भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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२९ विंशतितमः सर्गः २२५ तस्मिन् महो सन्महसां द्विजानां समाजमभ्यर्च्य समाप्तकृत्यः । अव्याजमव्यग्रमनाः समग्रं वितत्य वित्तं विततार वेत्ता ॥३४॥ राज्यतिलक के उस उत्सव के समय, कार्य समाप्त कर लेने पर शान्तचित्त राव भोज ने निश्छल भाव से महान् तेजस्वी ब्राह्मणों के समाज की पूजा की और फिर विपुल धन बाँटा ॥३४॥ मान्यान् नरेन्द्राननुजीविनोऽथ मित्राणि बन्धून् गुणिनां गणांश्च । गजाश्वरत्नाम्बरभूषणाद्यैः संभावयामास यथोचितं सः ॥३५॥ राव भोज ने सम्मान्य राजाओं को, अनुचरों को, मित्रों को, बन्धुओं को और गुणी पुरुषों को उत्तम हाथी, घोड़े, रत्न, वस्त्र और आभूषणों द्वारा उचित रूप से सत्कृत किया ॥३५॥ तं भीमसेनं रिपवो वदन्ति कर्णस्य जेतारमथार्थिनो ये । धर्मप्रधाना धरणीभुजस्तु जानन्ति राजानमजातशत्रुम् ॥३६॥ राव भोज को शत्रु लोग 'भीमसेन' (भयानक सेना वाला; भीमसेन के समान पराक्रमी) कहते थे; याचक गण उन्हें 'कर्णविजयी' (अपने दान से दानवीर कर्ण को जीतने वाला; अर्जुन) कहते थे; और धार्मिक राजा उन्हें 'अजातशत्रु' (जिनका कोई शत्रु उत्पन्न नहीं हुआ; युधिष्ठिर) समझते थे ॥३६॥ विनीतदम्भो विनयेन नतोऽपि शिरस्त्वं न जहौ निजं सः । स्मितेन सिक्तान्यपि वचनानि वज्रोपमानि द्विषतां सदाऽऽसन् ॥३७॥ विनय से नम्र होने पर भी राव भोज ने दर्परहित स्वाभिमान के कारण अपना मस्तक ऊँचा ही रक्खा, उनके मुस्कान से मधुर वचन भी शत्रुओं के लिये सदा वज्रतुल्य होते थे ॥३७॥ असावधव्योऽपि नवाधिकाराज्जगन्मनोरञ्जनजागरूकः । प्रमाद...प्रवणैर्वचोभिः संभावयामास समग्रलोकम् ॥३८॥ ... होने पर भी, नवीन अधिकार के कारण, सदा जनरञ्जन करने में सावधानी बरतने वाले ... स्नेहसिक्त वचनों से सब लोगों का सत्कार किया ॥३८॥ ...द्विग्भयान्न राजा प्रचण्डभावं प्रकटीचकार । ...भुत्वस्य पुनः स्वभावात् तमुग्ररूपं ददृशुः पुरस्थाः ॥३९॥ प्रजा ... ग्न हो जाने के भय से राव भोज ने कभी प्रचण्ड भाव प्रकट नहीं किया; किन्तु पुरवासी ... प्रभुत्व के स्वभाव के कारण, उन्हें उग्र रूप में देखते थे ॥३९॥ ...तातिशयप्रमत्तैरकारि यैर्वाऽविनयोऽपि पूर्वम् । संत वतंसो विशदाशयानां सस्मार न प्राक्तनसेवकानाम् ॥४०॥ राव सुर्जन के उनसे अत्यन्त प्रसन्न रहने के कारण अभिमान में चूर जिन पुराने सेवकों ने पहले, जब भोज राजकुमार ही थे, इनके प्रति जो धृष्टता की थी उसे, उदार हृदयवाले लोगों के भूषण राव भोज ने कभी याद नहीं किया ॥४०॥