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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 256 में से

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विंशतितमः सर्गः २२७ जिष्णुः स्फुरद्वैरिवरूथिनीनां दुरात्मनां दण्डधरः खलानाम् । मित्रे प्रचेता धनदोऽर्थिवर्गे चतुर्दिगीशः स बभूव वीरः ॥४६॥ चारों दिशाओं के स्वामी वीर राव भोज उद्धत शत्रु सेनाओं के लिये 'जिष्णु' (विजयशील; इन्द्र) थे; कुबुद्धि वाले दुष्टों के लिये 'दण्डधर' (दमन करने वाले; यमराज) थे; मित्रों के लिये 'प्रचेता' (प्रसन्न चित्त वाले; वरुण) थे; और याचकों के लिये 'धनद' (धन देने वाले; कुबेर) थे । (इन्द्र पूर्व के, यम दक्षिण के, वरुण पश्चिम के और कुबेर उत्तर के स्वामी हैं) ॥४६॥ नवप्रभोस्तस्य नवं निदेशं नोष्णीषयामास मदान्नृपो यः । उष्णीषमायोधनसीम्नि तस्य मस्तिष्कलुब्धो विनिनाय गृध्रः ॥४७॥ नवीन राजा भोज के नवीन आदेश को जिस किसी राजा ने दुर्मद के कारण अपनी पगड़ी पर नहीं चढ़ाया, उस राजा की पगड़ी को, युद्धस्थल में, मस्तिष्कलोभी गिद्ध हटाता था ॥४७॥ और्वायितं शरणमम्बुनिधिं गतेषु दावायितं विततकाननमाश्रितेषु । वज्रायितं शिखरिसानुसनाथितेषु तस्योजितेन महसाऽरिमहीश्वरेषु ॥४८॥ राव भोज के महान् पराक्रम के कारण उनके शत्रु-राजाओं को कहीं भी शान्ति नहीं थी— यदि वे समुद्र की शरण लेते थे तो तस्य तेजःप्रताप वहाँ बड़वानल बन जाता था, यदि वे वन की शरण लेते थे तो भोज का प्रताप वहाँ भी दावाग्नि बन जाता था और यदि वे पर्वतों के शिखरों की शरण लेते थे तो भोज का प्रताप वहाँ वज्र बन जाता था ॥४८॥ दिक्पालोद्रिक्तदन्तिद्विरदबहलचलत्कर्णतालान् विलुम्प- न्नावृण्वन् व्योमनद्या निरतिशयरयं स्फारधाराविरावम् । रुन्धानोऽरुन्धतीशप्रभृतिसुरमुनिस्तोमस्सञ्चारधाम प्रोद्दामो यस्य यात्रासमयसमुचितो जृम्भते तूर्यनादः ॥४९॥ भोज की विजययात्रा के समय के उचित जो शहनाइयों का प्रचंड घोष होता था वह दिक्पालों के मदान्ध गजों के वेग से फड़फड़ाये गये कानों को फाड़ता था, तथा स्वर्गंगा के भयंकर शब्द करने वाले विस्तृत धाराप्रवाह के कोलाहल को भी ढक देता था और वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों के गमन के मार्ग को (आकाश को) रोक देता था ॥४९॥ अव्यग्रप्रवेलात्तुरगखरखुरक्षोदितक्षोणिपृष्ठ- स्पष्टप्रोद्भूतधूलीनिवहकवलितव्योमवीथिप्रदीपः । घोरभीमैः पटुपटहरवाडम्बरैरम्बरान्तं यो भिन्दन्नाजिभूमौ रिपुनृपतिचमूचक्रमाक्रामति स्म ॥५०॥ राव भोज युद्धभूमि में अपने अव्याकुल तथा जोरों से उछलने वाले घोड़ों के तीक्ष्ण खुरों से खोदी गई भूमि से स्पष्ट उठे हुये धूलसमूह के कारण सूर्य को भी ढक कर, और नगाड़ों और ढोलों के भयंकर घोषों से आकाश को भेद कर, शत्रुराजाओं के सेनामंडल पर आक्रमण करते थे ॥५०॥

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