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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

१९४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमानमन्नेव ममैष चापः क्ष्मापालमुख्यान् नमयाञ्चकार । निदानमस्मिन् नितरामुदग्रा भवादृशामेव पराक्रमर्द्धिः ॥४१॥ मेरे इस धनुष ने बिना झुके ही (क्योंकि इस पर प्रत्यंचा चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं हुई) बड़े बड़े श्रेष्ठ राजाओं को झुका दिया है—इसका कारण भी आप जैसे वीरों का अत्यन्त प्रबल पराक्रम ही है ॥४१॥ यशांसि युष्माकमहो जिहीर्षुर्जगत्प्रकाशान्यपि जाङ्गलोऽयम् । मध्येमृधं धामभृतां नृपाणां यान्यर्जितान्यूर्जितविक्रमेण ॥४२॥ आप लोगों ने युद्ध में बड़े बड़े तेजस्वी राजाओं को परास्त करके अपने प्रबल पराक्रम से जो जगद्विख्यात यश संचित किया है उस यश को आज यह जंगली मिटा देना चाहता है ! ॥४२॥ अतः परं किन्नु विडम्बनं स्यादपत्रपायाः परमावधिर्वा । पृष्ठं परे यत् समितौ भटानां पश्यन्ति वक्षोऽपि कुलाङ्गनानाम् ॥४३॥ इससे बढ़ कर और क्या अपमान हो सकता है और इससे बढ़ कर लज्जा की और कौन-सी पराकाष्ठा हो सकती है कि लोग वीरों की युद्ध में पीठ और कुलीन स्त्रियों का वक्षःस्थल देख सकें ! ॥४३॥ कार्यं समीचीनमथेतरद् वा निर्वाहकाले कुरुते नरो यत् । तत् प्राक्प्रणीतं विपरीतकृत्यं प्रमाष्टि यस्तस्य वश्यम् ॥४४॥ आपत्काल में पुरुष जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है वह अवश्य ही पहले किये गये बड़े भारी बुरे या अच्छे कार्य को भी मिटा देता है ॥४४॥ पराजितेऽस्मिन्नपरं शरव्यं भवद्विधानां न महीतलेऽस्मिन् । वेलाविलासावधि वारिराशेर्वशीकृतं तत् खलु विश्वमेव ॥४५॥ इसे पराजित कर देने पर इस भूमंडल में आप जैसों के बाणों का और लक्ष्य नहीं बचता क्योंकि फिर समुद्र तट तक सारा विश्व अपने ही वश में है ॥४५॥ इतीरितास्ते प्रभुणा प्रवीरा ह्रिया च भीत्या च निवर्तिताश्वाः । शूरं प्रजह्नुः समकालमेव निजैर्निजैर्निर्दयमुद्धतास्त्रैः ॥४६॥ अपने सम्राट् द्वारा इस प्रकार प्रेरित उन यवन वीरों ने लज्जा और भय के कारण अपने अपने घोड़े वापस लौटा लिये और उन सबने अपने अपने उद्धत शस्त्रों से निर्दयतापूर्वक एक साथ वीर सुर्जन पर प्रहार किये ॥४६॥ चिरं परिश्रान्तिपरीतदेहः श्वसन् सफेनप्लुतशोणितास्यः । अथास्य वाहः परवाहिनोशैः शिलीमुखैस्तीक्ष्णमुखैरघानि ॥४७॥ इसके बाद उन शत्रुसेनापतियों ने राव सुर्जन के घोड़े को, जिसका शरीर अत्यन्त परिश्रम के कारण चूर-चूर हो रहा था, जो बुरी तरह हाँफ रहा था और जिसके मुँह से फेन और खून निकल रहा था, अपने तेज बाणों से मार दिया ॥४७॥

सप्तदशः सर्गः १९५ यावत् तुरङ्गं पतनोन्मुखं तं विहाय वाहान्तरमभ्युपैति । तावद् विपक्षाः किल चापमौर्वीमुर्वीपतेस्तस्य विलनवन्तः ॥४८॥ जिस समय राव सुर्जन उस गिरने वाले घोड़े को छोड़ कर दूसरे घोड़े पर चढ़ रहे थे उसी समय शत्रुओं ने उनके धनुष की प्रत्यंचा को काट दिया ॥४८॥ बाणासनं तद् विनिकार्य विद्वाञ्जवेन जग्राह स मण्डलाग्रम् । तं भीममूर्तिर्भ्रमयन् बभासे यथा दिनेशः परिवेषसङ्गात् ॥४९॥ विद्वान् सुर्जन ने शीघ्र उस धनुष को फेंक कर वेग से तलवार हाथ में ले ली और भयंकर रूप धर कर उस तलवार को चारों ओर घुमाते हुये वे परिधि से घिरे हुए सूर्य के समान शोभित हुए ॥४९॥ कौक्षेयकाक्षेपपरिक्षतानां क्षितिक्षितां ख्यातविपक्षगानाम् । अक्षीणदाक्ष्यः क्षतजैरभीक्षमक्षालयत् क्षोणितलस्य कुक्षिम् ॥५०॥ युद्ध-कुशल राजा ने विख्यात शत्रु-राजाओं के अपनी तलवार के प्रहारों से उत्पन्न घावों से बहने वाले रुधिर से निरन्तर धरातल की कोख को पाट दिया ॥५०॥ विनिघ्नतस्तस्य समन्तस्तानरीन् नरेन्द्रस्य तुरङ्गमेन्द्रः । भ्रमन् विभाति स्म यथा मरालः स्फुरन्महावर्तविवर्तमानः ॥५१॥ शत्रुओं को मारने वाले राजा और उसका घोड़ा युद्धभूमि में चारों ओर घूमता हुआ, बड़ी भँवर में घूमने वाल हंस के [समान शोभित हो] रहा था ॥५१॥ अथापरे वैरि[वधैषिणोऽन्ये] विनिर्जितप्रोन्मदमेदिनीशाः । [म]र्माणि सम्भिद्यपि भेदयन्तः शस्त्रैः प्रजापालममुं प्रजह्रुः ॥५२॥ इसके [बाद] बड़े-बड़े उन्मद राजाओं को जीतने वाले अन्य शत्रु-सेनापतियों ने, राव सुर्जन के कवच [तथा व]क्षस्थल को भेदते हुये, शस्त्रों से उन पर प्रहार किये ॥५२॥ [अ]त्युग्रैः कङ्कटभेदिभिस्तैः प्रबाध्यमानाननुवेलमस्त्रैः । [अ]व्यग्रचेताः सममुग्रवेगात् प्रत्यग्रहीत् तान् प्रहराजतेजाः ॥५३॥ कवच [को भेदने] वाले अत्यन्त तीव्र शस्त्रों से लगातार प्रहार करने वाले उन शत्रु सेनापतियों के प्रहारों [को सूर्य] के समान तेजस्वी राव सुर्जन ने अव्यग्रचित्त होकर रोका और प्रबल वेग से उन पर वार करना प्रारंभ किया ॥५३॥ सम्भावयामास तमुग्रसत्त्वं हूमायूँजः सन्ततसाधुवादैः । सा स्यादसाधारणता गुणानां प्रमोद्येद् यद्विषतोपि चेतः ॥५४॥ महान् पराक्रमी राव सुर्जन की, हुमायूँ के पुत्र अकबर बार बार 'वाह वाह' कहते हुये, भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे; वास्तव में गुणों की असाधारणता वही है जो शत्रु के चित्त को भी प्रसन्न कर दे ॥५४॥ (५३) कंकटभेदिभिः कवचभेदिभिः ।

१९६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् गुरुसमरसमुत्थरेणुपूरैर्मलिनितमात्मवपुस्त्विषामधीशः । विमलयितुमिवोदके निमङ्क्षुश्चरमपयोनिधिसन्निधिं जगाम ॥५५॥ सूर्य भगवान् उस भीषण युद्ध में उड़ी हुई धूल के समूह से मैले बने हुये अपने शरीर को जल में डुबकी लगा कर साफ़ करने के लिये ही मानों पश्चिमी समुद्र के पास गए ॥५५॥ अकबरधरणोशः सन्निवृत्य स्वसैन्यं शिविरमुखमयासीद् वासरस्यावसाने बहलरुधिरधाराधोरणीधौतदेह- स्तदनु निववृते च क्षोणिपालः स्वदुर्गम् ॥५६॥ दिन डूबने पर सम्राट् अकबर अपनी सेना को लौटा कर शिविर की ओर चले और तब राजा सुर्जन भी, जिनके शरीर से गहरी रुधिर धारायें बह रहीं थीं, अपने दुर्ग में लौट गये ॥५६॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये सप्तदशः सर्गः।

अष्टादशः सर्गः यावदुद्यमभृतोऽस्य रणाय स्वैरमुल्लसति दुन्दुभिनादः । तावदेव सचिवः शकभर्तुः प्रातरेत्य मिलितः प्रतिहारे ॥ १ ॥ जिस समय युद्ध के लिये तैयार होने वाले राव सुर्जन के नगाड़ों के शब्द जोरों से बजने लगे, उसी समय प्रातःकाल अकबर के मंत्री (मानसिंह) द्वार पर मिलने आये ॥ १ ॥ अर्हणाभिरुचितोपचिताभिस्तेन चारुचरितेन स नीतः । संसदं मृदुपदां गुणगुर्वीमाददे गुरुमतिर्गिरमेताम् ॥ २ ॥ सुन्दर चरित्रवाले राजा सुर्जन उनको उचित आदर सत्कार के साथ सभा में ले आये और बुद्धिमान् मंत्री ने शब्दों से कोमल और गुणों से भारी ये वचन कहे ॥ २ ॥ आगतः स्वयमहं निखिलोर्वीसार्बभौमवचनव्यपदेशात् । सौहृदातिशयतः स्फुटबन्धोर्बोधनाय नयशालिवचोभिः ॥ ३ ॥ समस्त भूमंडल के सार्वभौम अकबर के आदेश के कारण मैं स्वयं यहाँ आया हूँ। आप मेरे बन्धु

१९८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नर्मदाश्रयविशेषपवित्रा ये भवन्ति विषया वसुपूर्णाः । जाह्नवीविमलवेणिविचित्रा पार्वतीपरिवृढस्य पुरी च ॥ ७ ॥ वासरेशसुतयाऽधिकशोभं मण्डलं च निखिलं मथुरायाः । गृह्यतां नियमतश्चिरकालं यद्यदिच्छसि परं च सुराज्यम् ॥ ८ ॥ एकमेव नृपते ! रणपूर्वस्तम्भदुर्गमिदमर्पय तस्मै । एवमेव हि शके शितुरस्य प्रीतियतिमती भवति स्यात् ॥ ९ ॥ नर्मदा के आश्रय के कारण विशेष रूप से पवित्र और धनधान्य से पूर्ण प्रदेश तथा पार्वतीपति भगवान् शिव की भागीरथी के निर्मल प्रवाह से पवित्र पुरी काशी एवं सूर्यसुता यमुना के कारण अधिक सुन्दर मथुरा का सम्पूर्ण मंडल तथा अन्य जो भी सुन्दर राज्य आप लेना चाहें वह सब आप नियमपूर्वक चिरकाल के लिये ग्रहण कीजिये, और राजन् ! केवल एक यह रणस्तम्भपुर का दुर्ग अकबर को समर्पण कीजिये । ऐसा करने पर ही यवन सम्राट् का प्रेम आपके प्रति विशाल होगा ॥७-९॥ कुर्वते समयतः खलु सन्धि बिभ्रतोऽपि बहलोज्ज्वलतेजः । वीतिहोत्रहरितोऽङ्कमुपास्ते शीतकालमधि घर्ममयूखः ॥१०॥ विशाल और उज्ज्वल तेजस्वी पुरुष भी समय देख [कर सन्धि करते] हैं; सूर्य भी शीतकाल में अग्नि की दिशा (आग्नेय कोण) की गोद में शरण [लेता है ॥१०॥] हीनशक्तिविभवेऽपि जयः स्यात् कुत्रचिद् [घूणाक्षर]कल्पः । तं विलोक्य न तु नीतिविरुद्धं बुद्धिमान् व्यवसितुं विदधीत ॥११॥ यदि शक्ति और वैभव रहित पुरुष को कहीं घूणाक्षरन्याय से विजय प्राप्त हो [भी] जाय, तो उसे देख कर बुद्धिमान् पुरुष को नीतिविरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिये ॥११॥ ये स्वतोऽधिकबलेषु न कुर्युः सन्धिमन्धितधियो गुरुगर्वात् । स्रोतसीव पतिताः प्रतिकूले ते व्रजन्ति न कदाचन पारम् ॥१२॥ जो लोग भारी अभिमान के कारण अन्धी बुद्धि वाले बन कर अपने से अधिक [बल]वान् शत्रु से सन्धि नहीं करते वे, प्रतिकूल प्रवाह में पड़े हुये प्राणियों के समान, क[भी पार] नहीं जा सकते ॥१२॥ म्लानतामयति यत्र न कीर्तिर्भूयसी क्षतिरुदेति न यस्मात् । तं बलीयसि विरोधिनि सन्धिं कुर्वतः क इव तेऽत्र विमर्शः ॥१३॥ जिसके कारण भारी हानि का उदय न हो और जिसके कारण कीर्ति भी मलिन न हो ऐसी सन्धि यदि बलवान् शत्रु के साथ हो सके तो इसे करने में आपके लिये इतने सोच-विचार की क्या आवश्यकता है ? ॥१३॥ (१०) वीतिहोत्रस्याग्नेः हरित आग्नेयकोणस्येत्यर्थः ।

अष्टादशः सर्गः १९९ सर्वथाऽधिकबलैः प्रतिपक्षै विग्रहे ग्रहिलतान्न हि गच्छेत् । कः प्रतीपतरचण्डसमीरं शर्म लिप्सुरभियाति रयेण ॥१५४॥ अपने से सब प्रकार अधिक बलशाली शत्रु से युद्ध करने के लिये दुराग्रह नहीं करना चाहिये । अपना कल्याण चाहने वाला कौन पुरुष अत्यन्त प्रचण्ड वायु के सामने वेग से दौड़ेगा ? ॥१५४॥ दुर्गमेकमुपनीय नृपास्मै गृह्यते यदि पुरत्रयमस्मात् । ईदृशा विनिमयेन बभूव प्रत्युताधिकतरस्तव लाभः ॥१५५॥ राजन् ! यदि आप इनको एक दुर्ग देकर इनसे तीन नगर ले लें, तो इस विनिमय से उलटे आपको ही अधिक लाभ है ॥१५५॥ ग्रन्थित्वमपदे किमु कुर्वन् खेदयस्यधिबलं यवनेशम् । किन्नु कर्णपदवीन्न गतस्ते जैत्रसिंहतनयस्य विपाकः ॥१५६॥ अस्थान में दुराग्रह करके आप सेना के साथ यवन सम्राट् को व्यर्थ में क्यों कष्ट दे रहे हैं ? क्या जैत्रसिंह के पुत्र हम्मीरदेव का परिणाम आपने नहीं सुना ? ॥१५६॥ वारिकाननमही...स्त्वग्रहीत् तदधिपान् स निगृह्य । शिष्यते परमि... तत्र यततेऽद्भुततेजाः ॥१५७॥ सम्राट् ने जल, वन अ... उनके स्वामियों को बन्दी बनाकर, जीत लिया है; केवल यह आप ही का दुर्ग म... इसलिये अद्भुत तेजस्वी सम्राट् इसको लेने का यत्न कर रहे हैं ॥१५७॥ ...क्ता प्रबलवैरिन्ृपालैः सद्गुणैश्च भवता धरणीयम् । ...वितरणाम्बुनदीभिः कीर्तिभिश्च भुवनं विशदाभिः ॥१५८॥ अ... इस पृथ्वी को प्रबल शत्रुओं के रुधिर से रक्त और अपने उत्तम गुणों से अनुरक्त बना र... है; आपने... विश्व को अपने दान जल की विस्तृत नदियों से पूर्ण और अपनी स्वच्छ... से... कर दिया है ॥१५८॥ ...तरमिहास्ति विधेयं शस्त्रचापतपसां नृपतीनाम् । पुण्यवानसि विनैव हि यत्नं सर्वमेव समपद्यत तत् ते ॥१५९॥ शस्त्र और धनुष-रूपी तप वाले राजाओं के लिये इसके बाद जो कर्तव्य शेष रह जाता है, वह बिना यत्न ही आपको मिल रहा है, अतः आप बड़े पुण्यात्मा हैं ॥१५९॥ नर्मदान्वयजशर्मदतोयां नर्मदां नियमवानवगाह्य । वीतशङ्कमधुना मधुरास्ताः पश्य पावनभुवो मधुरायाः ॥१२०॥ नर्मद के कुल के लोगों के लिये जिसका जल कल्याणकारक है ऐसी नर्मदा में नियमपूर्वक स्नान करके अब निःशंक होकर आप मथुरा की मधुर और पवित्र भूमि के दर्शन करें ॥१२०॥

२०० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्योतिरुज्जवलतरां यतयो यां शीलयन्ति सततं यतचित्ताः । अन्तरिक्षनगरीं गणभर्तुस्तां विलोक्य भवितासि कृतार्थः ॥२१॥ यति लोग यतचित्त होकर जिस अत्यन्त उज्ज्वल ज्योतिर्मयी भगवान् शिव की अन्तरिक्ष नगरी काशी का सदा सेवन किया करते हैं उसके दर्शन करके आप अपने आपको कृतार्थ कीजिये ॥२१॥ सोपपत्तिकमथाधिकपथ्यं भाषितं चिरममुष्य विचार्य । पुण्यतीर्थगमनाय मनीषी सोऽन्ववर्तत मनः शकभर्तुः ॥२२॥ मानसिंह के युक्तियुक्त और अत्यन्त हितकारी वचनों पर बहुत देर तक विचार करके, पुण्य तीर्थों में जाने के इच्छुक राव सुर्जन ने अकबर के मनोनुकूल कार्य कर दिया ॥२२॥ तं विसृज्य विषयं वशिवर्यस्त्वर्यमाण इव तीर्थविनोदैः । अन्वितः पुरजनैरनुरागान्निर्जगाम नगरान्नरनाथः ॥२३॥ संयमी पुरुषों में श्रेष्ठ राव सुर्जन उस प्रदेश को छोड़कर तीर्थों में जाने के लिये जल्दी करते हुये, प्रेम के कारण नागरिकों के साथ, नगर से चल दिये ॥२३॥ वासरैः कतिपयैः पतिरुर्व्याः सोऽथ वर्त्म वि...विलङ्घ्य । नर्मदामृदुसमीरसनाथं सन्निवेशमक... ॥२४॥ राजा सुर्जन ने कुछ दिनों में उस विस्तृत मार्ग ... के कोमल पवन से युक्त स्थान में अपनी सेना का शिविर बनाया ॥२४॥ नीत्वा स कत्यपि समा भुवि नर्मदायास्तद्वासिनो जनपदान् वशगान् कृत्वा । पुण्यामपूर्णसुकृतैर्मनुजैर्दुरापां प्राप प्रियां मधुपुरीं श्वसद... ॥२५॥ नर्मदा की भूमि में कुछ वर्ष रहकर और वहाँ के निवासी नागरिकों को व... के राव सुर्जन, अल्प पुण्य वाले पुरुषों के लिये दुष्प्राप्य तथा भगवान् कृष्ण की प्रिय, पुण्य...थुरा पहुँचे ॥२५॥ कालिन्दीपुलिनमथो विगाहमानं गोपालः स्वकुलपुरस्कृ... पुरोधाः । व्यासस्तं वशिनमुदाहरत् प्रमोदादुन्मीलन्मधुपुरमाधुरी... ॥२६॥ अपने कुटुम्बियों के साथ यमुना के तट का सेवन करने वाले, मथुरा पुरी के विक... सौन्दर्य में निमग्न, संयमी राव सुर्जन से उनके पुरोहित गोपाल व्यास ने प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार मथुरा का वर्णन किया ॥२६॥ रक्तोत्पलैरभिनवैरभितः स्फुरद्भिः स्फीतेन्द्रनीलमणिमेदुरमुग्धवेणिः । आभाति पातकतरुक्षतजाक्तधारा धर्मस्य खड्गलतिकेव कलिन्दकन्या ॥२७॥ किनारे-किनारे विकसित नवीन लाल कमलों के कारण उज्ज्वल नीलम के समान सुन्दर प्रवाह वाली यमुना, पापों के समूहों को मारने के कारण उनके रुधिर से सनी हुई धार वाली धर्म (यमराज) की तलवार के समान सुशोभित हो रही है ॥२७॥ ०

२६ अष्टादशः सर्गः २०१ स्वच्छात्मानः पावनीमेतदीयां वारां धारां स्वच्छशीतस्वभावम् । अम्भोवाहाः साधवोऽपि प्रकामं पीत्वा सद्यः कृष्णभावं भजन्ते ॥२८॥ इस यमुना के जल की पवित्र, नील और शीतल स्वभाव वाली धारा को पर्याप्त पीकर स्वच्छ शरीर वाले शुभ्र बादल शीघ्र काले बन जाते हैं और स्वच्छ हृदय वाले साधु पुरुष शीघ्र भगवान् श्रीकृष्ण-स्वरूप हो जाते हैं ॥२८॥ इयञ्च गीर्वाणतरङ्गिणी च कामं जगत्पावनतां दधाते । परन्तु धौतं पदमेव तस्यामियञ्जगाहे हरिणा विहारे ॥२९॥ यमुना और गंगा, दोनों ही, जगत् को पवित्र करती हैं; तथापि भगवान् श्रीकृष्ण ने गंगा में तो केवल पैर ही धोया, किन्तु इस यमुना में (गोपियों के साथ) जल-क्रीड़ा की। (जब वामन रूप भगवान् ने अपना एक पैर स्वर्ग में रक्खा तब ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु के जल से उस पैर को धोया, वह जल ही गंगा-रूप से तीनों लोकों को पवित्र कर रहा है) ॥२९॥ सेयं पुरी प्राणभृतां नमस्या को वेद सम्यङ् महिमानमस्याः । अजोऽपि यस्यां समजायताऽसौ जातो न भूयः समुपैति जन्म ॥३०॥ यह मथुरा पुरी प्राणियों के लिये पूज्य है। इसकी महिमा को ठीक-ठीक कौन जान सकता है ? इसमें भगवान् श्रीकृष्ण (जन्म रहित) होते हुये भी, जन्म लिया; और जो इसमें एक बार जन्म ले लेता है, वह फिर जन्म नहीं लेता (क्योंकि वह जन्म-मृत्युचक्र से छूटकर मुक्त हो जाता है) ॥३०॥ जन्माऽमुष्यां जन्मततीर्धुनोते मौञ्जीबन्धो हन्ति बन्धानुबन्धान् । मृत्युर्भिन्ते दारुणां मृत्युभीतिं दाहस्तीव्रांस्त्रासयेत् सर्वदाहान् ॥३१॥ इस मथुरा में जन्म लेना जन्म-परम्परा को मिटा देता है; इसमें यज्ञोपवीत लेकर मौञ्जी- बन्धन करना सब बन्धनों को काट देता है; इसमें मरने से मृत्यु का भीषण भय नष्ट हो जाता है (अर्थात् जन्म-मृत्यु का चक्र छूट जाता है) और इसमें दाह-संस्कार होने से सम्पूर्ण दाह (सांसा- रिक सन्ताप) छूट जाते हैं ॥३१॥ औत्तानपादतनयः प्रयतः सदाऽस्याः प्रासादशेखरपरिक्रमणं करोति । तद्यदत्र यदुवीरपदारविन्दमाराध्य स ध्रुवपदं पृथुकः प्रपेदे ॥३२॥ उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव सदा सावधान होकर इसके महलों के शिखरों की परिक्रमा करते हैं, यह ठीक ही है क्योंकि बालक ध्रुव ने भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की आराधना करके यहीं ध्रुवपद प्राप्त किया था ॥३२॥ चिराय विप्रोषितभर्तृका कथं ध्रियेत वैकुण्ठपुराधिदेवता । अजस्रमस्याः श्रितपीतवाससो न तां पताकापवनो यदि स्पृशेत् ॥३३॥ वैकुण्ठपुर की अधिदेवता, बहुत समय के लिये अपने पति से वियुक्त होकर, किस प्रकार धैर्य धारण करती, यदि निरन्तर पीताम्बर भगवान् कृष्ण का आश्रय लेनेवाली इस मथुरा की पताकाओं का पवन उसका स्पर्श नहीं किया करता ? ॥३३॥

२०२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमुना यमुनापथेन बालं हरिमङ्के विनिधाय धीरचेताः । अगमत् तमसि प्रकामभीमे वसुदेवः सदनाय गोपभर्तुः ॥३४॥ बालरूप भगवान् कृष्ण को अपनी गोद में लेकर धीरचित्त वसुदेव उस (भाद्रपद कृष्णाष्टमी के) भयंकर निविड़ अन्धकार में इसी यमुनामार्ग से गोपों के स्वामी नन्द के घर गये थे ॥३४॥ नामानि यस्य गृणतामिह जन्मभाजां संसारसिन्धुरपि गोष्पदतां प्रयाति । आश्चर्यमत्र किमिहानकदुन्दुभे स्तत्सङ्गेन मित्रतनयाऽजनि जानुदघ्नी ॥३५॥ इस संसार में जन्म लेने वाले प्राणियों के लिये जिन भगवान् श्रीकृष्ण के नामस्मरण के कारण यह अपार भवसागर भी गाय के खुर से पड़े हुये छोटे से गड्ढे में भरे हुये जल के समान (सरलता से पार करने योग्य) बन जाता है, उन भगवान् श्रीकृष्ण के संग के कारण (गोद में होने के कारण) वसुदेव के लिये यदि मित्रपुत्री (सूर्य की पुत्री; मित्र की पुत्री) यमुना घुटनों तक आने वाली बन गई (जैसे किसी व्यक्ति की गोद में बच्चे को देखकर उसके मित्र की छोटी बच्ची आकर उसके घुटनों से लिपट जाती है) तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ! ॥३५॥ संसारजाङ्गलपथश्रमखेदभाजां विश्रामदो मधुरिपुः स्वयमश्रमोऽपि । आकृष्य कंसमसकृद् रविणं जवेन विश्राम्यतिस्म... [तट]ेऽत्र कलिन्दजायाः ॥३६॥ इस संसार के बीहड़ जंगली मार्ग में चलने के परिश्र[म से उत्पन्न खेद] को विश्राम देने वाले मधुसूदन श्रीकृष्ण ने, स्वयं श्रमरहित होने पर भी, बार-[बार कं]स को वेग से खींच कर (मार कर), यमुना के इस तट पर विश्राम किया था [॥३६॥] कंसस्य काराभवनं तदेतन्नारायणोऽजायत यत्र [दे]वः । यद्दर्शनात् प्राणभृतो न भूयः संसारकाराभवनं विशन्ति ॥३७॥ यह कंस का कारागार है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था; इसके [दर्शन] से प्राणी फिर संसार-रूपी कारागार में प्रवेश नहीं करते ॥३७॥ दाम्ना मणीनां खचितेन हेम्ना शोणः क्वचिच्छोणितक[णैश्च] । करे हरेः कंसगजस्य दन्तः कौमोदकीकान्तिमिहाससाद ॥३८॥ सोने में जड़ी हुई मणियों की माला से सुशोभित और कहीं-कहीं रुधिर-रूपी [कणों के] लगने से लाल, कंस के हाथी का उखाड़ा हुआ दाँत, यहाँ भगवान् कृष्ण के हाथ में उनकी [कौमो]दकी गदा के समान शोभित हुआ ॥३८॥ प्रतिमन्दिरमिन्दिरासहायो वसतीह स्वयमेव वासुदेवः । अलिखन्निह कारवः समन्तात् परमेनं निजशिल्पकौशलाय ॥३९॥ मथुरा के प्रत्येक मन्दिर में भगवान् वासुदेव लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं; शिल्पियों ने उनकी प्रतिमायें केवल अपना शिल्पकौशल दिखाने के लिये ही बनाई हैं ॥३९॥ (३५) श्रीमद्भागवते (१०-२-३०) 'त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम्' इति ।

अष्टादशः सर्गः २०३ गृहे गृहे माथुरकामिनीनां मुखाम्बुजेभ्यश्चरितं मुरारेः । आकर्णयन् कंसवधादिवृत्तमस्यां जनो ह्यस्तनमेव वेद ॥४०॥ घर-घर में मथुरा की स्त्रियों के मुख-कमलों से भगवान् श्रीकृष्ण का कंसवध आदि चरित्र सुन कर लोग उसे कल ही हुआ समझते हैं ॥४०॥

अश्मन्ततीर्थं स कृती जगाम यत्र स्थितो दानपतिः प्रतीतः । अज्ञानजान्ध्यं विजहौ जलान्तर्मग्नोऽपि दामोदरवैभवेन ॥४१॥ पुण्यात्मा राव सुर्जन फिर अश्मन्त तीर्थ पहुँचे जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से अक्रूर ने (यमुना के) जल में निमग्न होकर भी (जड़ता अर्थात् मूर्खता में निमग्न होकर भी अथवा जड़ पदार्थों में आसक्त होने पर भी) अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को दूर कर दिया था ॥४१॥

वसन्तमुख्यैः समयैः स्वभावविरोधमुद्वास्य परस्परेण । निषेव्यमाणं युगपन्नृपोऽसौ वृन्दावनं पावनमन्वविन्दत् ॥४२॥ फिर राव सुर्जन उस [...] तीर्थ में पहुँचे जहाँ वसन्त आदि छहों ऋतुयें परस्पर विरोध छोड़ कर एक साथ रहती [...] द्वारा से [...]

स्मरस्य सेव[...]न्वशेषितश्रीर्वयसा नवेन । यत्कुञ्जभूमिर्भगवान् मुकुन्दः कृतार्थयामास पदार्पणेन ॥४३॥ काम[...] करने का अवसर देने वाले नवयौवन के कारण विशेष शोभा वाले भगवान् श्रीकृष्ण[...] वन की कुञ्जभूमि को अपने चरणारविन्दों के स्पर्श से धन्य बनाया था । (जैसे [...]म-पुत्र कामावतार प्रद्युम्न भगवान् के चरणों की सेवा करते थे, उसी प्रकार स्वयं कामदे[...] महायोगेश्वर के चरणों में ही लोटता रहता था ) ॥४३॥

[...] यत्र सनाथयन्तः शिखण्डिनामुन्मदताण्डवानि । [...]भिरूर्ध्वीकृतकण्ठनादा जगुर्मरालाश्च वनप्रियाश्च ॥४४॥ वृन्दावन में मोरों के मादक नृत्य का निरन्तर साथ देने के लिये कोयल और हंस, परस्पर स्पर्धा से, अपने कंठस्वर को ऊँचा करके गाया करते हैं ॥४४॥

(४३) स्मरस्य कामस्य कामावतारप्रद्युम्नस्य च । कामोऽपि श्रीकृष्णस्य पदाम्बुजमेव आश्रयति स्म । तदुक्तं श्रीमद्भागवते (१०-३३-२०) 'रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया' इति, 'यत्पादपंकजपरा- गनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः । स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः ॥' (१०-३३-३५) इति च ।

२०४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मनोजमौर्वीरवमेदुरेण क्वचिद्द्विरेफावलिहुङ्कृतेन । क्वचिच्च षड्जस्वरपारगानां केकाभिराकारितमन्मथाभिः ॥४५॥ विलासिनीशंसितपेशलाभिः क्वचित् पिकालीमृदुकाकलीभिः । अन्योन्यरागादनुबन्धिनीभिः क्वचित् कथाभिः शुकसारिकाणाम् ॥४६॥ रतप्रवृत्तोन्मदसारसाक्षीसाकूतकण्ठध्वनिकोमलेन । आकर्षता संयमिनोऽपि चेतः क्वचित् कपोतीघनघूत्कृतेन ॥४७॥ नृत्यत्तभ्रू रशनानिनादहृद्यैः क्वचित् सारसकण्ठघोषैः । नितम्बिनीनूपुरशिञ्जिताभैर्मरालयूनां निनदैः क्वचिच्च ॥४८॥ दात्यूहपारावततित्तिरीणां प्रत्यूहशून्यप्रतिनादभाजाम् । कोलाहलेन क्वचिदादधानं मनो जनस्य श्रवणैकतानम् ॥४९॥ कहीं पुष्पधन्वा कामदेव की धनुष-प्रत्यञ्चा की टंकार क समान मनोहर, भ्रमरों की गूँज सुनाई दे रही है। कहीं षड्ज स्वर के पारगामी विद्वान् मोरों की कामदेव को बुलाने वाली केका ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं विलासिनी कामिनियों की प्रणय-कथा के समान चतुर, कोयलों की कूकें श्रवणगोचर हो रही हैं। कहीं परस्पर अनुराग का अनुसरण करने वालीं, तोता मैना की प्रणयकथायें हो रही हैं। कहीं सारस के समान लाल नेत्रों वाली सम्भोग में उन्मत्त रमणी के साभिप्राय रति-कूजित के समान मृदु तथा संयमी पुरुषों के भी चित्त को आकर्षित करने वाले कबूतरियों के गहरे घूत्कार सुनाई दे रहे हैं। कहीं नृत्य करती स्त्रियों की रशना (करधनी) के स्वरों के समान मनोहर सारस पक्षियों के कंठस्वर और नितम्बिनी सुन्दरी (नर्तकी) के घुंघरुओं के शब्दों के समान सुन्दर, युवक हंसों के निनाद सुनाई पड़ रहे हैं। कहीं दात्यूहों (नीले कंठ वाली चिड़िया), कबूतरों और तीतरों का निर्विघ्न प्रतिध्वनि से प्रपूरित कोलाहल सुनाई दे रहा है। इन विविध शब्दों के कारण वृन्दावन में जाने वाले पुरुष का मन पूर्णतः ही एकाग्र हो जाता है ॥४५-४९॥ विचित्रकल्पद्रुमवेदिभाजां नानामणीनां खचितैर्मयूखैः । यत्रार्कपुत्री वलयिप्रवाहा बलद्विषश्चापरुचिं बभार ॥५०॥

  • विचित्र कल्पवृक्षों की वेदी पर स्थित नाना प्रकार के मणियों की किरणों की परम्परा से यमुना, अपनी भँवर के कारण, इन्द्रधनुष की शोभा धारण कर रही थी ॥५०॥ मुरजिन्मुखवीजितस्य वेणोः कलगीतामृतनिम्नगानि मग्नाः । जगदुत्तरतां जगाहिरै ता हरितो हेलिसुतासमीपभाजः ॥५१॥ यमुना के पास की दिशायें, भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से बजाई गई बाँसुरी के मनोहर गीत रूपी अमृतनदी में डूब कर संसार में अलौकिक लग रहीं थीं ॥५१॥ (४७) यथोक्तं—‘कान्ते तथा कथमपि प्रथितं मृगाक्ष्या चातुर्यमुद्गतमनोभवया रतेषु। तत्कूजितान्यनु- वदद्भिरनेकवारं शिष्यायितं गृहकपोतशतैर्यास्याः ॥’ इति । (४५-४९) श्रीमद्भागवते (३-१५-१८) उक्तं—"पारावतान्यभृतसारसचक्रवाकदात्यूहहंसशुकति- त्तिरिबर्हिणां यः। कोलाहलो विरमतेऽचिरमात्रमुच्चैर्भृङ्गाधिपे हरिकथामिव गायमाने ॥" इति ।

अष्टादशः सर्गः २०५ अवलम्ब्य कदम्बशाखिमूलं चिरमुल्लासितचारुचिल्लिवल्लिः । अहरत् कुतुकेन यत्र गोपीर्मुरलीकूजितकौशलेन कृष्णः ॥५२॥ इस वृन्दावन में कदम्बवृक्ष के तने का सहारा लेकर 'चिल्लि' नामक लताओं को झुमाते हुये भगवान् श्रीकृष्ण अपनी वंशीध्वनि के कौशल से गोपियों (के हृदयों को यों ही) हर लेते थे ॥५२॥ यस्य स्मृतावपि सपत्नतिरस्कृताया निःसीममम्बरमभूद् द्रुपदात्मजायाः । यत्राम्बराणि स लसत्कलसस्तनीनामस्तेनयद् विकचनीपवनीविलासी ॥५३॥ दुर्योधन दुःशासन आदि शत्रुओं द्वारा अपमानित द्रौपदी का वस्त्र, जिनके स्मरणमात्र से, सीमारहित बन गया, इस वृन्दावन के विकसित कदम्ब-कुञ्जों में विलास करने वाले उन भगवान् श्रीकृष्ण ने भी यहाँ कलशों के समान सुन्दर स्तनों वाली गोपियों के वस्त्र चुराये ॥५३॥ रासोत्सवे मण्डलिकाविलासमुपेयुषि प्रेयसि वल्लवीनाम् । भानूद्भवाया भ्रमिभङ्गभाजो विलुप्तमद्यापि न यत्र चिह्नम् ॥५४॥ जब गोपियों के प्राण भगवान् श्रीकृष्ण स्थल पर मंडल बना कर रासलीला करने के बाद गोपियों के साथ यमुना में वारिविहार के लिये उतरे, तब यमुनाजल में रासलीला का जो मंडल बना उस मंडलाकार चिह्न को आज भी यमुना अपनी भँवरों के रूप धारण कर रही है और वह चिह्न आज तक [विलुप्त नहीं हुआ] ॥५४॥ आकीर्य र... निकुञ्जकेलीशयनानि सायम् । गायन्ति यस्मि... द्वन्द्वानि नित्यं वनदेवतानाम् ॥५५॥ (इस वृन्दावन के क... सायंकाल कुञ्ज में भगवान् श्रीकृष्ण की रतिशय्या पर मनोहर पुष्प फैला कर) वनदेवताओं के मिथुन नित्य भगवान् के प्रशस्त चरितों का गान करते हैं ॥५५॥ ...हितधियां शमिनां समन्तादुल्लासितं मुररिपोर्ललितैः पदाङ्कैः । ...ने सुकृतकौतुकवर्धनं तं शैलं जगाम स यशोधनसार्वभौमः ॥५६॥ [यशस्वियों के सम्राट् राव सुर्जन उस पुण्य-वर्धन गोवर्धन पर्वत पर गये जो चारों ओर भगवान् श्रीकृष्ण के सुन्दर पदारविन्दों के चिह्नों से कृतार्थ हुआ था जिनका ध्यान विशुद्ध बुद्धि वाले मुनिजन किया करते हैं ॥५६॥ ...त्रपदमूयुषि तीव्रवृष्टिमूर्च्छत्सवत्ससुरभीकुलजीवनाय । ...वस्य गोपवपुषो विभराम्बभूव बाहुर्महेन्द्रमणिनिर्मितदण्डलक्ष्मम् ॥५७॥ (इन्द्र के कोप से होने वाली) भयंकर वर्षा के कारण व्याकुल बछड़ों, गायों (और गोप- गोपियों) के समूह की जीवनरक्षा के लिये जब गोवर्धन पर्वत छत्र बना, तब गोपवेशधारी भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ ने उज्ज्वल नीलम मणियों से निर्मित छत्रदंड की शोभा धारण की ॥ ५७ ॥ (५२) चिल्लिः लताविशेषः । (५४) श्रीमद्भागवते (१०-३३-२४)—'सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः प्रेम्णेक्षितः प्रहसती- भिरितस्ततोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः ॥' इति ।

२०६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्

तिरोहिते कौतुकतो मुकुन्दे तदङ्गसंसर्गविशेषहृद्यैः । यद्धादुरागैर्विहिताङ्गरागा दधुः स्वजीवं व्रजनीरजाक्ष्यः ॥५८॥ (रासलीला के समय) जब भगवान् श्रीकृष्ण कौतुकवश अन्तर्धान हो गये तब उनके अंगों के संसर्ग के कारण विशेष रूप से मनोहर, गोवर्धन पर्वत के गेरु आदि का अपने शरीर पर लेप करके व्रज की कमलनयनी गोपियों ने अपने प्राण धारण किये ॥५८॥

अथ घनजलधारारुद्धदिक्‌चक्रवालं तिमिरतिमिगभीरं मग्नसोमार्कबिम्बम् । हुतवहमनिवार्यं वारिरन्तर्दधानं समजनि घनवीथीमण्डलं सिन्धुकल्पम्॥५९॥ उसके बाद वर्षा ऋतु के कारण बादलों का समूह समुद्र के समान शोभित हुआ—वह घनी जलधाराओं से दिशाओं का मंडल व्याप्त कर रहा था, अन्धकार रूपी मगरमच्छों से गहरा लग रहा था, सूर्य और चन्द्र उसमें डूब जाते थे और वह जल में अनिवार्य अग्नि (बिजली; बड़वानल) छ

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अष्टादशः सर्गः २०७ पवनेन पुरोभवेन भूयो मधुराभिर्नवनीरधोरणीभिः । तपतीव्ररविप्रतापद्ग्धा वनराजीरदजीवयद् वनश्रीः ॥६४॥ वनलक्ष्मी ने ग्रीष्म के प्रचंड सूर्य के ताप से जली हुई वन की पंक्तियों को पुरवाई हवा से और नवीन जल की मधुर धाराओं से फिर जिला दिया ॥६४॥ चिरान् निवृत्तस्य घनागमस्य गाढोपगूढेन हरिद्वधूनाम् । हारा निपेतुश्छिदुरा विदूरात् पयोधरेभ्यः करकामिषेण ॥६५॥ बहुत समय बाद प्रवास से लौटे हुये वर्षा-काल द्वारा दिग्वधुओं का गाढ़ आलिंगन करने पर उनके पयोधरों से (बादलों से; स्तनों से) हारों के मोती टूट टूट कर ओलों के बहाने गिरने लगे ॥६५॥ सुहृदः समुपागतान् पयोदान् स्मृतनन्दात्मजदेहकान्तिपूराः । ददृशुः स्रवदस्रवः कथञ्चिद् बत वृन्दावनवासिनो मयूराः ॥६६॥ वृन्दावनवासी मोर, समीप आये हुये मित्र मेघों की ओर, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर की कान्ति के स्मरण में लीन होने के कारण, आँसू बहाते हुये, किसी प्रकार, देख सके ॥६६॥ बर्हेण येषां विदधेऽवतंसं कंसस्य शत्रुः स्वयमुज्झितेन । कलापिनः प्रे[म्णार्द्रने]त्रास्ते विलोकयन्ति स्म घनं सबाष्पाः ॥६७॥ कंसशत्रु भगवान् श्री[कृष्ण] द्वारा भी स्वयं गिरे हुये पंख को अपने सिर का आभूषण बनाते थे, वे (वृन्दावनवासी) [मोर प्रेमार्द्र नेत्र] कर, (घनश्याम के समान) मेघ की ओर, आँस बहाते हुये, देखने लगे ॥६७॥ विनापि बाणं रविलम्ब्य तावदिन्द्रायुधं निर्गुणमप्यनङ्गः । संमोहयद् विश्वमनन्यतन्त्राः काङ्क्षन्ति सिद्धौ न तु हेतुमन्यम् ॥६८॥ अ[नङ्ग (कामदेव)] ने निर्गुण (ज्यारहित) इन्द्रधनुष से ही, बिना बाण चलाये, सारे संसार को मोह[कर दिया। वास्तव] में स्वतन्त्र पुरुष कार्यसिद्धि के लिये अन्य हेतु की अपेक्षा नहीं रखते ॥६८॥ कादम्बि[नी...] भुजङ्गजाया प्राणान् पिपासुः पथिकप्रियाणां । ऊर्ध्वां[...ऽ]म्भोदफणा सनादं व्यलोलयद् विद्युतमग्रजिह्वाम् ॥६९॥ काल[...]-की पत्नी मेघमाला, विरहिणियों के प्राणवायु को पीने के लिये (सर्पों को पवनशन[...]) है), अपने काले बादल रूपी फण को फैला कर (मेघगर्जन के बहाने) फुँफ- कारती हुई, बिजली रूपी तेज जीभ हिलाने लगी ॥६९॥ विलुप्तमर्यादमुदीरितैर्जलैर्भग्नास्तटस्था अपि मेदिनीरुहाः । [किं] न कुर्वन्त्यसमञ्जसं गताः परां विवृद्धिं तरला हि निम्नगाः ॥७०॥ चपल नदियों ने बरसाती पानी से अत्यधिक बढ़ कर तथा मर्यादा छोड़ कर, अपन बाढ़ के जल से तट पर स्थित वृक्षों को भी उखाड़ फेंका ; वास्तव में नीच पुरुष, जो स्वभाव से ही चंचल हों, यदि भाग्यवश अत्यन्त समृद्ध बन जाँय, तो अपनी मर्यादा खो कर तटस्थ पुरुषों को भी कष्ट देते हैं और क्या क्या उलटी बातें नहीं कर बैठते ? ॥७०॥

२०८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पुर एव नीपपवनोतिदारुणोऽदलयद् वियोगिमिथुनानि मर्मणि । किमुत प्रफुल्लनवचारुमालतीपरिरम्भसम्भृतविशेषसौरभः ॥७१॥ कदम्बों से सुगन्धित पवन ने, पहले ही भयंकर बन कर, वियोगी मिथुनों को मर्मान्तिक पीड़ा दी और जब वह नव विकसित मनोहर मालती का आलिंगन करके विशेष सुरभित हो गया, तब तो उसकी बात ही क्या ! ॥७१॥ घनान्धकारेष्वपि वीतशङ्कं ययुः प्रियं कुङ्कुमगौरगात्र्यः । अनारतोद्दामवितायमानसौदामिनीदामनि लीनदेहाः ॥७२॥ अभिसारिकायें, अपने गोरे शरीर पर केसर का लेप करके, निरन्तर वेग से चमकने वाली बिजलियों की आभा में अपने शरीरों को एक करती हुई, गहरे अन्धकार में भी, निःशंक होकर, अपने प्रियतमों के पास चली गईं ॥७२॥ आस्वाद्य जम्बूरसमन्यपुष्टश्चकूज यद्गर्जिति तोयवाहे । भेरीमुखे भाङ्कृतिभाजि तन्त्रीक्विक्वाणवत् तद्द्वितयं बभूव ॥७३॥ जामुन का रस पीकर कोयल, मेघ के गरजने पर भी, कूकने लगी; मेघ की गर्जना के साथ कोयल की कूक ऐसी लगी जैसे नगाड़े की ध्वनि के साथ वीणा का (मंजु) स्वर हो ॥७३॥ निर्जीवं विरहिगणं करोतु कामं निर्जी[वोऽयमवन्ध्य] चापः । आश्चर्यं यदमृतवृष्टिरब्दकीर्णा पा[न्थानामत्ति] दीर्घमायुः ॥७४॥ निर्जीव (ज्यारहित) इन्द्रधनुष यदि विरही व्यक्त्यि[ों को निर्जी]व (जीवनरहित) बनाये तो आश्चर्य नहीं है, किन्तु इसका आश्चर्य अवश्य है कि मेघों से बरसने वाली अमृतवृष्टि (जल- वृष्टि) भी विरही पथिकों की दीर्घ आयु को खा रही है ! ॥७४॥ नभसि सान्द्रतमःस्पृशि विश्वदृङ्मुषि तमोमणयः स्फुरिता[...] घनघट्टविकुट्टितचन्द्रमःप्रकटरेणुनिभाः परिबभ्रमुः ॥७५॥ घने अन्धकार से व्याप्त आकाश के संसार की दृष्टि को हर लेने [पर] चमकने वाले खद्योत (जुगनू) ऐसे लग रहे थे मानों बादलों की (गरजने वाली) चक्की में पिस गये [चन्द्रमा] के कण हों ॥७५॥ द्युमणिकनकगोले तोयदाङ्गारगर्भे कुलिशकृतहुताशे प्रावृषा धम्य[माने] । प्रबलपवनवेगात् सर्वतः सारितार्चिःप्रततिरचिररोचिर्व्याजितो जृम्भते स्म ॥७६॥ वर्षाकाल रूपी सुनार चन्द्रमां रूपी सोने के गोले को बादल रूपी कोय[लों] के बीच में रख कर वज्ररूपी आग में प्रबल पवन के वेग से धौंक रहा है जिससे बिजली रूपी ज्वा[ला चा]रों ओर उठ रही हैं ॥७६॥ (७४) निर्जीवो ज्यारहितः । अब्दकीर्णा मेघमुक्ता । अमृतवृष्टिः जलवृष्टिः । (७५) तमोमणयः खद्योताः ।

२७ अष्टादशः सर्गः २०९ घनतमसि विलीने सोमसूर्यप्रसङ्गे जगति जलनिमग्ने कैरवे पङ्कजेऽपि । विरगमनुभवन्ती सङ्गमं च स्वभर्त्रा रजनिदिसवभेदं चक्रवाकी विवेद ॥७७॥ चन्द्र और सूर्य के बादलों के घने अन्धकार में छिप जाने पर तथा कुमुद और कमल के जल में डूब जाने पर, अपने पति का वियोग और संयोग अनुभव करने वाली चकवी ही रात और दिन के अन्तर को जानती थी ॥७७॥ प्रावृड्वल्ली जलधरदलस्यान्तरे द्योतिताशं विद्युद्दन्त्याजात् कुसुमनिकरं यत् करालं बभार । तस्योद्रिक्तं समजनि फलं हन्त ! तत्कालमेव प्राणत्यागो रमणविरहव्याकुलानां वधूनाम् ॥७८॥ वर्षा ऋतु रूपी लता ने मेघ रूपी पत्तों में बिजली रूपी भीषण और चमकीले पुष्प-समूह को धारण किया जिसमें शीघ्र ही प्रियतमों के विरह से व्याकुल रमणियों का प्राणत्याग रूपी बड़ा फल लगा ॥७८॥ गुरुध्वानेनैव प्रतिनगरमध्वन्यसुदृशां [जनयंश्च] दूरो मूर्च्छां सपदि कृतकृत्योऽपि कुतुकात् । व्यपेतज्या[चापा]मपि शर्बलभिदो [शो]भाद् वपुषि विभरामास मुदिरः ॥७९॥ कामदेव का मित्र मेघ भयंकर गर्जना से ही प्रत्येक नगर में विरहिणी स्त्रियों को मूर्च्छित करके यद्यपि कृतकार्य हो गया था, तथापि कुतूहलवश अपनी शोभा बढ़ाने के लिये उसने प्रत्यञ्चारहित इन्द्रधनुष को शरीर पर धारण किया ॥७९॥ [अथ] नरपतिवर्यः प्रावृषं यापयित्वा यदुपतिपदलक्ष्म्याऽलङ्कृतासु स्थलीषु । नभसि [परिरिक्ते] मुक्तनिद्रे मुकुन्दे प्रमथपतिनगर्याः सेवनाय प्रतस्थे ॥८०॥ इस[प्रकार] राजाओं में श्रेष्ठ सुर्जन, भगवान् श्रीकृष्ण की पद-लक्ष्मी से अलंकृत स्थानों में (वृन्दा[वन] आदि में) वर्षा ऋतु बिता कर आकाश के मेघरहित हो जाने पर और भगवान् विष्णु के जाग जाने पर (देवोत्थापिनी एकादशी के बाद) भगवान् शिव की काशी पुरी का सेवन करने के लिये रवाना [हुए] ॥८०॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये अष्टादशः सर्गः (७९) मुदिरो मेघः।

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

एकोनविंशतितमः सर्गः नीत्वा दिनानि कतिचित् पथि कौतुकेन तीर्थानि पावनतमानि निषेवमाणः । स्वर्वाहिनीथमुनयोः प्रमना मनोज्ञं सम्भेदमप मकरस्पृशि चण्डभानौ ॥ १ ॥ प्रसन्न राव सुर्जन, मार्ग में, कुतूहलवश, पवित्रतम तीर्थों का सेवन करते हुये, कुछ दिन बिता कर, (माघ महीने में ) मकरसंक्रान्ति के समय गंगा और यमुना के सुन्दर संगम पर (प्रयाग) पहुँचे ॥ १ ॥ यस्मिन् बबन्ध सुषमाम्रविन्दबन्धोः पुत्री समेत्य सुरलोकतरङ्गवत्या । निर्यद्विमुक्तविशदच्छविकञ्चुकार्धा पापावलीकवलने प्रसुतेव सर्पी ॥ २ ॥ संगम में सूर्यपुत्री यमुना भगवती गङ्गा से मिल कर इस प्रकार सुशोभित हो रही है मानों पाप-समूह को निगलने के लिये बढ़ने वाली साँपिन हो जि[सके शरीर से] चमकती हुई केंचुल आधी उतर

एकोनविंशतितमः सर्गः २११ वारां भ्रमे कमलवल्लभकन्यकायाः पाथः क्वचिन्मिलितमम्बरशैव लिन्याः । आभासते स्म शतपत्रमिवावदातं नाभीह्रदान्तरगतं पतगेन्द्रकेतोः ॥ ६ ॥ और कहीं पर यमुना की भँवर से गंगा की लहर मिल कर इस प्रकार सुशोभित हो रही है जैसे भगवान् विष्णु की नाभि में लगा हुआ श्वेत कमल हो ॥ ६ ॥ निर्वर्त्य कृत्यमुचितं रुचिरं च तत्र दानं स दानवरिपौ विनिवेशितात्मा । तप्त्वा तपांसि तपसि प्रसितो यशोभिर्विश्वेशदर्शनसमुत्कमनाः प्रतस्थे ॥७॥ भगवान् विष्णु में मन लगाने वाले राव सुर्जन प्रयाग के त्रिवेणी संगम में उत्तम दान देकर और उचित कार्य समाप्त करके तथा तप करके यश से शुभ्र बने हुये, भगवान् विश्वनाथ के दर्शन की उत्कंठा के कारण काशी की ओर रवाना हुये ॥ ७ ॥ 'निःश्रेयसश्रिय उदार विहारभूमिः सौभाग्यसिद्धिरखिलावनिमण्डलस्य । प्राप्ता प्रिया पुररिपोरथ पार्थिवेन वाराणसी सुकृतसारभूतामुपास्या ॥८॥ इसके बाद राव सुर्जन भगवान् विश्वनाथ की प्रिय नगरी काशी पहुँचे, जो पुण्यात्मा पुरुषों द्वारा सेव्य ह, जो समस्त भूमंडल की सौभाग्यसिद्धि है और जो मोक्ष-लक्ष्मी की उदार विहार- भूमि है ॥ ८ ॥ आनन्दसान्[...]ङ्गमन्तःप्रसादविशदाननमीशमुख्याः । गोपाल इत्य[...] व्यासोऽवदत् विदिततीर्थवरप्रभावः ॥९॥ [...]तीर्थ श्रेष्ठ वाराणसी [...]ले राजपुरोहित गोपाल व्यास ने आनन्द के कारण होने वा[ले] घने रोमांच से यु[...]ङ्ग वाले और हृदय की प्रसन्नता के कारण खिले हुये मुख वाले राजा स[...] से इस प्रका[र] निवेदन किया ॥ ९ ॥ [...]लतमेघघटाविमुक्तमर्यादसागरजलेऽपि न या निमज्जेत् । [...]पयति कल्पसमीरणोऽपि याऽपेक्षते क्वचन नापि गुणाभियोगम् ॥१०॥ [...]तारयत्यखिल[...]तरमन्तरेण यत्रेश्वरः सपदि दक्षिणकर्णधारः । दुष्पार[...]महार्णवलङ्घनाय काऽप्यीयमायतिमती तरणिर्नराणाम् ॥११॥ यह क[...] जो प्रलय काल

२१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आरोहतः कुतुकतो रजनीष्वमुष्याः प्रासादशैलशिखरं शशिशेखरस्य । सद्यस्तिरोहितशिरःस्थितबालचन्द्रः पूर्णः कलानिधिरुपैति किरीटभावम्॥१२॥ जब (पूर्णिमा को) रात में कुतूहलवश भगवान् शिव इस काशी के विशाल महल के शिखर पर चढ़ते हैं तब (आकाशस्थित) पूर्ण चन्द्र, भगवान् के मस्तक पर विराजमान बालचन्द्र को ढक कर स्वयं किरीट बन जाता है ॥१२॥ निर्मथ्य नोरनिधिमुद्धतमादितेयाः पीत्वाऽमृतान्यपि भयं मुमुचुर्न मृत्योः । मृत्युः स्वयं प्रवितरत्यमृतं यदस्यां कीटोऽपि येन सुतरामकुतोभयः स्यात् ॥१३॥ देवों ने समुद्र को अत्यन्त वेग से मथ कर अमृत पिया, फिर भी उन्हें मृत्यु के भय से छुटकारा नहीं मिल सका, किन्तु इस काशी में स्वयं मृत्यु अमृत बाँटती है जिस कारण तुच्छ कीड़ा भी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। (काशी में मरने वालों की मुक्ति हो जाती है।) ॥१३॥ आख्याय कर्णपदवीमनुजन्मभाजां मन्त्रं मृगाङ्कमुकुटः किल तारकाख्यम् । आश्चर्यमत्र भगवान् गुरुरप्यदम्भमात्मानमन्तसदि सादरमर्पयेद् यत् ॥१४॥ काशी में मरने वालों के दाहिने कान में स्वयं भगवान् शिव तारक मंत्र सुनाते हैं और आश्चर्य है कि भगवान् शिव, गुरु होकर भी, अपने आपको सर्वतोभावेन उस शिष्य को सादर अर्पण कर देते हैं ! (लोक में तो जब शिष्य अपने आपको सर्वतोभावेन गुरु को सादर अर्पण कर देता है तब गुरु उसे मंत्रोपदेश देते हैं, किन्तु यहाँ भगवान् शि[व...] अपने आपको शिष्य को अर्पण कर देते हैं अर्थात् उसका भवबन्धन छुड़ा क[...] देते हैं) ॥१४॥ ज्योतिर्मयो जयति पञ्चमुखस्य पञ्च[...] जगदुज्ज्वलश्रीः । पञ्चत्व

  1. म (3) न (4) ङ्ग (5) द (6) म (7) न (8) स्य (9) -> 9 SYLLABLES! - Wait! - ए (1) - ता (2) - म (3) - न (4) - ङ्ग (5) - द (6) - म (7) - न (8) - स्य (9)! - YES, 9 syllables! - 14 - 9 = 5 SYLLABLES! - And तनुं द्वितीयाम् = त (1) नुं (2) द्वि (3) ती (4) याम् (5) = 5 SYLLABLES! - Let's check the meter for Quarter 1: - एतामनङ्गदमनस्य तनुं द्वितीयां - 14 syllables! - Let's check Vasantatilaka: - (--v): एताम - (-vv): नङ्गद - (v-v): मनस्य (म=v, न=v, स्य=S? Wait, स्य is followed by त, so स्य is S. But न is v. So v v S? Wait: म (v) न (v) स्य (S)? But Vasantatilaka is v - v!