भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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२१४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यत्रोद्भवत्युपरमो भ्रमतो जनस्य यत्र प्रबोधजननी किल दीर्घनिद्रा । अन्तोऽप्यनन्तविभवं वितनोति यत्र यत्रान्धकोऽपि भवति ध्रुवमन्धकारिः ॥२३॥ इस काशी की महिमा अद्भुत है। संसारचक्र में घूमने वाले पुरुष का यहाँ भ्रम (भ्रान्ति ; माया) छूट जाता है; यहाँ मृत्यु भी विशुद्ध ज्ञान को उत्पन्न करती है; यहाँ अन्त होने पर अनन्त वैभव प्राप्त होता है; यहाँ अन्धा भी अन्धक दैत्य के शत्रु शिव के समान बन जाता है ॥२३॥ कल्पान्तकन्दलितताण्डवविभ्रमेण संवृत्य कृत्यनिपुणो निखिलप्रपञ्चम् । अस्यां गुणातिगतनौ सगुणं शरीरं देवो निलीनयति दिव्यधुनीवतंसः ॥२४॥ परमकुशल गंगाधर भगवान् शिव प्रलयकाल में अपना तांडव नृत्य दिखला कर, इस सम्पूर्ण प्रपञ्चात्मक जगत् का संहार करके, अपने सगुण शरीर को गुणातीत शरीर वाली इस काशी में छिपा देते हैं ॥२४॥ यस्मिन्नचिन्त्यविभवे भुवनैकहेतौ ब्रह्माण्डगोलकशतानि परिप्लवन्ते । गङ्गेति बिभ्रदतिपावननामधेयं सोयं पुरः प्रवहते पयसां समूहः ॥२५॥ जिसकी महिमा अनिर्वचनीय है, जो जगत् का एक मात्र कारण है और जिसमें सैकड़ों ब्रह्माण्ड रूपी गोले तैरा करते हैं, वही जलसमूह, अ[तिपावन 'गंगा'] नाम को धारण करके यहाँ बह रहा है। (मनु के अनुसार सबसे पहले ब[्रह्मा ने जल का नि]र्माण किया और उसमें जो जगत् का बीज छोड़ा वही ब्रह्माण्ड बना ।) दृप्यत्त्रिविक्रमपदाक्रमणेन भिन्नब्रह्माण्डभाण्डा[त् ... ] रयात् पतन्तीम् । विश्वस्य पावनकरीं विधुमौलिरिमां स्रग्दामवत् सपदि शेखरयाञ्चकार ॥२६॥ जब वामन भगवान् का बढ़ा हुआ पैर स्वर्ग में पहुँचा तो उसकी ठोकर [से ऊपर] रखे हुये ब्रह्माण्डरूपी भांडे में छेद हो गया और उसमें से (सृष्टि का आदि कारण तथा [विश्व को पवित्र] करने वाला जल-समूह 'गंगा' नाम से वेग से नीचे गिरने लगा, तब भगवान् शिव ने (उनके मस्तक पर पहले से ही (अमृत बरसाने वाला) चन्द्रमा विराजमान [था, अतः] गंगा को उस अमृत वर्षी चन्द्र से भी उत्कृष्ट समझ कर) शीघ्र ही पुष्पमाला के समान अपने [मस्तक का आभूष]ण बनाया। (जब वामन भगवान् ने राजा बलि की दी हुई तीन पैर भूमि नापने [के लिये अ]पना एक पैर स्वर्ग में रक्खा तब ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डलु के जल से उस पैर को पूजा और [वही ज]ल 'गंगा' बन कर तीनों लोकों में बहने लगा ।) ॥२६॥ (२३) दीर्घनिद्रा मृत्युः । 'काश्यां मरणान् मुक्ति' रिति । (२६) वामनो ब्रह्मचारिस्वरूपं धृत्वा यज्ञं कुर्वतो बलेः पदत्रयपरिमाणां भूमिमयाचत [तत]श्च तस्यां उन्मापनाय एकं पदमूर्ध्वं प्रक्षिपतो वामनस्य ब्रह्मलोकं गतं तत् ब्रह्मा स्वकमण्डलुजलेन प्रक्षालितवान् । तदेव जलं गङ्गास्वरूपेण त्रिभुवनं पवित्रयति । तत्र कविनोत्प्रेक्षितं ऊर्ध्वं प्रेरितेन पदेनोपरिस्थितो ब्रह्माण्डकटाहो भग्नस्तदानीं विभिन्नात् कटाहात् जलमुपरिस्थितं गङ्गारूपेण प्रावहत् । ब्रह्माण्डं च कारणजलराशिमध्ये तिष्ठ- तीति 'अप एव ससर्जादौ' इति मानवधर्मशास्त्रे स्थितम् ।