भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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विंशतितमः सर्गः २२९ सुह्माः सङ्ग्रामजिह्माः सपदि दिशि दिशि प्राप्तभङ्गाश्च वङ्गाः वैदर्भा न्यस्तदर्भा निजदशनमधि त्रस्तदेहा विदेहाः । त्रैगर्ताः प्राप्तगर्ता ययुरथ विकला मालवाः कालबाधां गान्धारास्तीक्ष्णधाराहतिचकितधियः सिन्धुपारं प्रयाताः ॥५४॥ राव भोज के पराक्रम को देख कर सुह्म लोग युद्ध से विमुख हो गये और वङ्ग देश के लोग शीघ्र हार कर इधर उधर भाग गये । विदर्भ देश के लोग अपने दाँतों में तिनके ले लेकर शरण में आये । विदेह देश के लोगों के शरीर ढीले पड़ गये । त्रैगर्त लोग (विपद्) गर्त में गिर गये । मालव देश के लोग व्याकुल होकर कालबाधा को प्राप्त हो गये और गन्धार देश के लोग राव भोज की तेज तलवार के प्रहारों से चकित होकर सिन्धु के पार चले गये ॥५४॥ पण्डा मण्डाख्यदुर्गस्थितधरणिभुजो दत्तसर्वस्वदण्डा वन्ध्याः संध्यानखण्डादपि लघिमधृतः केपि विन्ध्याद्रिसंस्थाः । अन्ये मन्ये विलीनाः क्वचन विदधतो हन्त वन्येन वृत्तिं यस्योदग्रे रणाग्रे स्फुरति जितहरिन्मण्डले मण्डलाग्रे ॥५५॥ राव भोज की दिशाओं के मंडल को जीतने वाली तीक्ष्ण तलवार के युद्ध में चमकने पर मंड नामक दुर्ग में रहने वाले राजा सर्वस्व दंड देकर निर्वीर्य हो गये, विन्ध्य पर्वत में रहने वाले कोई कोई राजा हलके (तुच्छ) बन कर जरा भी ध्यान में न रह सके (अत्यन्त व्यग्र हो गये) और अन्य राजा, हमारे विचार से, वन्य वृत्ति .... करके इधर उधर विलीन हो गये ॥५५॥ पिण्डीभूततुषारपाण्डरतरे यस्यानुविन्ध्यं यशः- स्तोमे किन्नरकामिनीभिरभितः प्रोद्गीयमाने मुदा । प्रालेयाचलशङ्कया पितृगृहावासाय बद्धस्पृहा शैलेन्द्रं तमपोहितुं न सहते मन्ये नगेन्द्रात्मजा ॥५६॥ [विन्]ध्याचल [...] पर चारों ओर किन्नरकामिनियाँ राव भोज के शुभ्र यश को प्रसन्नता से गाती हैं [...] वह शुभ्र यश बर्फ के समान श्वेत और पिण्डीभूत बन कर विन्ध्याचल पर चारों ओर छा गया है । [हमारे] समझ में यही कारण है कि नैहर में रहने की इच्छुक भगवती विन्ध्य- वासिनी पार्वती [वि]न्ध्याचल को हिमालय समझ कर यहाँ से हटना नहीं चाहतीं ॥५६॥ तूर्[णं] सप्तापि तावद् विततजलनिधीन् सप्तलोकानुपेत्य क्रान्त्वा पातालभूमीरतनुवयवशात्क्रमात् सप्तसंख्याः । [ब्रह्मा]ण्डभाण्डाद् बहिरथ विवरं क्वापि नासादयन्ती [सङ्की]र्णेऽप्यस्य कीर्तिस्त्रिभुवनभवने स्थैर्यमालम्बते स्म ॥५७॥ राव [भोज की] कीर्ति सातों विस्तृत समुद्रों को तैर गई, सातों लोकों में फैल गई और सातों पातालों को बड़े वेग से पार कर गई ; इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाने पर भी जब उसे बाहर जाने का कोई मार्ग नहीं मिला तो वह इस संकीर्ण त्रिभुवन में ही स्थिर हो गई ॥५७॥ (५५) पण्डाः निर्वीर्याः । संध्यानखण्डात् स्वल्पध्यानादपि वंध्याः अतीव व्यग्रा इत्यर्थः ।