सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् न श्यामा न च सञ्चरेन्मृदुपदं क्षामोदरी नाप्यसौ निन्दन्तीव कलाभृतं वितनुते नग्नस्य कण्ठग्रहम् । प्रागल्भ्यात् कुलभूभृतामपि शिरांस्याश्रित्य नृत्यत्यहो तस्याभूत् तदपीयमद्भुतरुचेः कीर्तिः परा प्रेयसी ॥५८॥ यद्यपि कीर्ति न तो नवयुवती है, न वह मन्द सविलास चाल से चलती है, न वह पतली कमर वाली है, वह कलाधर (कला वाले पुरुष; चन्द्रमा) की निन्दा करती है (अर्थात् उसने अपनी कान्ति से चन्द्रमा को हीन बना दिया है), वह नंगे (शिव जी) के गले से लिपट रही है और उसका दुःसाहस इतना अधिक है कि वह कुल. के राजाओं (कुलाचल पर्वतों) के मस्तक पर चढ़ कर नाच रही है, तथापि आश्चर्य है कि अद्भुत रुचि वाले राव भोज की यह कीर्ति ही सबसे बड़ी प्रेयसी है ! ॥५८॥ बाले व्यालस्तवाग्रे दलय बलयुते कण्टकान् दुष्टकेशान् मन्दे मन्दप्रयाणं त्यज हतहृदये लग्नमार्चिनिचोले । द्रागुद्विग्ना दवाग्नेः प्रथममथ पुरः सञ्चरिष्णोः प्रतापात् कान्तारे मुक्तकान्ता मुहुरिति जगदुर्यस्य विद्वेषिकान्ताः ॥५९॥ राव भोज के शत्रुओं की स्त्रियाँ अपने पतियों से वियुक्त होकर वनों में भटकती हुईं पहले तो राव भोज के आगे चलने वाले प्रताप से और फिर दावानल से व्याकुल होकर एक दूसरे से इस प्रकार कहा करती थीं—बाले ! तेरे आगे साँप है (जरा बच कर चल) ; अरी तुझमें अभी तो कुछ बल है ! अपने इन बालों में उलझे हुये काँटों को तो हटा ले ; मन्द बुद्धि वाली ! ज़रा जल्दी जल्दी चल; अभागी ! तेरी चोली में आग लग गई है, इसे जल्दी से बुझा ॥५९॥ भ्राम्यन्ती वनसीम्नि वैरितरुणी जीर्णात् कदाचिद् गुणात् स्रस्तानि स्तनमौक्तिकानि विततान्यादातुकामा द्रुतम् । चिन्वाना बदराणि यस्य नृपतेः कीर्त्या दधत्यच्छतां वन्याभिर्विनिवार्यते युवतिभिः साक्षेप-साडम्बरः ॥६०॥ वन में भटकने वाली किसी शत्रु-युवती के स्तनों का हार-सूत्र टूट गया और उसके बड़े बड़े मोती नीचे बिखर गये, तब वह शीघ्र उनको उठाने के लिये झुकी, किन्तु भौं के बजाय मोतियों के, राव भोज की कीर्ति से श्वेत बने हुये बेरों को उठाने लगी और उस समय वन की स्त्रियों ने आक्षेपपूर्ण वचनों से उसे मना किया ॥६०॥ आत्मानं त्रिषु विष्टपेषु परितस्त्रेधा विभज्य स्वयं तन्वन् दिक्षु दशस्वपि स्थितिमतीरन्याश्च मूर्त्ती... क्लृप्तद्वादशमूर्त्तिमुष्णमहसं निर्जेतुमुत्कण्ठितः शङ्के संववृते त्रयोदशतनुर्यस्य प्रतापोच्चयः ॥६१॥ .बारह मूर्तियों वाले सूर्य को (द्वादश आदित्यों को) जीतने की उत्कंठा के कारण ही मानों राव भोज के प्रताप ने अपने आप को तीनों लोकों में और दसों दिशाओं में बाँट कर अपनी तेरह मूर्तियाँ बनाईं ॥६१॥