सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
एकोनविंशतितमः सर्गः २१५ तीव्रेण तेन तपसेह भगीरथस्य भाग्येन भूतलजुषामथवाऽवतीर्णा । सोढुं विभोर्विरहखेदमपारयन्ती सेयं पुरीं पुररिपोः परिरभ्य तस्थौ ॥२७॥ यह गंगा भगीरथ के तीव्र तप के कारण अथवा मर्त्यलोक के निवासियों के सौभाग्य के कारण यहाँ उतरी है। अपने स्वामी भगवान् शिव का विरह कष्ट न सह सकने के कारण यह गंगा, भगवान् शिव की नगरी काशी का आलिंगन करके रुक सी गई है (काशी में गंगा बहुत धीरे बहती है। सगर राजा के वंशज भगीरथ अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिये तीव्र तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये थे। इसीलिये गंगा का नाम भागीरथी पड़ा। उस समय स्वर्ग से गिरने वाली गंगा को भगवान् शिव ने अपनी जटा में रोका था। ॥२७॥ प्रागेव पुण्यसलिलाऽथ हरेःपदाम्जं प्राप्ता ततोऽनुपरिपुष्टहरोत्तमाङ्गो । धर्मद्रवी यदि पुनर्मिलितेह काश्यां कोऽस्या महित्वमभिधातुमहोक्षमःस्यात् ॥२८॥ । यह गंगा (ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रहने के कारण) पहले ही अत्यन्त पवित्र जल वाली थी, फिर विष्णु भगवान् के चरणारविन्द को पाकर यह और भी पुनीत हुई; और फिर भगवान् शिव के मस्तक का स्पर्श पाकर तो इसकी पवित्रता अनिर्वचनीय हो गई, और जब यह शिवपुरी काशी से मिल गई तो इसका जल, जल न रह कर, द्रवीभूत धर्म बन गया; ऐसी गंगा की महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है? ॥२८॥ अम्भोमयी त[नुरियं हि शिवस्य दैवी] काशी पुरी पुररिपोः प्रकटेव मूर्तिः । अन्योन्यसङ्ग[मवशादुभयं समेत्य] कस्तारतम्यमनयोस्तनुतां मनीषी ॥२९॥ [य]ह गंगा भगवान् [शंकर का जलमय श]रीर है और यह काशी पुरी भगवान् शिव की साक्षात् मूर्ति [है;] अतः दोनों ने [आप]स में मिल कर एक दूसरे को पवित्र बना दिया है। कोई भी बुद्धिमान् इनका [ता]रतम्य नहीं बता सकता ॥२९॥ [... ]य वसतिं विधिवत् सपर्यां विश्वेशितुविशदभक्तिविशुद्धचेताः । [...म् ।] व्रतमनुज्झितवानकामः शेषं समापय वयः समयैर्मुनीनाम् ॥३०॥ [महाराज ! ...] इस काशी में रह कर भगवान् विश्वनाथ की विधिपूर्वक सेवा करते हु[ए पवि]त्र भक्ति[से अ]पने चित्त को विशुद्ध कीजिये और निष्काम भाव से नित्य नैमित्तिक कर्म करते हुए [मुनियों] के समान, अपनी शेष आयु व्यतीत कीजिये ॥३०॥ [इतीरि]हितवचो नृपतिर्निशम्य सम्यक् समाहितमनाः स्वहितानुबन्धि । [तपश्च]दानादिसुकृतान्यधिकाधिकानि सत्वोर्जितानि विदधे विधिवद् विधिज्ञः॥३१॥ [के...पु]रोहित के ये हितकारक वचन सुन कर नियमों को जानने वाले राजा सुर्जन अपने मन क[ो समाहि]त बना कर, सत्वगुण के आधिक्य के कारण दानादि पुण्य कर्म विधिपूर्वक अधिक [मात्रा] में करने लगे ॥३१॥ (२८) धर्मद्रवी द्रवीभूतधर्मस्वरूपा। (२९) रघुवंशे (१३, ७८) 'लंकेश्वरप्रणतिमंगदृढव्रतं तद् वन्द्यं युगं चरणयोर्जनकात्मजायाः । जेष्ठानु- वृत्तिजटिलं च शिरोऽस्य साधोरन्योन्यपावनमभूदुभयं समेत्य ।।' इति ।
२१६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ये येऽत्र सन्ति बधिरान्धकदीननग्ना गृह्णन्तु ते द्रुतमुपेत्य समीहितानि । एवं वदद्भिरनुगैः प्रतिसंध्यमस्य नित्यं निदेशपटहः परिटाड्यते स्म ॥३२॥ नित्य सन्ध्या समय राजा के अनुचर ढोल पीट पीट कर सूचना दिया करते थे कि जो जो बहरे, अंध, अपाहिज, नंगे और दीन व्यक्ति हों वे सब शीघ्र आकर अपनी इच्छित वस्तुयें ले लें ॥३२॥ अन्नप्रवाहमनुवेलमनङ्गशत्रोः पुर्यां प्रवर्षति विशालकृपाकुलेऽस्मिन् । तद्वासिनां तनुभृतां भरणेषु चिन्तासन्तानमुज्झितवती चिरमन्नपूर्णा ॥३३॥ महान् दयालु राव सुर्जन के शिव पुरी काशी में प्रति दिन अन्न की वर्षा करते रहने के कारण भगवती अन्नपूर्णा ने, बहुत समय तक, वहाँ रहने वाले प्राणियों के भरण पोषण की चिन्ता छोड़ दी थी ॥३३॥ विश्राणयत्यनुदिनं ननु दीनबन्धौ तस्मिन्नसीमवसनान्यविशेषदृष्ट्या । आत्मस्वभावपरतन्त्रतया स्वतन्त्रोऽप्येकः परं पुरहरोऽजनि कृत्तिवासाः ॥३४॥ दीनबन्धु राव सुर्जन के प्रतिदिन, समदृष्टि होकर, असीम वस्त्र वितरण करते रहने के कारण केवल एक स्वतन्त्र भगवान् शिव ही ऐसे बच रहे थे जो अपने स्वभाव से लाचार होकर गजचर्म धारण करते थे ॥३४॥ म्लानानि हन्त वदनानि वनीयकानामालोकि... भूमिभर्ता । दैन्यं तु दानविभवेन परोक्षमेव तेषां... चकार ॥३५॥ दयार्द्रहृदय राव सुर्जन याचकों के मुरझाये हुये... ते थे इसलिये उन्होंने पहले ही अपने दान वैभव से लोगों की दीनता जला डाला... वीक्ष्य द्विजातिगणकर्मपरीक्षणेषु कालातिपातमयमायतमान्तरायम् । विश्राणनव्यसनवान् विससर्ज वित्तं यज्ञोपवीतमवगत्य स वीतमाय... ॥३६॥ दान देना ही जिनका व्यसन था और जो माया के आवरण को हटा चुके... र्जन ब्राह्मणोचित कर्मों की परीक्षा करने में विलम्ब रूपी बड़े भारी विघ्न को देख कर क... पवीत देख कर ही (लोगों को ब्राह्मण मान लेते थे और) उन्हें दान दे देते थे ॥३६॥ कैलासकौशलभृतो रचिता नृपेण देवालया रुरुचिरे दिवमु... न्तः । सिक्तस्य दानसलिलैः सततं तदीयैः शङ्के यशोमयतरोस्तरुणाः... ॥३७॥ राव सुर्जन ने कैलास के समान शुभ्र, सुन्दर और विशाल तथा आकाश को... ले देव मन्दिर बनवाये जो ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानों उनके दानसंकल्पों के जल से निरन्त... सींचे गये यश रूपी वृक्ष के नवीन अंकुर हों ॥३७॥ खाताश्च तेन परितो विपुलास्तडागाः पद्माटवीपटिमरजितर... येषु प्रविश्य विशदांशुमयूखमाला नक्तं मुहुर्मधुरिमादिगुणान... ॥३८॥ राव सुर्जन ने चारों ओर कई बड़े बड़े तालाब खुदवाये जिनके कमलसमूह में अनुरक्त राजहंस क्रीड़ा किया करते थे और जिनमें रात्रि के समय चन्द्रमा की किरणें प्रवेश करके बार बार माधुर्य आदि गुणों को सीखा करती थीं ॥३८॥
.२८ एकोनविंशतितमः सर्गः २१७ नो विद्महे नयविदाऽवनिपेन भूयः केनाशयेन विहिताः सलिलाशयास्ते । कामं तुषारसरसाः शतशः प्रणीतास्तस्य प्रदानपयसैव हि शैवलिन्यः ॥३९॥ हम नहीं जानते कि विद्वान् राव सुर्जन ने किस आशय से वे तालाब खुदवाये जब कि उनके दान संकल्पों के जल की अत्यन्त शीतल सैकड़ों नदियाँ पहले से ही बह रही थीं ? ॥३९॥ हैमं यदेव मणिभिर्भृतमुन्मयूखैर्विश्वेश्वराय झटिति प्रवरं किरीटम् । अह्नाय तद् विनिमयेन नवीनमिन्दुं देवोऽपि शेखरतया भृतवानमुष्मै ॥४०॥ जब राव सुर्जन ने शीघ्र ही उज्ज्वल किरणों वाले मणियों से जड़ा हुआ सोने का श्रेष्ठ किरीट भगवान् विश्वनाथ पर चढ़ाया तब भगवान् शिव ने भी झट उसके बदले में अपना नवचन्द्र रूपी किरीट राजा के मस्तक पर रख दिया अर्थात् शीघ्र राजा को मुक्त करके उन्हें चन्द्रशेखर अर्थात् शिवस्वरूप बना दिया ॥४०॥ किं पौरुषं यदिधिकाशि दधीचितुल्यस्तेने तुलामयमुपेष्यति मोक्षकाले । दानान्यदीनहृदयः कति वा न वारांस्तावन्ति हन्त निरवाहयदेत्य तीर्थम् ॥४१॥ महर्षि दधीचि के समान दानवीर राव सुर्जन ने यदि अपना मोक्षकाल समीप आने पर काशी में तुलादान किया तो क... द... प्रपञ्चहृदय वाले वे राजा ऐसे दान तो तीर्थ स्थानों में जाकर न जाने कितने... बार भी... यश्चानुवेलममिता... जाम्बूनदानि ददतो ववृते न तृप्तिः । तेऽर्पणाय वसु संनिहितं तुलायां तद्दानधर्मविहितस्थितिपालनाय ॥४२॥ जिन... सुर्जन..., याचकों को प्रति दिन अपरिमित सुवर्ण दान देने पर भी, तृप्ति नहीं हुई, उनका व... ढ़ाना केवल दानधर्म के विधान की रक्षा करने के लिये था ॥४२॥ ...थ तस्य चरमे परमात्मरूपं रामाख्यतारकमनुं जपतः स्वबुद्ध्या । ...य कर्णे... न्तकमन्धकारिः प्रीत्या चकार पुनरुक्ततयोपदेशम् ॥४३॥ ... अन्त सम... ट आ जाने पर परमात्मस्वरूप 'राम' इस तारक मन्त्र का अपनी बुद्धि के अनुसार ज... वाले राव सुर्जन के (दाहिने) कान के पास आकर भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर, पु... क्त करते हुये, उस मन्त्र का उपदेश दिया ॥४३॥ भूमी... खलोपि सवीश्वरोपि भृत्यं यथाविभवमेव पुरस्करोति । यत्... भमम्बरमैभकृत्तिं तस्मै ददे प्रमुदितोपि स कृत्तिवासाः ॥४४॥ स्वामी चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो और चाहे कितना ही प्रसन्नमुख क्यों न हो जाय, तथापि वह अपने सेवक को पुरस्कार अपने वैभव के अनुरूप ही देता है, यही कारण था कि भगवान् शिव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर भी राव सुर्जन को पहनने के लिये गजचर्म और सवारी के लिये बैल ही दिया (अर्थात् उन्हें मुक्त करके शिवस्वरूप बना दिया) ॥४४॥ ०
२१८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कल्पद्रुमः स जगतां सुमनोगणाय दत्वा फलानि कुसुमानि च शर्मदानि । पत्राणि चञ्चलतराण्यवकीर्य काले स्थाणुत्वमुत्तमयशाः स्थिरमाससाद ॥४५॥ जिस प्रकार स्वर्ग का कल्पवृक्ष देवताओं को आनन्ददायक फल, फूल और पत्ते देता है, उसी प्रकार मर्त्यलोक के कल्पवृक्ष (कल्पवृक्ष के समान लोगों की इच्छा पूर्ण करने वाले) राव सुर्जन ने देवताओं को आनन्ददायक फल, फूल और बेल पत्र इत्यादि चढ़ाये तथा विद्वानों का आनन्ददायक फल फूल आदि से सत्कार करके उन्हें दानपत्र भेंट किये, और जिस प्रकार फल, फूल तथा पत्तों के न रहने पर वृक्ष स्थाणु (ठूंठ) रह जाता है, उसी प्रकार अस्थिर फल, फूल और पत्र देकर राव सुर्जन भी सदा के लिये स्थिर स्थाणु (शिव) बन गये ॥४५॥ दिवोदासोप्यासीत् किल कतिपयानेव दिवसान् पुरा यस्याः काश्याः सुकृतनयविद्वानधिपतिः । अपूर्वं नैपुण्यं किमपि कृतवान् सुर्जननृपो यदैश्वर्यं तस्याः स्थिरतरमुपादत्त स कृती ॥४६॥ पहले इस काशी के राजा नीतिकुशल और पुण्यात्मा दिवोदास भी हुये थे जिन्होंने कुछ दिन तक इस काशी में सुन्दर शासन किया था, किन्तु कुशल राजा सुर्जन ने न जाने कौन सी अपूर्व निपुणता की कि उन्होंने इस काशी का स्थिर ऐश्वर्य ग्रहण कर लिया (काशी में देहत्याग करके मुक्ति प्राप्त कर ली) ॥४६॥ मध्येकाशि मधुद्विषा विरचिते चक्रे [सुरैर्दुष्प्रापे] दुष्प्रापे मणिकर्णिकेति [मुनिभिः ख्याते च ती]र्थाधिपे । राजा शूरजनो मनोजरिपुणा दत्तस्वहस्तः कृतः त्यक्त्वा प्राकृतदेहमायतसुखे लीनः परे ब्रह्मणि ॥४७॥ काशी के बीच में भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से जो इन्द्रादि देवताओं के लिये भी दुष्प्राप्य तीर्थ जिसे मुनि लोग मणिकर्णिका कहते हैं, (सुदर्शन चक्र से बनने के कारण [चक्रपुष्क]रणी भी कहते हैं) बनाया उसी तीर्थश्रेष्ठ में राव सुर्जन, अपना भौतिक शरीर त्या[ग कर, भ]गवान् शिव द्वारा बढ़ाये हाथ को पकड़ कर, अखण्डानन्दरूप परब्रह्म में लीन [हो गये] ॥४७॥ तत्पत्न्यः कनकावतीप्रभृतयो मग्नाः समिद्धार्चिषि प्राप्याशु प्रकटोज्वलं कनकवद् रूपं गरि[ष्ठं वपुः]म् । कल्पान्तावधि कल्पितेशवपुषा पत्या समं सङ्गताः कायव्यूहभृतो नगेन्द्रदुहितुः संजज्ञिरे [सख्यः] ॥४८॥ राव सुर्जन की कनकावती आदि पत्नियों ने चिता की अग्नि में जल गय[ा... अत्यन्त] चमत्क गौर- (४५) सुमनोगणाय देवसमूहाय विद्वद्वृन्दाय च । पत्राणि पर्णानि विल्वादिपत्रा[णि दानप]त्राणि च । स्थाणुत्वं फलपुष्पपत्ररहितवृक्षत्वं शिवत्वञ्च । (४६) दिवोदासः कियतो दिवसान् काश्यां सौराज्यं चकारेति काशीखण्डे स्पष्टम् । (४७) अत एव मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी इत्यपि प्रथिता । (४८) कल्पितं प्राप्तमीशस्य शिवस्य वपुर्विग्रहो येन तेन । कायव्यूहभृतः विविधदेहधारिण्याः ।
एकोनविंशतितमः सर्ग २१९ वान्न्वित तथा सुवर्ण के समान उज्ज्वल रूप प्राप्त किया और शिव शरीरधारी पति से सदा के लिये मिल कर वे भगवती पार्वती के विभिन्न रूप बन गईं ॥४८॥ निरारम्भा रम्भाप्रभृतिसुररामा ववृतिरे वृषा वीतातङ्कः समगत समग्रासनभुवा। विकीर्य स्वाराज्यं तृणमिव परब्रह्मणि नृपे रणस्तम्भोत्तंसे लयमयति शम्भोः करुणया ॥४९॥ रणस्तम्भपुर के भूषण राव सुर्जन के, भगवान् शिव की कृपा के कारण, स्वर्ग के राज्य को तृणवत् ठुकरा कर परब्रह्म में लीन हो जाने पर, रंभा आदि स्वर्ग की अप्सरायें विफल-प्रयत्न हो गईं और इन्द्र निर्भय होकर अपने सारे सिंहासन पर फैल पसर कर बैठे । (अप्सरायें सोच रही थीं कि राव सुर्जन स्वर्ग में आयेंगे और वे उनके साथ भोग विलास करेगी और इन्द्र को भय था कि उन्हें आधा सिंहासन देना पड़ेगा, किन्तु राव सुर्जन के परब्रह्म में लीन हो जाने पर अप्स- राओं की आशा और इन्द्र का भय, दोनों, विफल हो गये) ॥४९॥ किं चित्रं यदि नाम चित्रचरितं चारुस्वरैश्चारणा- स्तं गायन्ति सहाङ्गनाभिरनिशं मेरौ निषण्णाः सुखम् । ब्रह्मीभूतमुपास्य विश्वविभवेष्वेकं विश्रुतं ध्यायन्तोऽपि वशिनो ध्यायन्ति निर्वासनाः ॥५०॥ • विश्वविख्यात और राव सुर्जन के यश को यदि गन्धर्व, अपनी स्त्रियों के साथ, सुमेरु पर्वत पर सुखपूर्वक बैठकर सदा अपने सुन्दर स्वरों से गाते हैं तो इसमें क्या आश्चर्य है? ब्रह्मीभूत हो जाने के कारण सबके पूज्य बने हुये राव सुर्जन का तो ब्रह्माण्ड में रहने वाले वासणारहित योगी भी ध्यान किया करते हैं ॥५०॥ .इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकोनविंशतितमः सर्गः । (४९) सुर्जननृपः श्रीविश्वनाथानुग्रहात् काश्यां देहपातेन स्वर्गराज्यं तृणमिव परित्यज्य परब्रह्मणि यदा लीनस्तदा रम्भाप्रभृतयोऽप्सरसः राज्ञि शृङ्गारभावनाविरहिताः सम्पन्नाः, इन्द्रश्च राजा स्वर्गसिंहासनार्धमधिकु- र्यादिति भयविमुक्तः समग्रसिंहासनोपभोगेन पूर्णानन्दमन्वभवत् ।
विंशतितमः सर्गः शान्तिं गते सुर्जनरायसूर्ये सद्योभिभूतस्तमसा घनेन । व्यापारहीनाः परितोऽतिदीना द्विजा निजावासमुपेत्य लीनाः ॥ १ ॥ राव सुर्जन रूपी सूर्य के अस्त हो जाने पर, चारों ओर घने अन्धकार से अभिभूत, व्यापार- हीन, अत्यन्त दीन द्विज (ब्राह्मण ; पक्षी) अपने अपने घरों में (घोंसलों में) जाकर छिप गये ॥१॥ पात्रं निपीताम्बु यथाम्बुराशेरुद्धान्तरत्नं च धरान्तरालम् । त्यक्तं तथा तेन तथाविधेन तमोमयं विश्वमिदं बभूव ॥ २ ॥ ऐसे राव सुर्जन द्वारा त्यक्त यह संसार अन्धकारमय हो गया और जल पी लेने पर रिक्त पात्र के समान अथवा रत्न निकाल लिये जाने पर समुद्र के रिक्त धरातल के समान शून्य हो गया ॥२॥ अर्थेन शून्यं सदनं बुधानां शब्देन शून्यं वदनं कवीनाम् । वदान्यशून्या ववृते धरित्री तस्यावसाने जगदुत्तमस्य ॥ ३ ॥ जगत् में उत्तम राव सुर्जन के शान्त हो जाने पर [विद्वानों का घर] अर्थ (धन) से रहित हो गया, कवियों का मुख शब्द से रहित हो गया औ[र यह पृथ्वी दानियों से र]हित हो गई ॥ ३ ॥ निर्वाहके सर्वमनीषितानां निर्वाणमासङ्[गिनि]... चिरात् निवृत्ता नयनाम्बुधारा दरिद्रदाराननमाललम्बे ॥ ४ ॥ सब लोगों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले राव सुर्जन के मोक्ष प्राप्त कर लेने [पर] बहुत देर बाद जो आँसुओं की धारा रुकी उसने जाकर दरिद्रों की पत्नियों के मुखों को... ॥ ४ ॥ आकारणं कारणमन्तरेण कालेप्यकालेऽपि कुतूहलेन । पुण्यैरशून्यानतिसूनृतानि स्मितोपगूढानि च भाषितानि । वयस्यताविष्कृतिपेशलानि राज्ञोऽपि सप्रश्रयचेष्टितानि । प्रेम्णोपनीतान्यपि भोज्यवस्तून्यल्पप्रमाणान्यपि मानदानि । दिने दिने दैन्यविदारणानि दानान्यनेकानि सभूषणानि । अनुक्षणं भावयतां द्विजानां सभासदां सीदति न स्म शोकः समय पर अथवा असमय पर, सकारण अथवा अकारण, राव सुर्जन के [द्वारा] [क]हे गये वे पुण्यशील सत्य वचन, वे मुस्कान युक्त भाषण, राजा होने पर भी उनकी [मित्रता] सूचित करने में चतुर वे प्रणययुक्त चेष्टायें, थोड़े होने पर भी सम्मान को व्यक्त करने वाले प्रेमपूर्वक लाये गये वे खाद्य पदार्थ, और प्रतिदिन दीनता को नष्ट करने वाले और आभूषणों से युक्त वे नाना प्रकार के दान—इन सबको प्रति पल याद करने वाले द्विजातीय सभासदों का शोक कम नहीं हुआ ॥५-७॥
विंशतितमः सर्गः २२१ अथाभिषेक्तुं नृपतेस्तनूजं भोजं भुजास्कन्दितवैरिवृन्दम् । सन्मन्त्रभाजः सचिवाः पुराणाः पुरोधसश्च त्वरिता बभूवुः ॥८॥ इसके बाद राव सुर्जन के पुत्र राजकुमार भोज का, जिन्होंने अपने भुजबल से शत्रुसमूह को पराजित कर दिया था, राज्याभिषेक करने के लिये, उत्तम नीति के ज्ञाता प्राचीन मंत्री और पुरो- हित शीघ्रता करने लगे ॥८॥ जित्वा जगद् गुर्जरराजभूमिं हूमायुँजस्य प्रसहं जिघृक्षोः । अग्रेसरीभूय रिपून् विनिघ्नंस्ततान तोषं पृथुपौरुषो यः ॥९॥ जगत् को जीत कर गुर्जर देश को हठात् अपने आधीन करने की इच्छा रखने वाले हुमायूँ- पुत्र अकबर के आगे आगे चल कर महापराक्रमी राजकुमार भोज ने शत्रुओं को मार कर अकबर को प्रसन्न किया ॥९॥ दृगञ्जनं वैरिवधूजनस्य पपौ रिपूणामतनोत् तमांसि । स्नेहस्य पात्रं समपूरयच्च प्रतापदीपोऽद्भुत एव यस्य ॥१०॥ राजकुमार भोज का प्रताप रूपी दीपक अद्भुत है। वह शत्रु-स्त्रियों की आँखों के काजल को नष्ट कर देता है (शत्रु-स्त्रियों द्वारा काजल नहीं लगाया जाता), शत्रुओं के लिये अन्धकार फैला देता है और प्रेम-पात्र (मित्रों और प्रजा वर्ग) पूर्ण किया करता है। (साधारण दीपक काजल उत्पन्न करता है, अन्धकार नष्ट करता है और तैल के पात्र को रिक्त कर देता है) ॥१०॥ अभ्यर्णसंस्थ [...] ऽप्यनुरागेऽप्यलं न साऽऽरोढुमभूत् तदङ्कम् । प्रतीक्षमाणाऽस्य महाभिषेकं कन्येव पाणिग्रहणं नृपश्रीः ॥११॥ [...] लक्ष्मी यद्यपि राजकुमार भोज के पास ही रहती थी और उनमें उसका पूर्ण प्रेम था तथापि [...] गोद में बैठने में संकोच करती थी और इसके लिये उनके राज्याभिषेक की [...] कर रही थी, जिस प्रकार कोई कुमारी किसी व्यक्ति से पूर्ण प्रेम करती हो और उसके पास ही [...] ती हो तो भी उसकी गोद में बैठने के लिये विवाह की प्रतीक्षा किया करती है ॥११॥ [...] श्रुत्वा कुमारस्य महाभिषेकतूर्यध्वनिं ताण्डवितं वितेनुः । [...] प्रमोदेन यथा मयूरास्तपात्यये तोयदनादमत्ताः ॥१२॥ [...] कुमार भोज के राज्याभिषेक की सूचना देने वाले शहनाई के शब्दों को सुन कर लोग आनन्द [...] उठे, जैसे ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु में मेघों की गर्जना सुन कर मस्त मोर आनन्द से नाच [...] ॥१२॥ [...] विपञ्चीरणितं मनोज्ञं तिरोदधे दुन्दुभिधीरघोषः । [L30: यथा रतान्तर्मणितं वधूनां मञ्जीरकाञ्चीजनितो निनादः ॥१३॥ नगाड़ों के गंभीर शब्दों ने बजती हुई वीणा के सुन्दर स्वरों को छिपा दिया, जैसे स्त्रियों के (संभोग के समय होने वाले) नूपुर (घुंघरू) और रशना (करधनी) के शब्द उनके रतिकूजित को छिपा देते हैं ॥१३॥
२२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नानादिगन्तादथ दन्तिमुख्यमुपायनीकृत्य पदार्थजातम् । सेवाविशेषं विशदी करिष्यंस्तस्थौ चिरं द्वारि नरेन्द्रलोकः ॥१४॥ नाना देश विदेशों से आये हुये राजा लोग, उत्तम हाथी और अन्य विशिष्ट वस्तुओं को भेंट देकर, अपनी विशेष सेवा को प्रकट करने के लिये, बहुत देर तक द्वार पर खड़े रहे ॥१४॥ प्रीत्या नृपस्योपरतस्य केचिद् वयस्यतामस्य विभाव्य केऽपि । भयेन भूपा मिलितास्तथाऽन्ये परे त्वनौचित्यनिवारणाय ॥१५॥ कुछ राजा तो दिवंगत राव सुर्जन के प्रेम के कारण आये, कुछ राजा राजकुमार भोज के मित्र होने के कारण आये, कुछ राजा भय के कारण आये और कुछ अनौचित्य का निवारण मात्र करने के लिये एकत्रित हुये ॥१५॥ सुपर्वसिन्धुप्रभृतीः स्रवन्तीः समुद्रमुख्यांश्च नदानुपेत्य । सरांसि पुण्यानि च पुष्करादीन्युपानयन् नीरमथाऽप्तभृत्याः ॥१६॥ योग्य कर्मचारी गंगा आदि नदियों से, मुख्य मुख्य समुद्रों से और पुष्कर आदि पवित्र सरोवरों से (महाभिषेक के लिये) जल लाये ॥१६॥ तत्रान्तरङ्गैर्गणकैर्गुणाढयैर्मुहुर्मुहूर्तं महितं विचार्य । उपक्रमे मङ्गलकर्मणोऽस्य सच्छ्रोत्रिया[स्त्वस्तमया]न्तः ॥१७॥ घनिष्ठ सम्बन्ध वाले गुणवान् ज्योतिषियों [ने मुहूर्त] में बार बार विचार करके श्रेष्ठ कर्मकांडी विद्वान् राजकुमार के राज्या[भिषेक को] प्रारंभ करने के लिये, स्वस्तिवाचन करने लगे ॥१७॥ व्यासात्मजश्चक्रधरो धुरीणो धराभृतः कृत्यविधौ समग्र । तातं पुरस्कृत्य पुरोऽवतस्थे जगद्धिते कर्मणि जागरूकः ॥१८॥ संसार में हित करने वाले कर्मों में जागरूक तथा समस्त राजसंस्कारों [में प्रवीण] राज- पुरोहित गोपाल व्यास के पुत्र चक्रधर व्यास, अपने पिता को आगे करके राज्या[भिषेक] का सारा कार्य अपने तत्त्वावधान में करा रहे थे ॥१८॥ तथेतरे तत्र रथन्तरज्ञा ब्राह्मं महः प्राज्यतमं दधानाः तत्कालीनयोग्यानि जगुः समेताः सामानि सन्मङ्गलसाधना[नि ॥१९॥] अत्यन्त उत्कृष्ट ब्रह्मतेज को धारण करने वाले रथन्तर साम के विद्वान् एकत्र होकर उस समय के योग्य, शुभ और मंगलकारी, सामवेद के मंत्रों को गाने लगे ॥१९॥ उपात्तमङ्गल्यमहौषधीकैस्तीर्थाम्बुपूर्णैः कलशैरशून्याम् । भोजोऽथ जाम्बूनदबद्धवेदिं जगाम विद्वानभिषेकभूमिम् [॥२०॥] फिर विद्वान् भोज अभिषेक भूमि की ओर गये जहाँ सोने से जड़ी हुई [वेदी बनाई] गई थी और जहाँ सुवर्णकलश रक्खे हुये थे जिनमें विविध तीर्थों से लाये गये पवित्र जल भरे थे और मांग- लिक ओषधियाँ (वनस्पतियाँ आदि) पड़ी हुईं थीं ॥२०॥ (१९) रथन्तरं सामवेदस्य गीतिभेदः ।
CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri विंशतितमः सर्गः २२३ धाराऽथ वारां विशदाऽस्य मूर्ध्नि व्यरोचत स्फाटिककुम्भमुक्ता। पीयूषधारा मिहिकामयूखबिम्बात् पतन्तीव नगेशशृङ्गे ॥२१॥ अभिषेक के समय भोज के ऊपर स्वर्णकलश से गिरने वाली पवित्र जलधारा, हिमालय के शिखर पर चन्द्रविम्ब से गिरने वाली पीयूषधारा (किरणपुञ्ज की अमृत के समान शीतल और सुखद प्रकाश धारा) के समान सुशोभित हो रही थी ॥२१॥ तस्याऽभिषेकप्रभवानि तानि तोयानि शीतानि तनौ धृतानि। व्यसर्जयन् सूर्जनविप्रयोगजन्मानमुग्रं परितापमुर्व्याम् ॥२२॥ अभिषेक के समय भोज के शरीर पर गिरने वाले उन शीतल जलों ने पृथ्वी के, राव सूर्जन के वियोग से उत्पन्न, तीव्र सन्ताप को मिटा दिया ॥२२॥ मनोऽनुकूले कुलवर्धनोऽसौ शुद्धे दुकूले विशदे वसानः। राजश्रियो लोचनलोभनीयमाशिश्रिये मण्डनमुच्छ्रितश्रीः ॥२३॥ उत्कृष्ट शोभा वाले कुलवर्धन राजकुमार भोज ने मन के अनुकूल शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र धारण किये और फिर राज्यलक्ष्मी के नेत्रों को लुभाने वाले आभूषण पहिने ॥२३॥ यत्तर्जनीसङ्गविशेषिताऽसौ विशेषकश्रीर्नवनायकस्य। अतो बभूवाऽस्य विपक्षलक्ष्म्याः किल तर्जनी सा ॥२४॥ नये राजा राव भो[ज की ...] [त]र्जनी (अंगूठे के पास की उँगली) से राजतिलक किया गया उसकी शोभा [...] के लिये तर्जनी (धमकाने वाली) बन गई ॥२४॥ [..] गोरोचनाकुङ्कु[म ...] विशाले तिलकः कृतो यः। [स] एव मन्ये मनुजाधिपेऽस्मिन् जनानुरागाङ्कुरतां जगाहे ॥२५॥ राव भोज के विशाल ललाट पर जो गोरोचन और केसर से रंगीन लम्बा राजतिलक किया गया मान[हुँ] इस राजा में प्रजा के अनुराग का अंकुर बन गया ॥२५॥ [.. दूर्वा]ङ्कुरचारुगुच्छं मङ्गल्यमेकं स निजोत्तमाङ्गे। [...]ङ्कुराणि हर्म्याणि हन्त द्विषतामभूवन् ॥२६॥ [भोज] ने अपन[..] पर दूर्वादल (कुश) का एक सुन्दर और मांगलिक गुच्छा धारण किया, किन्तु उसके [शत्रु] राजाओं के महलों में बड़े बड़े दूर्वांकुर (दूब, कुश आदि घास फूस) उग गये अर्थात् [..]य से, अपने महल छोड़ कर, भाग गये और शून्य महलों में घास फूस उग गये [...] [...] भद्रकरः प्रजानां पट्टाम्बरस्रस्तरमारुरोह। सौ[...] भृतधातुरागं तमोपनोदाय मयूखमाली ॥२७॥ सुन[...] और प्रजा से कोमल कर लेने वाले उदीयमान राव भोज रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित [...] पर प्रजा के दुःख रूपी अन्धकार को दूर करने के लिये, गेरु आदि धातुओं से सुशोभित उदयाचल पर्वत पर अन्धकार को नष्ट करने के लिये उदीयमान कोमल किरणों वाले सूर्य के समान, आरूढ़ हुये ॥२७॥ (२३) मण्डनमाभूषणम्। Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi
२२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सिंहासनं हेमकृतं कुमारः पट्टाम्बरस्रस्तरमारुरोह । स्फुटं यथा मानसजं सरोजं परागसान्द्रच्छवि राजहंसः ॥२८॥ रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित सुवर्ण-सिंहासन पर आरूढ़ भोज, मानसरोवर के पराग से सुशो- भित कमल पर आरूढ़ राजहंस के समान सुशोभित हुये ॥२८॥ छायां धरित्र्याः स्वतनौ विलग्नां विहाय भीतः किमु शीतभानुः । आगः प्रमाष्टुं तदिवातपत्रमिषाद् धरित्रीरमणं सिषेवे ॥२९॥ भयभीत चन्द्रमा, अपने शरीर पर लगी हुई पृथिवी की छाया को छोड़ कर, अपने इस अपराध की क्षमा माँगने के लिये, निष्कलंक छत्र के बहाने, क्या पृथिवी-पति भोज की सेवा कर रहा था ? (किसी के शरीर पर पराई स्त्री की छाया पड़ना भी कलंक की बात है। पृथ्वी राजा की स्त्री है। उसकी छाया चन्द्रमा के शरीर पर पड़ी। इस अपराध की क्षमा माँगने के लिये मानों चन्द्रमा निष्कलंक छत्र बन कर राजा की सेवा कर रहा है। चन्द्रमा का धब्बा वास्तव में पृथ्वी की छाया ही है। छत्र निष्कलंक चन्द्रमा के समान शुभ्र और उज्ज्वल है।) ॥२९॥ तत्पार्श्वयोरायतमाप्तभृत्यैर्विधूयमानं विधुकान्तिगौरम् । प्रकीर्णकद्वन्द्वमुवाह शोभां तरङ्गयुग्मं किमु कीर्तिनद्याः ॥३०॥ राव भोज के दोनों ओर योग्य अनुचरों द्वारा डुलाये जाते हुये चन्द्रमा के समान शुभ्र और उज्ज्वल चँवर कीर्ति रूपी नदी के दो उज्ज्वल तरंगों के समान शोभा पा रहे थे ॥३०॥ अपि प्रकृत्या विशदं सुवर्णैः संयोजितं शिल्पविशेषविद्भिः । मुमोच तच्चामरयुग्ममस्य बालस्वभावान् न विलोलभावम् ॥३१॥ यद्यपि वे चँवर स्वभाव से ही स्वच्छ थे और कुशल कारीगरों द्वारा सुवर्ण में मढ़े गये थे फिर भी बालस्वभाव (बालों से निर्मित; बचपन) होने के कारण उन्होंने चंचलता नहीं छोड़ी ॥ ३१ ॥ प्रणेमुरेनं नमितारिलोकमालोकशब्देन कृतावधानम् । सामन्तसार्थाः सहमन्त्रिमूख्यैस्तथा परे भूपतयः प्रख्याताः ॥३२॥ शत्रुवर्ग को झुकाने वाले राव भोज को, जिन्हें अनुचर लोग 'महाराज की जय हो; अमुक व्यक्ति आये हैं' इस प्रकार निवेदन कर सावधान कर रहे थे, मुख्य मंत्रियों के साथ सामन्त लोगों ने और अन्य विख्यात राजाओं ने प्रणाम किया ॥३२॥ तं वन्दिनो नन्दितमित्रवर्गं नामान्वयज्ञा नमदाननेन्दुम् । गुणानगण्याननिशं गृणन्तः सन्तोषयामासुरसीमसत्त्वम् ॥३३॥ कुल के नामों को जानने वाले और रात दिन राव भोज के असंख्येय गुण गाने वाले चारण भाटों ने मित्रवर्ग को प्रसन्न करने वाले, झुके हुये मस्तक वाले और महान् पराक्रमी राव भोज को सन्तुष्ट किया ॥३३॥ (३२) आलोकशब्देन 'जयतु देवः, आलोकयतु देवः' इति शब्देन ।
२९ विंशतितमः सर्गः २२५ तस्मिन् महो सन्महसां द्विजानां समाजमभ्यर्च्य समाप्तकृत्यः । अव्याजमव्यग्रमनाः समग्रं वितत्य वित्तं विततार वेत्ता ॥३४॥ राज्यतिलक के उस उत्सव के समय, कार्य समाप्त कर लेने पर शान्तचित्त राव भोज ने निश्छल भाव से महान् तेजस्वी ब्राह्मणों के समाज की पूजा की और फिर विपुल धन बाँटा ॥३४॥ मान्यान् नरेन्द्राननुजीविनोऽथ मित्राणि बन्धून् गुणिनां गणांश्च । गजाश्वरत्नाम्बरभूषणाद्यैः संभावयामास यथोचितं सः ॥३५॥ राव भोज ने सम्मान्य राजाओं को, अनुचरों को, मित्रों को, बन्धुओं को और गुणी पुरुषों को उत्तम हाथी, घोड़े, रत्न, वस्त्र और आभूषणों द्वारा उचित रूप से सत्कृत किया ॥३५॥ तं भीमसेनं रिपवो वदन्ति कर्णस्य जेतारमथार्थिनो ये । धर्मप्रधाना धरणीभुजस्तु जानन्ति राजानमजातशत्रुम् ॥३६॥ राव भोज को शत्रु लोग 'भीमसेन' (भयानक सेना वाला; भीमसेन के समान पराक्रमी) कहते थे; याचक गण उन्हें 'कर्णविजयी' (अपने दान से दानवीर कर्ण को जीतने वाला; अर्जुन) कहते थे; और धार्मिक राजा उन्हें 'अजातशत्रु' (जिनका कोई शत्रु उत्पन्न नहीं हुआ; युधिष्ठिर) समझते थे ॥३६॥ विनीतदम्भो विनयेन नतोऽपि शिरस्त्वं न जहौ निजं सः । स्मितेन सिक्तान्यपि वचनानि वज्रोपमानि द्विषतां सदाऽऽसन् ॥३७॥ विनय से नम्र होने पर भी राव भोज ने दर्परहित स्वाभिमान के कारण अपना मस्तक ऊँचा ही रक्खा, उनके मुस्कान से मधुर वचन भी शत्रुओं के लिये सदा वज्रतुल्य होते थे ॥३७॥ असावधव्योऽपि नवाधिकाराज्जगन्मनोरञ्जनजागरूकः । प्रमाद...प्रवणैर्वचोभिः संभावयामास समग्रलोकम् ॥३८॥ ... होने पर भी, नवीन अधिकार के कारण, सदा जनरञ्जन करने में सावधानी बरतने वाले ... स्नेहसिक्त वचनों से सब लोगों का सत्कार किया ॥३८॥ ...द्विग्भयान्न राजा प्रचण्डभावं प्रकटीचकार । ...भुत्वस्य पुनः स्वभावात् तमुग्ररूपं ददृशुः पुरस्थाः ॥३९॥ प्रजा ... ग्न हो जाने के भय से राव भोज ने कभी प्रचण्ड भाव प्रकट नहीं किया; किन्तु पुरवासी ... प्रभुत्व के स्वभाव के कारण, उन्हें उग्र रूप में देखते थे ॥३९॥ ...तातिशयप्रमत्तैरकारि यैर्वाऽविनयोऽपि पूर्वम् । संत वतंसो विशदाशयानां सस्मार न प्राक्तनसेवकानाम् ॥४०॥ राव सुर्जन के उनसे अत्यन्त प्रसन्न रहने के कारण अभिमान में चूर जिन पुराने सेवकों ने पहले, जब भोज राजकुमार ही थे, इनके प्रति जो धृष्टता की थी उसे, उदार हृदयवाले लोगों के भूषण राव भोज ने कभी याद नहीं किया ॥४०॥
२२६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् विक्रान्तिराक्रामति न स्म नीतिं न ताञ्च नीतिः क्वचिदत्यशेत । विभज्य कालं द्वितयेऽपि विद्वान् साधारणीं प्रीतिमसौ दधार ॥४१॥ राव भोज का पराक्रम न तो राजनीति को दबाता था और न उनकी राजनीति पराक्रम की उपेक्षा करती थी; वे दोनों में बराबर प्रीति रख कर पराक्रम और राजनीति दोनों से काम लेते थे ॥४१॥ स्तोकप्रदाः केचन मानपूर्वं केचित् पुनस्तद्विपरीतकृत्याः । वित्तं प्रभूतं बहुमानताञ्च स एव वेदार्थिजनाय दातुम् ॥४२॥ कुछ लोग दान तो थोड़ा देते हैं, किन्तु देते हैं सम्मानपूर्वक; और कुछ लोग दान बहुत देते हैं, किन्तु सम्मानपूर्वक नहीं देते; एक राव भोज ही थे जो याचकों को अत्यन्त सम्मान के साथ विपुल द्रव्य देते थे ॥४२॥ उपेक्षिता ये क्षमया विपक्षाः पर्याप्तकृत्येन पुराऽस्य पित्रा । लीनश्चिरं चेतसि कालयोगात् तेषां ज्वरः [प्राण]हरो जजृम्भे ॥४३॥ पहले इनके पिता राव सुर्जन ने अपने आप को [समर्थ] मान कर क्षमा के कारण जिन शत्रुओं की उपेक्षा कर दी थी उन शत्रुओं के मन में चिर[काल से छि]पा हुआ प्राण हरने वाला ज्वर अब काल के कारण प्रवृद्ध हुआ ॥४३॥ प्रयात्ययं किन्तु मृगान् निहन्तुं किं वा सपत्नानिति संशयालोः । यानोन्मुखे कौतुकतोऽपि यस्मिन् पुरं वनं वा न सुखाय शत्रोः ॥४४॥ जब राव भोज कुतूहलवश चलते थे तब, यह निश्चय न करने के कारण कि भोज [शिकार] के लिये जा रहे हैं या शत्रुओं पर आक्रमण करने जा रहे हैं, शत्रुओं के [लिये न] नगर [में शा]न्ति थी और न वन में ॥४४॥ चापं समारोपितशिञ्जिनीकं सनाथयत्यस्य करे कदापि [।] स्वावासभूमौ परिवृत्तिमीयुः परस्परं वन्यमृगाः परे च ॥[४५॥] जब राव भोज अपने हाथ में प्रत्यंचा चढ़ा हुआ धनुष ले लेते थे तब वन्य [मृग और] शत्रु; परस्पर निवास स्थानों का विनिमय कर लेते थे अर्थात् शत्रु वन में भाग [जाते थे और] वन के जानवर शून्य नगर में चले आते थे ॥४५॥ (४१) कालिदासैरप्युक्तं रघुवंशे—'कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेता- भ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ।।' इति ।
विंशतितमः सर्गः २२७ जिष्णुः स्फुरद्वैरिवरूथिनीनां दुरात्मनां दण्डधरः खलानाम् । मित्रे प्रचेता धनदोऽर्थिवर्गे चतुर्दिगीशः स बभूव वीरः ॥४६॥ चारों दिशाओं के स्वामी वीर राव भोज उद्धत शत्रु सेनाओं के लिये 'जिष्णु' (विजयशील; इन्द्र) थे; कुबुद्धि वाले दुष्टों के लिये 'दण्डधर' (दमन करने वाले; यमराज) थे; मित्रों के लिये 'प्रचेता' (प्रसन्न चित्त वाले; वरुण) थे; और याचकों के लिये 'धनद' (धन देने वाले; कुबेर) थे । (इन्द्र पूर्व के, यम दक्षिण के, वरुण पश्चिम के और कुबेर उत्तर के स्वामी हैं) ॥४६॥ नवप्रभोस्तस्य नवं निदेशं नोष्णीषयामास मदान्नृपो यः । उष्णीषमायोधनसीम्नि तस्य मस्तिष्कलुब्धो विनिनाय गृध्रः ॥४७॥ नवीन राजा भोज के नवीन आदेश को जिस किसी राजा ने दुर्मद के कारण अपनी पगड़ी पर नहीं चढ़ाया, उस राजा की पगड़ी को, युद्धस्थल में, मस्तिष्कलोभी गिद्ध हटाता था ॥४७॥ और्वायितं शरणमम्बुनिधिं गतेषु दावायितं विततकाननमाश्रितेषु । वज्रायितं शिखरिसानुसनाथितेषु तस्योजितेन महसाऽरिमहीश्वरेषु ॥४८॥ राव भोज के महान् पराक्रम के कारण उनके शत्रु-राजाओं को कहीं भी शान्ति नहीं थी— यदि वे समुद्र की शरण लेते थे तो तस्य तेजःप्रताप वहाँ बड़वानल बन जाता था, यदि वे वन की शरण लेते थे तो भोज का प्रताप वहाँ भी दावाग्नि बन जाता था और यदि वे पर्वतों के शिखरों की शरण लेते थे तो भोज का प्रताप वहाँ वज्र बन जाता था ॥४८॥ दिक्पालोद्रिक्तदन्तिद्विरदबहलचलत्कर्णतालान् विलुम्प- न्नावृण्वन् व्योमनद्या निरतिशयरयं स्फारधाराविरावम् । रुन्धानोऽरुन्धतीशप्रभृतिसुरमुनिस्तोमस्सञ्चारधाम प्रोद्दामो यस्य यात्रासमयसमुचितो जृम्भते तूर्यनादः ॥४९॥ भोज की विजययात्रा के समय के उचित जो शहनाइयों का प्रचंड घोष होता था वह दिक्पालों के मदान्ध गजों के वेग से फड़फड़ाये गये कानों को फाड़ता था, तथा स्वर्गंगा के भयंकर शब्द करने वाले विस्तृत धाराप्रवाह के कोलाहल को भी ढक देता था और वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों के गमन के मार्ग को (आकाश को) रोक देता था ॥४९॥ अव्यग्रप्रवेलात्तुरगखरखुरक्षोदितक्षोणिपृष्ठ- स्पष्टप्रोद्भूतधूलीनिवहकवलितव्योमवीथिप्रदीपः । घोरभीमैः पटुपटहरवाडम्बरैरम्बरान्तं यो भिन्दन्नाजिभूमौ रिपुनृपतिचमूचक्रमाक्रामति स्म ॥५०॥ राव भोज युद्धभूमि में अपने अव्याकुल तथा जोरों से उछलने वाले घोड़ों के तीक्ष्ण खुरों से खोदी गई भूमि से स्पष्ट उठे हुये धूलसमूह के कारण सूर्य को भी ढक कर, और नगाड़ों और ढोलों के भयंकर घोषों से आकाश को भेद कर, शत्रुराजाओं के सेनामंडल पर आक्रमण करते थे ॥५०॥
३२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आलोकादेव लोकान् कवलयितुमिव प्रोद्यता तीव्रवेगा । दुष्टक्ष्मापालवक्षःक्षतजरसवसाकर्दमोद्दामरूपा । कल्पान्तक्रूरकालीविलुलितरसनासन्निभा शत्रुसैन्यै- रुद्गीता यस्य नेतुः समरभुवि करक्रोडगा खड्गवल्ली ॥५१॥ युद्धभूमि में राव भोज के हाथ में सुशोभित तलवार को शत्रु-सैनिक, अपनी चमक से ही लोगों को खा जाने के लिये उद्यत, तीव्र वेग वाली तथा दुष्ट राजाओं के वक्षःस्थल के रुधिर, मांस और चर्बी रूपी कीचड़ में सनी हुई प्रलय काल में क्रूर काली माई की लपलपाती हुई जीभ के समान मानते थे ॥५१॥ कांचिद्व्यालोलबालव्यजनपवनवत् प्रागनैषील्लघुत्वं कांश्चित् त्रस्तान् कुरङ्गानिव गुरुकृपया पालयामास बालान् । दृप्तानन्यान् मृगेन्द्रानिव शरनखरैर्भिन्दतः कुम्भिकुम्भा- नद्धा बद्धावधानः प्रशममगमयत् क्रूरशस्त्रेण शास्ता ॥५२॥ कुशल शासक राव भोज ने कुछ राजाओं को [...] ही चंचल बालों वाले चँवरों के वायु के समान लघु बना दिया था; कुछ बालक राजाओं [...] भयभीत हिरणों के समान शरण में आये, उन्होंने बड़ी कृपा से पालना की; और कुछ अन्य राजाओं को, जो अभिमानी सिंहों के समान अपने बाणरूपी नखों से हाथियों के गण्डस्थलों को छिन्नभिन्न कर रहे थे, उन्होंने सावधान होकर अपने तीक्ष्ण शस्त्र से झट शान्त कर दिया ॥५२॥ धावन्तो ये मदान्धा वनकरिन इवोत्क्षिप्तहस्तस्ति प्रहर्तुं [...] तेषामुच्छिद्य सद्यः समरभुवि शिरः कीर्ति[...]पहारिं [...] [L21
विंशतितमः सर्गः २२९ सुह्माः सङ्ग्रामजिह्माः सपदि दिशि दिशि प्राप्तभङ्गाश्च वङ्गाः वैदर्भा न्यस्तदर्भा निजदशनमधि त्रस्तदेहा विदेहाः । त्रैगर्ताः प्राप्तगर्ता ययुरथ विकला मालवाः कालबाधां गान्धारास्तीक्ष्णधाराहतिचकितधियः सिन्धुपारं प्रयाताः ॥५४॥ राव भोज के पराक्रम को देख कर सुह्म लोग युद्ध से विमुख हो गये और वङ्ग देश के लोग शीघ्र हार कर इधर उधर भाग गये । विदर्भ देश के लोग अपने दाँतों में तिनके ले लेकर शरण में आये । विदेह देश के लोगों के शरीर ढीले पड़ गये । त्रैगर्त लोग (विपद्) गर्त में गिर गये । मालव देश के लोग व्याकुल होकर कालबाधा को प्राप्त हो गये और गन्धार देश के लोग राव भोज की तेज तलवार के प्रहारों से चकित होकर सिन्धु के पार चले गये ॥५४॥ पण्डा मण्डाख्यदुर्गस्थितधरणिभुजो दत्तसर्वस्वदण्डा वन्ध्याः संध्यानखण्डादपि लघिमधृतः केपि विन्ध्याद्रिसंस्थाः । अन्ये मन्ये विलीनाः क्वचन विदधतो हन्त वन्येन वृत्तिं यस्योदग्रे रणाग्रे स्फुरति जितहरिन्मण्डले मण्डलाग्रे ॥५५॥ राव भोज की दिशाओं के मंडल को जीतने वाली तीक्ष्ण तलवार के युद्ध में चमकने पर मंड नामक दुर्ग में रहने वाले राजा सर्वस्व दंड देकर निर्वीर्य हो गये, विन्ध्य पर्वत में रहने वाले कोई कोई राजा हलके (तुच्छ) बन कर जरा भी ध्यान में न रह सके (अत्यन्त व्यग्र हो गये) और अन्य राजा, हमारे विचार से, वन्य वृत्ति .... करके इधर उधर विलीन हो गये ॥५५॥ पिण्डीभूततुषारपाण्डरतरे यस्यानुविन्ध्यं यशः- स्तोमे किन्नरकामिनीभिरभितः प्रोद्गीयमाने मुदा । प्रालेयाचलशङ्कया पितृगृहावासाय बद्धस्पृहा शैलेन्द्रं तमपोहितुं न सहते मन्ये नगेन्द्रात्मजा ॥५६॥ [विन्]ध्याचल [...] पर चारों ओर किन्नरकामिनियाँ राव भोज के शुभ्र यश को प्रसन्नता से गाती हैं [...] वह शुभ्र यश बर्फ के समान श्वेत और पिण्डीभूत बन कर विन्ध्याचल पर चारों ओर छा गया है । [हमारे] समझ में यही कारण है कि नैहर में रहने की इच्छुक भगवती विन्ध्य- वासिनी पार्वती [वि]न्ध्याचल को हिमालय समझ कर यहाँ से हटना नहीं चाहतीं ॥५६॥ तूर्[णं] सप्तापि तावद् विततजलनिधीन् सप्तलोकानुपेत्य क्रान्त्वा पातालभूमीरतनुवयवशात्क्रमात् सप्तसंख्याः । [ब्रह्मा]ण्डभाण्डाद् बहिरथ विवरं क्वापि नासादयन्ती [सङ्की]र्णेऽप्यस्य कीर्तिस्त्रिभुवनभवने स्थैर्यमालम्बते स्म ॥५७॥ राव [भोज की] कीर्ति सातों विस्तृत समुद्रों को तैर गई, सातों लोकों में फैल गई और सातों पातालों को बड़े वेग से पार कर गई ; इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाने पर भी जब उसे बाहर जाने का कोई मार्ग नहीं मिला तो वह इस संकीर्ण त्रिभुवन में ही स्थिर हो गई ॥५७॥ (५५) पण्डाः निर्वीर्याः । संध्यानखण्डात् स्वल्पध्यानादपि वंध्याः अतीव व्यग्रा इत्यर्थः ।
२३० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् न श्यामा न च सञ्चरेन्मृदुपदं क्षामोदरी नाप्यसौ निन्दन्तीव कलाभृतं वितनुते नग्नस्य कण्ठग्रहम् । प्रागल्भ्यात् कुलभूभृतामपि शिरांस्याश्रित्य नृत्यत्यहो तस्याभूत् तदपीयमद्भुतरुचेः कीर्तिः परा प्रेयसी ॥५८॥ यद्यपि कीर्ति न तो नवयुवती है, न वह मन्द सविलास चाल से चलती है, न वह पतली कमर वाली है, वह कलाधर (कला वाले पुरुष; चन्द्रमा) की निन्दा करती है (अर्थात् उसने अपनी कान्ति से चन्द्रमा को हीन बना दिया है), वह नंगे (शिव जी) के गले से लिपट रही है और उसका दुःसाहस इतना अधिक है कि वह कुल. के राजाओं (कुलाचल पर्वतों) के मस्तक पर चढ़ कर नाच रही है, तथापि आश्चर्य है कि अद्भुत रुचि वाले राव भोज की यह कीर्ति ही सबसे बड़ी प्रेयसी है ! ॥५८॥ बाले व्यालस्तवाग्रे दलय बलयुते कण्टकान् दुष्टकेशान् मन्दे मन्दप्रयाणं त्यज हतहृदये लग्नमार्चिनिचोले । द्रागुद्विग्ना दवाग्नेः प्रथममथ पुरः सञ्चरिष्णोः प्रतापात् कान्तारे मुक्तकान्ता मुहुरिति जगदुर्यस्य विद्वेषिकान्ताः ॥५९॥ राव भोज के शत्रुओं की स्त्रियाँ अपने पतियों से वियुक्त होकर वनों में भटकती हुईं पहले तो राव भोज के आगे चलने वाले प्रताप से और फिर दावानल से व्याकुल होकर एक दूसरे से इस प्रकार कहा करती थीं—बाले ! तेरे आगे साँप है (जरा बच कर चल) ; अरी तुझमें अभी तो कुछ बल है ! अपने इन बालों में उलझे हुये काँटों को तो हटा ले ; मन्द बुद्धि वाली ! ज़रा जल्दी जल्दी चल; अभागी ! तेरी चोली में आग लग गई है, इसे जल्दी से बुझा ॥५९॥ भ्राम्यन्ती वनसीम्नि वैरितरुणी जीर्णात् कदाचिद् गुणात् स्रस्तानि स्तनमौक्तिकानि विततान्यादातुकामा द्रुतम् । चिन्वाना बदराणि यस्य नृपतेः कीर्त्या दधत्यच्छतां वन्याभिर्विनिवार्यते युवतिभिः साक्षेप-साडम्बरः ॥६०॥ वन में भटकने वाली किसी शत्रु-युवती के स्तनों का हार-सूत्र टूट गया और उसके बड़े बड़े मोती नीचे बिखर गये, तब वह शीघ्र उनको उठाने के लिये झुकी, किन्तु भौं के बजाय मोतियों के, राव भोज की कीर्ति से श्वेत बने हुये बेरों को उठाने लगी और उस समय वन की स्त्रियों ने आक्षेपपूर्ण वचनों से उसे मना किया ॥६०॥ आत्मानं त्रिषु विष्टपेषु परितस्त्रेधा विभज्य स्वयं तन्वन् दिक्षु दशस्वपि स्थितिमतीरन्याश्च मूर्त्ती... क्लृप्तद्वादशमूर्त्तिमुष्णमहसं निर्जेतुमुत्कण्ठितः शङ्के संववृते त्रयोदशतनुर्यस्य प्रतापोच्चयः ॥६१॥ .बारह मूर्तियों वाले सूर्य को (द्वादश आदित्यों को) जीतने की उत्कंठा के कारण ही मानों राव भोज के प्रताप ने अपने आप को तीनों लोकों में और दसों दिशाओं में बाँट कर अपनी तेरह मूर्तियाँ बनाईं ॥६१॥