सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आलोकादेव लोकान् कवलयितुमिव प्रोद्यता तीव्रवेगा । दुष्टक्ष्मापालवक्षःक्षतजरसवसाकर्दमोद्दामरूपा । कल्पान्तक्रूरकालीविलुलितरसनासन्निभा शत्रुसैन्यै- रुद्गीता यस्य नेतुः समरभुवि करक्रोडगा खड्गवल्ली ॥५१॥ युद्धभूमि में राव भोज के हाथ में सुशोभित तलवार को शत्रु-सैनिक, अपनी चमक से ही लोगों को खा जाने के लिये उद्यत, तीव्र वेग वाली तथा दुष्ट राजाओं के वक्षःस्थल के रुधिर, मांस और चर्बी रूपी कीचड़ में सनी हुई प्रलय काल में क्रूर काली माई की लपलपाती हुई जीभ के समान मानते थे ॥५१॥ कांचिद्व्यालोलबालव्यजनपवनवत् प्रागनैषील्लघुत्वं कांश्चित् त्रस्तान् कुरङ्गानिव गुरुकृपया पालयामास बालान् । दृप्तानन्यान् मृगेन्द्रानिव शरनखरैर्भिन्दतः कुम्भिकुम्भा- नद्धा बद्धावधानः प्रशममगमयत् क्रूरशस्त्रेण शास्ता ॥५२॥ कुशल शासक राव भोज ने कुछ राजाओं को [...] ही चंचल बालों वाले चँवरों के वायु के समान लघु बना दिया था; कुछ बालक राजाओं [...] भयभीत हिरणों के समान शरण में आये, उन्होंने बड़ी कृपा से पालना की; और कुछ अन्य राजाओं को, जो अभिमानी सिंहों के समान अपने बाणरूपी नखों से हाथियों के गण्डस्थलों को छिन्नभिन्न कर रहे थे, उन्होंने सावधान होकर अपने तीक्ष्ण शस्त्र से झट शान्त कर दिया ॥५२॥ धावन्तो ये मदान्धा वनकरिन इवोत्क्षिप्तहस्तस्ति प्रहर्तुं [...] तेषामुच्छिद्य सद्यः समरभुवि शिरः कीर्ति[...]पहारिं [...] [L21