सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नानादिगन्तादथ दन्तिमुख्यमुपायनीकृत्य पदार्थजातम् । सेवाविशेषं विशदी करिष्यंस्तस्थौ चिरं द्वारि नरेन्द्रलोकः ॥१४॥ नाना देश विदेशों से आये हुये राजा लोग, उत्तम हाथी और अन्य विशिष्ट वस्तुओं को भेंट देकर, अपनी विशेष सेवा को प्रकट करने के लिये, बहुत देर तक द्वार पर खड़े रहे ॥१४॥ प्रीत्या नृपस्योपरतस्य केचिद् वयस्यतामस्य विभाव्य केऽपि । भयेन भूपा मिलितास्तथाऽन्ये परे त्वनौचित्यनिवारणाय ॥१५॥ कुछ राजा तो दिवंगत राव सुर्जन के प्रेम के कारण आये, कुछ राजा राजकुमार भोज के मित्र होने के कारण आये, कुछ राजा भय के कारण आये और कुछ अनौचित्य का निवारण मात्र करने के लिये एकत्रित हुये ॥१५॥ सुपर्वसिन्धुप्रभृतीः स्रवन्तीः समुद्रमुख्यांश्च नदानुपेत्य । सरांसि पुण्यानि च पुष्करादीन्युपानयन् नीरमथाऽप्तभृत्याः ॥१६॥ योग्य कर्मचारी गंगा आदि नदियों से, मुख्य मुख्य समुद्रों से और पुष्कर आदि पवित्र सरोवरों से (महाभिषेक के लिये) जल लाये ॥१६॥ तत्रान्तरङ्गैर्गणकैर्गुणाढयैर्मुहुर्मुहूर्तं महितं विचार्य । उपक्रमे मङ्गलकर्मणोऽस्य सच्छ्रोत्रिया[स्त्वस्तमया]न्तः ॥१७॥ घनिष्ठ सम्बन्ध वाले गुणवान् ज्योतिषियों [ने मुहूर्त] में बार बार विचार करके श्रेष्ठ कर्मकांडी विद्वान् राजकुमार के राज्या[भिषेक को] प्रारंभ करने के लिये, स्वस्तिवाचन करने लगे ॥१७॥ व्यासात्मजश्चक्रधरो धुरीणो धराभृतः कृत्यविधौ समग्र । तातं पुरस्कृत्य पुरोऽवतस्थे जगद्धिते कर्मणि जागरूकः ॥१८॥ संसार में हित करने वाले कर्मों में जागरूक तथा समस्त राजसंस्कारों [में प्रवीण] राज- पुरोहित गोपाल व्यास के पुत्र चक्रधर व्यास, अपने पिता को आगे करके राज्या[भिषेक] का सारा कार्य अपने तत्त्वावधान में करा रहे थे ॥१८॥ तथेतरे तत्र रथन्तरज्ञा ब्राह्मं महः प्राज्यतमं दधानाः तत्कालीनयोग्यानि जगुः समेताः सामानि सन्मङ्गलसाधना[नि ॥१९॥] अत्यन्त उत्कृष्ट ब्रह्मतेज को धारण करने वाले रथन्तर साम के विद्वान् एकत्र होकर उस समय के योग्य, शुभ और मंगलकारी, सामवेद के मंत्रों को गाने लगे ॥१९॥ उपात्तमङ्गल्यमहौषधीकैस्तीर्थाम्बुपूर्णैः कलशैरशून्याम् । भोजोऽथ जाम्बूनदबद्धवेदिं जगाम विद्वानभिषेकभूमिम् [॥२०॥] फिर विद्वान् भोज अभिषेक भूमि की ओर गये जहाँ सोने से जड़ी हुई [वेदी बनाई] गई थी और जहाँ सुवर्णकलश रक्खे हुये थे जिनमें विविध तीर्थों से लाये गये पवित्र जल भरे थे और मांग- लिक ओषधियाँ (वनस्पतियाँ आदि) पड़ी हुईं थीं ॥२०॥ (१९) रथन्तरं सामवेदस्य गीतिभेदः ।