सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ये येऽत्र सन्ति बधिरान्धकदीननग्ना गृह्णन्तु ते द्रुतमुपेत्य समीहितानि । एवं वदद्भिरनुगैः प्रतिसंध्यमस्य नित्यं निदेशपटहः परिटाड्यते स्म ॥३२॥ नित्य सन्ध्या समय राजा के अनुचर ढोल पीट पीट कर सूचना दिया करते थे कि जो जो बहरे, अंध, अपाहिज, नंगे और दीन व्यक्ति हों वे सब शीघ्र आकर अपनी इच्छित वस्तुयें ले लें ॥३२॥ अन्नप्रवाहमनुवेलमनङ्गशत्रोः पुर्यां प्रवर्षति विशालकृपाकुलेऽस्मिन् । तद्वासिनां तनुभृतां भरणेषु चिन्तासन्तानमुज्झितवती चिरमन्नपूर्णा ॥३३॥ महान् दयालु राव सुर्जन के शिव पुरी काशी में प्रति दिन अन्न की वर्षा करते रहने के कारण भगवती अन्नपूर्णा ने, बहुत समय तक, वहाँ रहने वाले प्राणियों के भरण पोषण की चिन्ता छोड़ दी थी ॥३३॥ विश्राणयत्यनुदिनं ननु दीनबन्धौ तस्मिन्नसीमवसनान्यविशेषदृष्ट्या । आत्मस्वभावपरतन्त्रतया स्वतन्त्रोऽप्येकः परं पुरहरोऽजनि कृत्तिवासाः ॥३४॥ दीनबन्धु राव सुर्जन के प्रतिदिन, समदृष्टि होकर, असीम वस्त्र वितरण करते रहने के कारण केवल एक स्वतन्त्र भगवान् शिव ही ऐसे बच रहे थे जो अपने स्वभाव से लाचार होकर गजचर्म धारण करते थे ॥३४॥ म्लानानि हन्त वदनानि वनीयकानामालोकि... भूमिभर्ता । दैन्यं तु दानविभवेन परोक्षमेव तेषां... चकार ॥३५॥ दयार्द्रहृदय राव सुर्जन याचकों के मुरझाये हुये... ते थे इसलिये उन्होंने पहले ही अपने दान वैभव से लोगों की दीनता जला डाला... वीक्ष्य द्विजातिगणकर्मपरीक्षणेषु कालातिपातमयमायतमान्तरायम् । विश्राणनव्यसनवान् विससर्ज वित्तं यज्ञोपवीतमवगत्य स वीतमाय... ॥३६॥ दान देना ही जिनका व्यसन था और जो माया के आवरण को हटा चुके... र्जन ब्राह्मणोचित कर्मों की परीक्षा करने में विलम्ब रूपी बड़े भारी विघ्न को देख कर क... पवीत देख कर ही (लोगों को ब्राह्मण मान लेते थे और) उन्हें दान दे देते थे ॥३६॥ कैलासकौशलभृतो रचिता नृपेण देवालया रुरुचिरे दिवमु... न्तः । सिक्तस्य दानसलिलैः सततं तदीयैः शङ्के यशोमयतरोस्तरुणाः... ॥३७॥ राव सुर्जन ने कैलास के समान शुभ्र, सुन्दर और विशाल तथा आकाश को... ले देव मन्दिर बनवाये जो ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानों उनके दानसंकल्पों के जल से निरन्त... सींचे गये यश रूपी वृक्ष के नवीन अंकुर हों ॥३७॥ खाताश्च तेन परितो विपुलास्तडागाः पद्माटवीपटिमरजितर... येषु प्रविश्य विशदांशुमयूखमाला नक्तं मुहुर्मधुरिमादिगुणान... ॥३८॥ राव सुर्जन ने चारों ओर कई बड़े बड़े तालाब खुदवाये जिनके कमलसमूह में अनुरक्त राजहंस क्रीड़ा किया करते थे और जिनमें रात्रि के समय चन्द्रमा की किरणें प्रवेश करके बार बार माधुर्य आदि गुणों को सीखा करती थीं ॥३८॥