भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 252

२२६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् विक्रान्तिराक्रामति न स्म नीतिं न ताञ्च नीतिः क्वचिदत्यशेत । विभज्य कालं द्वितयेऽपि विद्वान् साधारणीं प्रीतिमसौ दधार ॥४१॥ राव भोज का पराक्रम न तो राजनीति को दबाता था और न उनकी राजनीति पराक्रम की उपेक्षा करती थी; वे दोनों में बराबर प्रीति रख कर पराक्रम और राजनीति दोनों से काम लेते थे ॥४१॥ स्तोकप्रदाः केचन मानपूर्वं केचित् पुनस्तद्विपरीतकृत्याः । वित्तं प्रभूतं बहुमानताञ्च स एव वेदार्थिजनाय दातुम् ॥४२॥ कुछ लोग दान तो थोड़ा देते हैं, किन्तु देते हैं सम्मानपूर्वक; और कुछ लोग दान बहुत देते हैं, किन्तु सम्मानपूर्वक नहीं देते; एक राव भोज ही थे जो याचकों को अत्यन्त सम्मान के साथ विपुल द्रव्य देते थे ॥४२॥ उपेक्षिता ये क्षमया विपक्षाः पर्याप्तकृत्येन पुराऽस्य पित्रा । लीनश्चिरं चेतसि कालयोगात् तेषां ज्वरः [प्राण]हरो जजृम्भे ॥४३॥ पहले इनके पिता राव सुर्जन ने अपने आप को [समर्थ] मान कर क्षमा के कारण जिन शत्रुओं की उपेक्षा कर दी थी उन शत्रुओं के मन में चिर[काल से छि]पा हुआ प्राण हरने वाला ज्वर अब काल के कारण प्रवृद्ध हुआ ॥४३॥ प्रयात्ययं किन्तु मृगान् निहन्तुं किं वा सपत्नानिति संशयालोः । यानोन्मुखे कौतुकतोऽपि यस्मिन् पुरं वनं वा न सुखाय शत्रोः ॥४४॥ जब राव भोज कुतूहलवश चलते थे तब, यह निश्चय न करने के कारण कि भोज [शिकार] के लिये जा रहे हैं या शत्रुओं पर आक्रमण करने जा रहे हैं, शत्रुओं के [लिये न] नगर [में शा]न्ति थी और न वन में ॥४४॥ चापं समारोपितशिञ्जिनीकं सनाथयत्यस्य करे कदापि [।] स्वावासभूमौ परिवृत्तिमीयुः परस्परं वन्यमृगाः परे च ॥[४५॥] जब राव भोज अपने हाथ में प्रत्यंचा चढ़ा हुआ धनुष ले लेते थे तब वन्य [मृग और] शत्रु; परस्पर निवास स्थानों का विनिमय कर लेते थे अर्थात् शत्रु वन में भाग [जाते थे और] वन के जानवर शून्य नगर में चले आते थे ॥४५॥ (४१) कालिदासैरप्युक्तं रघुवंशे—'कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेता- भ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ।।' इति ।