्रविश्य विशदांशुमयूखमाला नक्तं मुहुर्मधुरिमादिगुणान... ॥३८॥ राव सुर्जन ने चारों ओर कई बड़े बड़े तालाब खुदवाये जिनके कमलसमूह में अनुरक्त राजहंस क्रीड़ा किया करते थे और जिनमें रात्रि के समय चन्द्रमा की किरणें प्रवेश करके बार बार माधुर्य आदि गुणों को सीखा करती थीं ॥३८॥
.२८ एकोनविंशतितमः सर्गः २१७ नो विद्महे नयविदाऽवनिपेन भूयः केनाशयेन विहिताः सलिलाशयास्ते । कामं तुषारसरसाः शतशः प्रणीतास्तस्य प्रदानपयसैव हि शैवलिन्यः ॥३९॥ हम नहीं जानते कि विद्वान् राव सुर्जन ने किस आशय से वे तालाब खुदवाये जब कि उनके दान संकल्पों के जल की अत्यन्त शीतल सैकड़ों नदियाँ पहले से ही बह रही थीं ? ॥३९॥ हैमं यदेव मणिभिर्भृतमुन्मयूखैर्विश्वेश्वराय झटिति प्रवरं किरीटम् । अह्नाय तद् विनिमयेन नवीनमिन्दुं देवोऽपि शेखरतया भृतवानमुष्मै ॥४०॥ जब राव सुर्जन ने शीघ्र ही उज्ज्वल किरणों वाले मणियों से जड़ा हुआ सोने का श्रेष्ठ किरीट भगवान् विश्वनाथ पर चढ़ाया तब भगवान् शिव ने भी झट उसके बदले में अपना नवचन्द्र रूपी किरीट राजा के मस्तक पर रख दिया अर्थात् शीघ्र राजा को मुक्त करके उन्हें चन्द्रशेखर अर्थात् शिवस्वरूप बना दिया ॥४०॥ किं पौरुषं यदिधिकाशि दधीचितुल्यस्तेने तुलामयमुपेष्यति मोक्षकाले । दानान्यदीनहृदयः कति वा न वारांस्तावन्ति हन्त निरवाहयदेत्य तीर्थम् ॥४१॥ महर्षि दधीचि के समान दानवीर राव सुर्जन ने यदि अपना मोक्षकाल समीप आने पर काशी में तुलादान किया तो क... द... प्रपञ्चहृदय वाले वे राजा ऐसे दान तो तीर्थ स्थानों में जाकर न जाने कितने... बार भी... यश्चानुवेलममिता... जाम्बूनदानि ददतो ववृते न तृप्तिः । तेऽर्पणाय वसु संनिहितं तुलायां तद्दानधर्मविहितस्थितिपालनाय ॥४२॥ जिन... सुर्जन..., याचकों को प्रति दिन अपरिमित सुवर्ण दान देने पर भी, तृप्ति नहीं हुई, उनका व... ढ़ाना केवल दानधर्म के विधान की रक्षा करने के लिये था ॥४२॥ ...थ तस्य चरमे परमात्मरूपं रामाख्यतारकमनुं जपतः स्वबुद्ध्या । ...य कर्णे... न्तकमन्धकारिः प्रीत्या चकार पुनरुक्ततयोपदेशम् ॥४३॥ ... अन्त सम... ट आ जाने पर परमात्मस्वरूप 'राम' इस तारक मन्त्र का अपनी बुद्धि के अनुसार ज... वाले राव सुर्जन के (दाहिने) कान के पास आकर भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर, पु... क्त करते हुये, उस मन्त्र का उपदेश दिया ॥४३॥ भूमी... खलोपि सवीश्वरोपि भृत्यं यथाविभवमेव पुरस्करोति । यत्... भमम्बरमैभकृत्तिं तस्मै ददे प्रमुदितोपि स कृत्तिवासाः ॥४४॥ स्वामी चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो और चाहे कितना ही प्रसन्नमुख क्यों न हो जाय, तथापि वह अपने सेवक को पुरस्कार अपने वैभव के अनुरूप ही देता है, यही कारण था कि भगवान् शिव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर भी राव सुर्जन को पहनने के लिये गजचर्म और सवारी के लिये बैल ही दिया (अर्थात् उन्हें मुक्त करके शिवस्वरूप बना दिया) ॥४४॥ ०
२१८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कल्पद्रुमः स जगतां सुमनोगणाय दत्वा फलानि कुसुमानि च शर्मदानि । पत्राणि चञ्चलतराण्यवकीर्य काले स्थाणुत्वमुत्तमयशाः स्थिरमाससाद ॥४५॥ जिस प्रकार स्वर्ग का कल्पवृक्ष देवताओं को आनन्ददायक फल, फूल और पत्ते देता है, उसी प्रकार मर्त्यलोक के कल्पवृक्ष (कल्पवृक्ष के समान लोगों की इच्छा पूर्ण करने वाले) राव सुर्जन ने देवताओं को आनन्ददायक फल, फूल और बेल पत्र इत्यादि चढ़ाये तथा विद्वानों का आनन्ददायक फल फूल आदि से सत्कार करके उन्हें दानपत्र भेंट किये, और जिस प्रकार फल, फूल तथा पत्तों के न रहने पर वृक्ष स्थाणु (ठूंठ) रह जाता है, उसी प्रकार अस्थिर फल, फूल और पत्र देकर राव सुर्जन भी सदा के लिये स्थिर स्थाणु (शिव) बन गये ॥४५॥ दिवोदासोप्यासीत् किल कतिपयानेव दिवसान् पुरा यस्याः काश्याः सुकृतनयविद्वानधिपतिः । अपूर्वं नैपुण्यं किमपि कृतवान् सुर्जननृपो यदैश्वर्यं तस्याः स्थिरतरमुपादत्त स कृती ॥४६॥ पहले इस काशी के राजा नीतिकुशल और पुण्यात्मा दिवोदास भी हुये थे जिन्होंने कुछ दिन तक इस काशी में सुन्दर शासन किया था, किन्तु कुशल राजा सुर्जन ने न जाने कौन सी अपूर्व निपुणता की कि उन्होंने इस काशी का स्थिर ऐश्वर्य ग्रहण कर लिया (काशी में देहत्याग करके मुक्ति प्राप्त कर ली) ॥४६॥ मध्येकाशि मधुद्विषा विरचिते चक्रे [सुरैर्दुष्प्रापे] दुष्प्रापे मणिकर्णिकेति [मुनिभिः ख्याते च ती]र्थाधिपे । राजा शूरजनो मनोजरिपुणा दत्तस्वहस्तः कृतः त्यक्त्वा प्राकृतदेहमायतसुखे लीनः परे ब्रह्मणि ॥४७॥ काशी के बीच में भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से जो इन्द्रादि देवताओं के लिये भी दुष्प्राप्य तीर्थ जिसे मुनि लोग मणिकर्णिका कहते हैं, (सुदर्शन चक्र से बनने के कारण [चक्रपुष्क]रणी भी कहते हैं) बनाया उसी तीर्थश्रेष्ठ में राव सुर्जन, अपना भौतिक शरीर त्या[ग कर, भ]गवान् शिव द्वारा बढ़ाये हाथ को पकड़ कर, अखण्डानन्दरूप परब्रह्म में लीन [हो गये] ॥४७॥ तत्पत्न्यः कनकावतीप्रभृतयो मग्नाः समिद्धार्चिषि प्राप्याशु प्रकटोज्वलं कनकवद् रूपं गरि[ष्ठं वपुः]म् । कल्पान्तावधि कल्पितेशवपुषा पत्या समं सङ्गताः कायव्यूहभृतो नगेन्द्रदुहितुः संजज्ञिरे [सख्यः] ॥४८॥ राव सुर्जन की कनकावती आदि पत्नियों ने चिता की अग्नि में जल गय[ा... अत्यन्त] चमत्क गौर- (४५) सुमनोगणाय देवसमूहाय विद्वद्वृन्दाय च । पत्राणि पर्णानि विल्वादिपत्रा[णि दानप]त्राणि च । स्थाणुत्वं फलपुष्पपत्ररहितवृक्षत्वं शिवत्वञ्च । (४६) दिवोदासः कियतो दिवसान् काश्यां सौराज्यं चकारेति काशीखण्डे स्पष्टम् । (४७) अत एव मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी इत्यपि प्रथिता । (४८) कल्पितं प्राप्तमीशस्य शिवस्य वपुर्विग्रहो येन तेन । कायव्यूहभृतः विविधदेहधारिण्याः ।
एकोनविंशतितमः सर्ग २१९ वान्न्वित तथा सुवर्ण के समान उज्ज्वल रूप प्राप्त किया और शिव शरीरधारी पति से सदा के लिये मिल कर वे भगवती पार्वती के विभिन्न रूप बन गईं ॥४८॥ निरारम्भा रम्भाप्रभृतिसुररामा ववृतिरे वृषा वीतातङ्कः समगत समग्रासनभुवा। विकीर्य स्वाराज्यं तृणमिव परब्रह्मणि नृपे रणस्तम्भोत्तंसे लयमयति शम्भोः करुणया ॥४९॥ रणस्तम्भपुर के भूषण राव सुर्जन के, भगवान् शिव की कृपा के कारण, स्वर्ग के राज्य को तृणवत् ठुकरा कर परब्रह्म में लीन हो जाने पर, रंभा आदि स्वर्ग की अप्सरायें विफल-प्रयत्न हो गईं और इन्द्र निर्भय होकर अपने सारे सिंहासन पर फैल पसर कर बैठे । (अप्सरायें सोच रही थीं कि राव सुर्जन स्वर्ग में आयेंगे और वे उनके साथ भोग विलास करेगी और इन्द्र को भय था कि उन्हें आधा सिंहासन देना पड़ेगा, किन्तु राव सुर्जन के परब्रह्म में लीन हो जाने पर अप्स- राओं की आशा और इन्द्र का भय, दोनों, विफल हो गये) ॥४९॥ किं चित्रं यदि नाम चित्रचरितं चारुस्वरैश्चारणा- स्तं गायन्ति सहाङ्गनाभिरनिशं मेरौ निषण्णाः सुखम् । ब्रह्मीभूतमुपास्य विश्वविभवेष्वेकं विश्रुतं ध्यायन्तोऽपि वशिनो ध्यायन्ति निर्वासनाः ॥५०॥ • विश्वविख्यात और राव सुर्जन के यश को यदि गन्धर्व, अपनी स्त्रियों के साथ, सुमेरु पर्वत पर सुखपूर्वक बैठकर सदा अपने सुन्दर स्वरों से गाते हैं तो इसमें क्या आश्चर्य है? ब्रह्मीभूत हो जाने के कारण सबके पूज्य बने हुये राव सुर्जन का तो ब्रह्माण्ड में रहने वाले वासणारहित योगी भी ध्यान किया करते हैं ॥५०॥ .इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकोनविंशतितमः सर्गः । (४९) सुर्जननृपः श्रीविश्वनाथानुग्रहात् काश्यां देहपातेन स्वर्गराज्यं तृणमिव परित्यज्य परब्रह्मणि यदा लीनस्तदा रम्भाप्रभृतयोऽप्सरसः राज्ञि शृङ्गारभावनाविरहिताः सम्पन्नाः, इन्द्रश्च राजा स्वर्गसिंहासनार्धमधिकु- र्यादिति भयविमुक्तः समग्रसिंहासनोपभोगेन पूर्णानन्दमन्वभवत् ।
विंशतितमः सर्गः शान्तिं गते सुर्जनरायसूर्ये सद्योभिभूतस्तमसा घनेन । व्यापारहीनाः परितोऽतिदीना द्विजा निजावासमुपेत्य लीनाः ॥ १ ॥ राव सुर्जन रूपी सूर्य के अस्त हो जाने पर, चारों ओर घने अन्धकार से अभिभूत, व्यापार- हीन, अत्यन्त दीन द्विज (ब्राह्मण ; पक्षी) अपने अपने घरों में (घोंसलों में) जाकर छिप गये ॥१॥ पात्रं निपीताम्बु यथाम्बुराशेरुद्धान्तरत्नं च धरान्तरालम् । त्यक्तं तथा तेन तथाविधेन तमोमयं विश्वमिदं बभूव ॥ २ ॥ ऐसे राव सुर्जन द्वारा त्यक्त यह संसार अन्धकारमय हो गया और जल पी लेने पर रिक्त पात्र के समान अथवा रत्न निकाल लिये जाने पर समुद्र के रिक्त धरातल के समान शून्य हो गया ॥२॥ अर्थेन शून्यं सदनं बुधानां शब्देन शून्यं वदनं कवीनाम् । वदान्यशून्या ववृते धरित्री तस्यावसाने जगदुत्तमस्य ॥ ३ ॥ जगत् में उत्तम राव सुर्जन के शान्त हो जाने पर [विद्वानों का घर] अर्थ (धन) से रहित हो गया, कवियों का मुख शब्द से रहित हो गया औ[र यह पृथ्वी दानियों से र]हित हो गई ॥ ३ ॥ निर्वाहके सर्वमनीषितानां निर्वाणमासङ्[गिनि]... चिरात् निवृत्ता नयनाम्बुधारा दरिद्रदाराननमाललम्बे ॥ ४ ॥ सब लोगों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले राव सुर्जन के मोक्ष प्राप्त कर लेने [पर] बहुत देर बाद जो आँसुओं की धारा रुकी उसने जाकर दरिद्रों की पत्नियों के मुखों को... ॥ ४ ॥ आकारणं कारणमन्तरेण कालेप्यकालेऽपि कुतूहलेन । पुण्यैरशून्यानतिसूनृतानि स्मितोपगूढानि च भाषितानि । वयस्यताविष्कृतिपेशलानि राज्ञोऽपि सप्रश्रयचेष्टितानि । प्रेम्णोपनीतान्यपि भोज्यवस्तून्यल्पप्रमाणान्यपि मानदानि । दिने दिने दैन्यविदारणानि दानान्यनेकानि सभूषणानि । अनुक्षणं भावयतां द्विजानां सभासदां सीदति न स्म शोकः समय पर अथवा असमय पर, सकारण अथवा अकारण, राव सुर्जन के [द्वारा] [क]हे गये वे पुण्यशील सत्य वचन, वे मुस्कान युक्त भाषण, राजा होने पर भी उनकी [मित्रता] सूचित करने में चतुर वे प्रणययुक्त चेष्टायें, थोड़े होने पर भी सम्मान को व्यक्त करने वाले प्रेमपूर्वक लाये गये वे खाद्य पदार्थ, और प्रतिदिन दीनता को नष्ट करने वाले और आभूषणों से युक्त वे नाना प्रकार के दान—इन सबको प्रति पल याद करने वाले द्विजातीय सभासदों का शोक कम नहीं हुआ ॥५-७॥
विंशतितमः सर्गः २२१ अथाभिषेक्तुं नृपतेस्तनूजं भोजं भुजास्कन्दितवैरिवृन्दम् । सन्मन्त्रभाजः सचिवाः पुराणाः पुरोधसश्च त्वरिता बभूवुः ॥८॥ इसके बाद राव सुर्जन के पुत्र राजकुमार भोज का, जिन्होंने अपने भुजबल से शत्रुसमूह को पराजित कर दिया था, राज्याभिषेक करने के लिये, उत्तम नीति के ज्ञाता प्राचीन मंत्री और पुरो- हित शीघ्रता करने लगे ॥८॥ जित्वा जगद् गुर्जरराजभूमिं हूमायुँजस्य प्रसहं जिघृक्षोः । अग्रेसरीभूय रिपून् विनिघ्नंस्ततान तोषं पृथुपौरुषो यः ॥९॥ जगत् को जीत कर गुर्जर देश को हठात् अपने आधीन करने की इच्छा रखने वाले हुमायूँ- पुत्र अकबर के आगे आगे चल कर महापराक्रमी राजकुमार भोज ने शत्रुओं को मार कर अकबर को प्रसन्न किया ॥९॥ दृगञ्जनं वैरिवधूजनस्य पपौ रिपूणामतनोत् तमांसि । स्नेहस्य पात्रं समपूरयच्च प्रतापदीपोऽद्भुत एव यस्य ॥१०॥ राजकुमार भोज का प्रताप रूपी दीपक अद्भुत है। वह शत्रु-स्त्रियों की आँखों के काजल को नष्ट कर देता है (शत्रु-स्त्रियों द्वारा काजल नहीं लगाया जाता), शत्रुओं के लिये अन्धकार फैला देता है और प्रेम-पात्र (मित्रों और प्रजा वर्ग) पूर्ण किया करता है। (साधारण दीपक काजल उत्पन्न करता है, अन्धकार नष्ट करता है और तैल के पात्र को रिक्त कर देता है) ॥१०॥ अभ्यर्णसंस्थ [...] ऽप्यनुरागेऽप्यलं न साऽऽरोढुमभूत् तदङ्कम् । प्रतीक्षमाणाऽस्य महाभिषेकं कन्येव पाणिग्रहणं नृपश्रीः ॥११॥ [...] लक्ष्मी यद्यपि राजकुमार भोज के पास ही रहती थी और उनमें उसका पूर्ण प्रेम था तथापि [...] गोद में बैठने में संकोच करती थी और इसके लिये उनके राज्याभिषेक की [...] कर रही थी, जिस प्रकार कोई कुमारी किसी व्यक्ति से पूर्ण प्रेम करती हो और उसके पास ही [...] ती हो तो भी उसकी गोद में बैठने के लिये विवाह की प्रतीक्षा किया करती है ॥११॥ [...] श्रुत्वा कुमारस्य महाभिषेकतूर्यध्वनिं ताण्डवितं वितेनुः । [...] प्रमोदेन यथा मयूरास्तपात्यये तोयदनादमत्ताः ॥१२॥ [...] कुमार भोज के राज्याभिषेक की सूचना देने वाले शहनाई के शब्दों को सुन कर लोग आनन्द [...] उठे, जैसे ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु में मेघों की गर्जना सुन कर मस्त मोर आनन्द से नाच [...] ॥१२॥ [...] विपञ्चीरणितं मनोज्ञं तिरोदधे दुन्दुभिधीरघोषः । [L30: यथा रतान्तर्मणितं वधूनां मञ्जीरकाञ्चीजनितो निनादः ॥१३॥ नगाड़ों के गंभीर शब्दों ने बजती हुई वीणा के सुन्दर स्वरों को छिपा दिया, जैसे स्त्रियों के (संभोग के समय होने वाले) नूपुर (घुंघरू) और रशना (करधनी) के शब्द उनके रतिकूजित को छिपा देते हैं ॥१३॥
२२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नानादिगन्तादथ दन्तिमुख्यमुपायनीकृत्य पदार्थजातम् । सेवाविशेषं विशदी करिष्यंस्तस्थौ चिरं द्वारि नरेन्द्रलोकः ॥१४॥ नाना देश विदेशों से आये हुये राजा लोग, उत्तम हाथी और अन्य विशिष्ट वस्तुओं को भेंट देकर, अपनी विशेष सेवा को प्रकट करने के लिये, बहुत देर तक द्वार पर खड़े रहे ॥१४॥ प्रीत्या नृपस्योपरतस्य केचिद् वयस्यतामस्य विभाव्य केऽपि । भयेन भूपा मिलितास्तथाऽन्ये परे त्वनौचित्यनिवारणाय ॥१५॥ कुछ राजा तो दिवंगत राव सुर्जन के प्रेम के कारण आये, कुछ राजा राजकुमार भोज के मित्र होने के कारण आये, कुछ राजा भय के कारण आये और कुछ अनौचित्य का निवारण मात्र करने के लिये एकत्रित हुये ॥१५॥ सुपर्वसिन्धुप्रभृतीः स्रवन्तीः समुद्रमुख्यांश्च नदानुपेत्य । सरांसि पुण्यानि च पुष्करादीन्युपानयन् नीरमथाऽप्तभृत्याः ॥१६॥ योग्य कर्मचारी गंगा आदि नदियों से, मुख्य मुख्य समुद्रों से और पुष्कर आदि पवित्र सरोवरों से (महाभिषेक के लिये) जल लाये ॥१६॥ तत्रान्तरङ्गैर्गणकैर्गुणाढयैर्मुहुर्मुहूर्तं महितं विचार्य । उपक्रमे मङ्गलकर्मणोऽस्य सच्छ्रोत्रिया[स्त्वस्तमया]न्तः ॥१७॥ घनिष्ठ सम्बन्ध वाले गुणवान् ज्योतिषियों [ने मुहूर्त] में बार बार विचार करके श्रेष्ठ कर्मकांडी विद्वान् राजकुमार के राज्या[भिषेक को] प्रारंभ करने के लिये, स्वस्तिवाचन करने लगे ॥१७॥ व्यासात्मजश्चक्रधरो धुरीणो धराभृतः कृत्यविधौ समग्र । तातं पुरस्कृत्य पुरोऽवतस्थे जगद्धिते कर्मणि जागरूकः ॥१८॥ संसार में हित करने वाले कर्मों में जागरूक तथा समस्त राजसंस्कारों [में प्रवीण] राज- पुरोहित गोपाल व्यास के पुत्र चक्रधर व्यास, अपने पिता को आगे करके राज्या[भिषेक] का सारा कार्य अपने तत्त्वावधान में करा रहे थे ॥१८॥ तथेतरे तत्र रथन्तरज्ञा ब्राह्मं महः प्राज्यतमं दधानाः तत्कालीनयोग्यानि जगुः समेताः सामानि सन्मङ्गलसाधना[नि ॥१९॥] अत्यन्त उत्कृष्ट ब्रह्मतेज को धारण करने वाले रथन्तर साम के विद्वान् एकत्र होकर उस समय के योग्य, शुभ और मंगलकारी, सामवेद के मंत्रों को गाने लगे ॥१९॥ उपात्तमङ्गल्यमहौषधीकैस्तीर्थाम्बुपूर्णैः कलशैरशून्याम् । भोजोऽथ जाम्बूनदबद्धवेदिं जगाम विद्वानभिषेकभूमिम् [॥२०॥] फिर विद्वान् भोज अभिषेक भूमि की ओर गये जहाँ सोने से जड़ी हुई [वेदी बनाई] गई थी और जहाँ सुवर्णकलश रक्खे हुये थे जिनमें विविध तीर्थों से लाये गये पवित्र जल भरे थे और मांग- लिक ओषधियाँ (वनस्पतियाँ आदि) पड़ी हुईं थीं ॥२०॥ (१९) रथन्तरं सामवेदस्य गीतिभेदः ।