भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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एकोनविंशतितमः सर्गः २१५ तीव्रेण तेन तपसेह भगीरथस्य भाग्येन भूतलजुषामथवाऽवतीर्णा । सोढुं विभोर्विरहखेदमपारयन्ती सेयं पुरीं पुररिपोः परिरभ्य तस्थौ ॥२७॥ यह गंगा भगीरथ के तीव्र तप के कारण अथवा मर्त्यलोक के निवासियों के सौभाग्य के कारण यहाँ उतरी है। अपने स्वामी भगवान् शिव का विरह कष्ट न सह सकने के कारण यह गंगा, भगवान् शिव की नगरी काशी का आलिंगन करके रुक सी गई है (काशी में गंगा बहुत धीरे बहती है। सगर राजा के वंशज भगीरथ अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिये तीव्र तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये थे। इसीलिये गंगा का नाम भागीरथी पड़ा। उस समय स्वर्ग से गिरने वाली गंगा को भगवान् शिव ने अपनी जटा में रोका था। ॥२७॥ प्रागेव पुण्यसलिलाऽथ हरेःपदाम्जं प्राप्ता ततोऽनुपरिपुष्टहरोत्तमाङ्गो । धर्मद्रवी यदि पुनर्मिलितेह काश्यां कोऽस्या महित्वमभिधातुमहोक्षमःस्यात् ॥२८॥ । यह गंगा (ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रहने के कारण) पहले ही अत्यन्त पवित्र जल वाली थी, फिर विष्णु भगवान् के चरणारविन्द को पाकर यह और भी पुनीत हुई; और फिर भगवान् शिव के मस्तक का स्पर्श पाकर तो इसकी पवित्रता अनिर्वचनीय हो गई, और जब यह शिवपुरी काशी से मिल गई तो इसका जल, जल न रह कर, द्रवीभूत धर्म बन गया; ऐसी गंगा की महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है? ॥२८॥ अम्भोमयी त[नुरियं हि शिवस्य दैवी] काशी पुरी पुररिपोः प्रकटेव मूर्तिः । अन्योन्यसङ्ग[मवशादुभयं समेत्य] कस्तारतम्यमनयोस्तनुतां मनीषी ॥२९॥ [य]ह गंगा भगवान् [शंकर का जलमय श]रीर है और यह काशी पुरी भगवान् शिव की साक्षात् मूर्ति [है;] अतः दोनों ने [आप]स में मिल कर एक दूसरे को पवित्र बना दिया है। कोई भी बुद्धिमान् इनका [ता]रतम्य नहीं बता सकता ॥२९॥ [... ]य वसतिं विधिवत् सपर्यां विश्वेशितुविशदभक्तिविशुद्धचेताः । [...म् ।] व्रतमनुज्झितवानकामः शेषं समापय वयः समयैर्मुनीनाम् ॥३०॥ [महाराज ! ...] इस काशी में रह कर भगवान् विश्वनाथ की विधिपूर्वक सेवा करते हु[ए पवि]त्र भक्ति[से अ]पने चित्त को विशुद्ध कीजिये और निष्काम भाव से नित्य नैमित्तिक कर्म करते हुए [मुनियों] के समान, अपनी शेष आयु व्यतीत कीजिये ॥३०॥ [इतीरि]हितवचो नृपतिर्निशम्य सम्यक् समाहितमनाः स्वहितानुबन्धि । [तपश्च]दानादिसुकृतान्यधिकाधिकानि सत्वोर्जितानि विदधे विधिवद् विधिज्ञः॥३१॥ [के...पु]रोहित के ये हितकारक वचन सुन कर नियमों को जानने वाले राजा सुर्जन अपने मन क[ो समाहि]त बना कर, सत्वगुण के आधिक्य के कारण दानादि पुण्य कर्म विधिपूर्वक अधिक [मात्रा] में करने लगे ॥३१॥ (२८) धर्मद्रवी द्रवीभूतधर्मस्वरूपा। (२९) रघुवंशे (१३, ७८) 'लंकेश्वरप्रणतिमंगदृढव्रतं तद् वन्द्यं युगं चरणयोर्जनकात्मजायाः । जेष्ठानु- वृत्तिजटिलं च शिरोऽस्य साधोरन्योन्यपावनमभूदुभयं समेत्य ।।' इति ।

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