सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशतितमः सर्गः शान्तिं गते सुर्जनरायसूर्ये सद्योभिभूतस्तमसा घनेन । व्यापारहीनाः परितोऽतिदीना द्विजा निजावासमुपेत्य लीनाः ॥ १ ॥ राव सुर्जन रूपी सूर्य के अस्त हो जाने पर, चारों ओर घने अन्धकार से अभिभूत, व्यापार- हीन, अत्यन्त दीन द्विज (ब्राह्मण ; पक्षी) अपने अपने घरों में (घोंसलों में) जाकर छिप गये ॥१॥ पात्रं निपीताम्बु यथाम्बुराशेरुद्धान्तरत्नं च धरान्तरालम् । त्यक्तं तथा तेन तथाविधेन तमोमयं विश्वमिदं बभूव ॥ २ ॥ ऐसे राव सुर्जन द्वारा त्यक्त यह संसार अन्धकारमय हो गया और जल पी लेने पर रिक्त पात्र के समान अथवा रत्न निकाल लिये जाने पर समुद्र के रिक्त धरातल के समान शून्य हो गया ॥२॥ अर्थेन शून्यं सदनं बुधानां शब्देन शून्यं वदनं कवीनाम् । वदान्यशून्या ववृते धरित्री तस्यावसाने जगदुत्तमस्य ॥ ३ ॥ जगत् में उत्तम राव सुर्जन के शान्त हो जाने पर [विद्वानों का घर] अर्थ (धन) से रहित हो गया, कवियों का मुख शब्द से रहित हो गया औ[र यह पृथ्वी दानियों से र]हित हो गई ॥ ३ ॥ निर्वाहके सर्वमनीषितानां निर्वाणमासङ्[गिनि]... चिरात् निवृत्ता नयनाम्बुधारा दरिद्रदाराननमाललम्बे ॥ ४ ॥ सब लोगों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले राव सुर्जन के मोक्ष प्राप्त कर लेने [पर] बहुत देर बाद जो आँसुओं की धारा रुकी उसने जाकर दरिद्रों की पत्नियों के मुखों को... ॥ ४ ॥ आकारणं कारणमन्तरेण कालेप्यकालेऽपि कुतूहलेन । पुण्यैरशून्यानतिसूनृतानि स्मितोपगूढानि च भाषितानि । वयस्यताविष्कृतिपेशलानि राज्ञोऽपि सप्रश्रयचेष्टितानि । प्रेम्णोपनीतान्यपि भोज्यवस्तून्यल्पप्रमाणान्यपि मानदानि । दिने दिने दैन्यविदारणानि दानान्यनेकानि सभूषणानि । अनुक्षणं भावयतां द्विजानां सभासदां सीदति न स्म शोकः समय पर अथवा असमय पर, सकारण अथवा अकारण, राव सुर्जन के [द्वारा] [क]हे गये वे पुण्यशील सत्य वचन, वे मुस्कान युक्त भाषण, राजा होने पर भी उनकी [मित्रता] सूचित करने में चतुर वे प्रणययुक्त चेष्टायें, थोड़े होने पर भी सम्मान को व्यक्त करने वाले प्रेमपूर्वक लाये गये वे खाद्य पदार्थ, और प्रतिदिन दीनता को नष्ट करने वाले और आभूषणों से युक्त वे नाना प्रकार के दान—इन सबको प्रति पल याद करने वाले द्विजातीय सभासदों का शोक कम नहीं हुआ ॥५-७॥