सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशतितमः सर्ग २१९ वान्न्वित तथा सुवर्ण के समान उज्ज्वल रूप प्राप्त किया और शिव शरीरधारी पति से सदा के लिये मिल कर वे भगवती पार्वती के विभिन्न रूप बन गईं ॥४८॥ निरारम्भा रम्भाप्रभृतिसुररामा ववृतिरे वृषा वीतातङ्कः समगत समग्रासनभुवा। विकीर्य स्वाराज्यं तृणमिव परब्रह्मणि नृपे रणस्तम्भोत्तंसे लयमयति शम्भोः करुणया ॥४९॥ रणस्तम्भपुर के भूषण राव सुर्जन के, भगवान् शिव की कृपा के कारण, स्वर्ग के राज्य को तृणवत् ठुकरा कर परब्रह्म में लीन हो जाने पर, रंभा आदि स्वर्ग की अप्सरायें विफल-प्रयत्न हो गईं और इन्द्र निर्भय होकर अपने सारे सिंहासन पर फैल पसर कर बैठे । (अप्सरायें सोच रही थीं कि राव सुर्जन स्वर्ग में आयेंगे और वे उनके साथ भोग विलास करेगी और इन्द्र को भय था कि उन्हें आधा सिंहासन देना पड़ेगा, किन्तु राव सुर्जन के परब्रह्म में लीन हो जाने पर अप्स- राओं की आशा और इन्द्र का भय, दोनों, विफल हो गये) ॥४९॥ किं चित्रं यदि नाम चित्रचरितं चारुस्वरैश्चारणा- स्तं गायन्ति सहाङ्गनाभिरनिशं मेरौ निषण्णाः सुखम् । ब्रह्मीभूतमुपास्य विश्वविभवेष्वेकं विश्रुतं ध्यायन्तोऽपि वशिनो ध्यायन्ति निर्वासनाः ॥५०॥ • विश्वविख्यात और राव सुर्जन के यश को यदि गन्धर्व, अपनी स्त्रियों के साथ, सुमेरु पर्वत पर सुखपूर्वक बैठकर सदा अपने सुन्दर स्वरों से गाते हैं तो इसमें क्या आश्चर्य है? ब्रह्मीभूत हो जाने के कारण सबके पूज्य बने हुये राव सुर्जन का तो ब्रह्माण्ड में रहने वाले वासणारहित योगी भी ध्यान किया करते हैं ॥५०॥ .इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकोनविंशतितमः सर्गः । (४९) सुर्जननृपः श्रीविश्वनाथानुग्रहात् काश्यां देहपातेन स्वर्गराज्यं तृणमिव परित्यज्य परब्रह्मणि यदा लीनस्तदा रम्भाप्रभृतयोऽप्सरसः राज्ञि शृङ्गारभावनाविरहिताः सम्पन्नाः, इन्द्रश्च राजा स्वर्गसिंहासनार्धमधिकु- र्यादिति भयविमुक्तः समग्रसिंहासनोपभोगेन पूर्णानन्दमन्वभवत् ।