भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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विंशतितमः सर्गः २२१ अथाभिषेक्तुं नृपतेस्तनूजं भोजं भुजास्कन्दितवैरिवृन्दम् । सन्मन्त्रभाजः सचिवाः पुराणाः पुरोधसश्च त्वरिता बभूवुः ॥८॥ इसके बाद राव सुर्जन के पुत्र राजकुमार भोज का, जिन्होंने अपने भुजबल से शत्रुसमूह को पराजित कर दिया था, राज्याभिषेक करने के लिये, उत्तम नीति के ज्ञाता प्राचीन मंत्री और पुरो- हित शीघ्रता करने लगे ॥८॥ जित्वा जगद् गुर्जरराजभूमिं हूमायुँजस्य प्रसहं जिघृक्षोः । अग्रेसरीभूय रिपून् विनिघ्नंस्ततान तोषं पृथुपौरुषो यः ॥९॥ जगत् को जीत कर गुर्जर देश को हठात् अपने आधीन करने की इच्छा रखने वाले हुमायूँ- पुत्र अकबर के आगे आगे चल कर महापराक्रमी राजकुमार भोज ने शत्रुओं को मार कर अकबर को प्रसन्न किया ॥९॥ दृगञ्जनं वैरिवधूजनस्य पपौ रिपूणामतनोत् तमांसि । स्नेहस्य पात्रं समपूरयच्च प्रतापदीपोऽद्भुत एव यस्य ॥१०॥ राजकुमार भोज का प्रताप रूपी दीपक अद्भुत है। वह शत्रु-स्त्रियों की आँखों के काजल को नष्ट कर देता है (शत्रु-स्त्रियों द्वारा काजल नहीं लगाया जाता), शत्रुओं के लिये अन्धकार फैला देता है और प्रेम-पात्र (मित्रों और प्रजा वर्ग) पूर्ण किया करता है। (साधारण दीपक काजल उत्पन्न करता है, अन्धकार नष्ट करता है और तैल के पात्र को रिक्त कर देता है) ॥१०॥ अभ्यर्णसंस्थ [...] ऽप्यनुरागेऽप्यलं न साऽऽरोढुमभूत् तदङ्कम् । प्रतीक्षमाणाऽस्य महाभिषेकं कन्येव पाणिग्रहणं नृपश्रीः ॥११॥ [...] लक्ष्मी यद्यपि राजकुमार भोज के पास ही रहती थी और उनमें उसका पूर्ण प्रेम था तथापि [...] गोद में बैठने में संकोच करती थी और इसके लिये उनके राज्याभिषेक की [...] कर रही थी, जिस प्रकार कोई कुमारी किसी व्यक्ति से पूर्ण प्रेम करती हो और उसके पास ही [...] ती हो तो भी उसकी गोद में बैठने के लिये विवाह की प्रतीक्षा किया करती है ॥११॥ [...] श्रुत्वा कुमारस्य महाभिषेकतूर्यध्वनिं ताण्डवितं वितेनुः । [...] प्रमोदेन यथा मयूरास्तपात्यये तोयदनादमत्ताः ॥१२॥ [...] कुमार भोज के राज्याभिषेक की सूचना देने वाले शहनाई के शब्दों को सुन कर लोग आनन्द [...] उठे, जैसे ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु में मेघों की गर्जना सुन कर मस्त मोर आनन्द से नाच [...] ॥१२॥ [...] विपञ्चीरणितं मनोज्ञं तिरोदधे दुन्दुभिधीरघोषः । [L30: यथा रतान्तर्मणितं वधूनां मञ्जीरकाञ्चीजनितो निनादः ॥१३॥ नगाड़ों के गंभीर शब्दों ने बजती हुई वीणा के सुन्दर स्वरों को छिपा दिया, जैसे स्त्रियों के (संभोग के समय होने वाले) नूपुर (घुंघरू) और रशना (करधनी) के शब्द उनके रतिकूजित को छिपा देते हैं ॥१३॥