सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.२८ एकोनविंशतितमः सर्गः २१७ नो विद्महे नयविदाऽवनिपेन भूयः केनाशयेन विहिताः सलिलाशयास्ते । कामं तुषारसरसाः शतशः प्रणीतास्तस्य प्रदानपयसैव हि शैवलिन्यः ॥३९॥ हम नहीं जानते कि विद्वान् राव सुर्जन ने किस आशय से वे तालाब खुदवाये जब कि उनके दान संकल्पों के जल की अत्यन्त शीतल सैकड़ों नदियाँ पहले से ही बह रही थीं ? ॥३९॥ हैमं यदेव मणिभिर्भृतमुन्मयूखैर्विश्वेश्वराय झटिति प्रवरं किरीटम् । अह्नाय तद् विनिमयेन नवीनमिन्दुं देवोऽपि शेखरतया भृतवानमुष्मै ॥४०॥ जब राव सुर्जन ने शीघ्र ही उज्ज्वल किरणों वाले मणियों से जड़ा हुआ सोने का श्रेष्ठ किरीट भगवान् विश्वनाथ पर चढ़ाया तब भगवान् शिव ने भी झट उसके बदले में अपना नवचन्द्र रूपी किरीट राजा के मस्तक पर रख दिया अर्थात् शीघ्र राजा को मुक्त करके उन्हें चन्द्रशेखर अर्थात् शिवस्वरूप बना दिया ॥४०॥ किं पौरुषं यदिधिकाशि दधीचितुल्यस्तेने तुलामयमुपेष्यति मोक्षकाले । दानान्यदीनहृदयः कति वा न वारांस्तावन्ति हन्त निरवाहयदेत्य तीर्थम् ॥४१॥ महर्षि दधीचि के समान दानवीर राव सुर्जन ने यदि अपना मोक्षकाल समीप आने पर काशी में तुलादान किया तो क... द... प्रपञ्चहृदय वाले वे राजा ऐसे दान तो तीर्थ स्थानों में जाकर न जाने कितने... बार भी... यश्चानुवेलममिता... जाम्बूनदानि ददतो ववृते न तृप्तिः । तेऽर्पणाय वसु संनिहितं तुलायां तद्दानधर्मविहितस्थितिपालनाय ॥४२॥ जिन... सुर्जन..., याचकों को प्रति दिन अपरिमित सुवर्ण दान देने पर भी, तृप्ति नहीं हुई, उनका व... ढ़ाना केवल दानधर्म के विधान की रक्षा करने के लिये था ॥४२॥ ...थ तस्य चरमे परमात्मरूपं रामाख्यतारकमनुं जपतः स्वबुद्ध्या । ...य कर्णे... न्तकमन्धकारिः प्रीत्या चकार पुनरुक्ततयोपदेशम् ॥४३॥ ... अन्त सम... ट आ जाने पर परमात्मस्वरूप 'राम' इस तारक मन्त्र का अपनी बुद्धि के अनुसार ज... वाले राव सुर्जन के (दाहिने) कान के पास आकर भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर, पु... क्त करते हुये, उस मन्त्र का उपदेश दिया ॥४३॥ भूमी... खलोपि सवीश्वरोपि भृत्यं यथाविभवमेव पुरस्करोति । यत्... भमम्बरमैभकृत्तिं तस्मै ददे प्रमुदितोपि स कृत्तिवासाः ॥४४॥ स्वामी चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो और चाहे कितना ही प्रसन्नमुख क्यों न हो जाय, तथापि वह अपने सेवक को पुरस्कार अपने वैभव के अनुरूप ही देता है, यही कारण था कि भगवान् शिव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर भी राव सुर्जन को पहनने के लिये गजचर्म और सवारी के लिये बैल ही दिया (अर्थात् उन्हें मुक्त करके शिवस्वरूप बना दिया) ॥४४॥ ०