सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कल्पद्रुमः स जगतां सुमनोगणाय दत्वा फलानि कुसुमानि च शर्मदानि । पत्राणि चञ्चलतराण्यवकीर्य काले स्थाणुत्वमुत्तमयशाः स्थिरमाससाद ॥४५॥ जिस प्रकार स्वर्ग का कल्पवृक्ष देवताओं को आनन्ददायक फल, फूल और पत्ते देता है, उसी प्रकार मर्त्यलोक के कल्पवृक्ष (कल्पवृक्ष के समान लोगों की इच्छा पूर्ण करने वाले) राव सुर्जन ने देवताओं को आनन्ददायक फल, फूल और बेल पत्र इत्यादि चढ़ाये तथा विद्वानों का आनन्ददायक फल फूल आदि से सत्कार करके उन्हें दानपत्र भेंट किये, और जिस प्रकार फल, फूल तथा पत्तों के न रहने पर वृक्ष स्थाणु (ठूंठ) रह जाता है, उसी प्रकार अस्थिर फल, फूल और पत्र देकर राव सुर्जन भी सदा के लिये स्थिर स्थाणु (शिव) बन गये ॥४५॥ दिवोदासोप्यासीत् किल कतिपयानेव दिवसान् पुरा यस्याः काश्याः सुकृतनयविद्वानधिपतिः । अपूर्वं नैपुण्यं किमपि कृतवान् सुर्जननृपो यदैश्वर्यं तस्याः स्थिरतरमुपादत्त स कृती ॥४६॥ पहले इस काशी के राजा नीतिकुशल और पुण्यात्मा दिवोदास भी हुये थे जिन्होंने कुछ दिन तक इस काशी में सुन्दर शासन किया था, किन्तु कुशल राजा सुर्जन ने न जाने कौन सी अपूर्व निपुणता की कि उन्होंने इस काशी का स्थिर ऐश्वर्य ग्रहण कर लिया (काशी में देहत्याग करके मुक्ति प्राप्त कर ली) ॥४६॥ मध्येकाशि मधुद्विषा विरचिते चक्रे [सुरैर्दुष्प्रापे] दुष्प्रापे मणिकर्णिकेति [मुनिभिः ख्याते च ती]र्थाधिपे । राजा शूरजनो मनोजरिपुणा दत्तस्वहस्तः कृतः त्यक्त्वा प्राकृतदेहमायतसुखे लीनः परे ब्रह्मणि ॥४७॥ काशी के बीच में भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से जो इन्द्रादि देवताओं के लिये भी दुष्प्राप्य तीर्थ जिसे मुनि लोग मणिकर्णिका कहते हैं, (सुदर्शन चक्र से बनने के कारण [चक्रपुष्क]रणी भी कहते हैं) बनाया उसी तीर्थश्रेष्ठ में राव सुर्जन, अपना भौतिक शरीर त्या[ग कर, भ]गवान् शिव द्वारा बढ़ाये हाथ को पकड़ कर, अखण्डानन्दरूप परब्रह्म में लीन [हो गये] ॥४७॥ तत्पत्न्यः कनकावतीप्रभृतयो मग्नाः समिद्धार्चिषि प्राप्याशु प्रकटोज्वलं कनकवद् रूपं गरि[ष्ठं वपुः]म् । कल्पान्तावधि कल्पितेशवपुषा पत्या समं सङ्गताः कायव्यूहभृतो नगेन्द्रदुहितुः संजज्ञिरे [सख्यः] ॥४८॥ राव सुर्जन की कनकावती आदि पत्नियों ने चिता की अग्नि में जल गय[ा... अत्यन्त] चमत्क गौर- (४५) सुमनोगणाय देवसमूहाय विद्वद्वृन्दाय च । पत्राणि पर्णानि विल्वादिपत्रा[णि दानप]त्राणि च । स्थाणुत्वं फलपुष्पपत्ररहितवृक्षत्वं शिवत्वञ्च । (४६) दिवोदासः कियतो दिवसान् काश्यां सौराज्यं चकारेति काशीखण्डे स्पष्टम् । (४७) अत एव मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी इत्यपि प्रथिता । (४८) कल्पितं प्राप्तमीशस्य शिवस्य वपुर्विग्रहो येन तेन । कायव्यूहभृतः विविधदेहधारिण्याः ।