सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ षोडशः सर्गः १८५ श्यामद्युतः पिदधतो हरितां मुखानि विष्वग्विसारिमदवारिझरं क्षरन्तः । वातेरिता इव नवीनघनाः सनादमीयुर्महीधरनिभा महिता महेभाः ॥३९॥ काली कान्ति वाले, दिशाओं के मुखों को ढाँकने वाले, चारों ओर विस्तृत मदजल की झड़ी लगाने वाले, पर्वतों के समान बड़े बड़े हाथी, वायु से प्रेरित नये मेघों के समान, गरजते हुये चले ॥ ३९ ॥ उत्तंसितोज्वलविचित्रपतत्रिपत्रा गाढोपगूहितकटीधृतकिंकिणीकाः । आस्फालितप्रहरणाः प्रथितस्वदर्पा जग्मुः समुद्धतगतेन पदातिमुख्याः ॥४०॥ (मयूर आदि) पक्षियों के उज्ज्वल और रंग बिरंगे पंखों को सिर पर लगाकर, घुंघरुओं की माला को कमर में अच्छी तरह बाँध कर, अपने अभिमान को प्रकट करने वाले पैदल सैनिक शस्त्रों पर हाथ फेरते हुये उद्धत चाल से चल रहे थे ॥ ४० ॥ वल्गान्तविस्फुरितशोणितसङ्गिफैनैरश्वैः श्वसद्भिरुपकूलमथापगायाः । भालेषु रेणुभरकर्दमितं वहन्तः स्वेदोदबिन्दुलहरीं ययुरश्ववाराः ॥४१॥ लगाम के कोने की रगड़ से निकले हुये खून के कारण लाल फेन वाले हाँफते हुये घोड़ों पर बैठे हुये सवार अपने ललाटों पर पसीने की लहरों को, जो (टापों से उड़ी हुई) धूल के कारण कहीं कहीं कीचड़ की तरह बन गई थी, धारण करते हुये, नदी के किनारे किनारे जा रहे थे (नदी की भाँति सवार भी फेन, कीचड़ और लहरों से युक्त थे) ॥ ४१ ॥ उच्चैस्तया गतमिवान्तिकमुष्णरश्मेः पादैर्नितान्तपरुषैः परितापिताङ्गम् । नैसर्गिकीं गतिमपास्य मुहुर्जवेन रोधो रुरोध करियूथमथापगायाः ॥४२॥ ऊँचाई के कारण सूर्य को छूने वाले और सूर्य की अत्यन्त कड़ी किरणों से संतप्त अंगों वाले हाथियों के समूह ने, अपनी स्वाभाविक धीमी चाल छोड़ कर, वेग से नदी का तट घेर लिया ॥४२॥ पारं प्रयातमनसं सवरूथिनीकमालोक्य तत्र सरितो मनुजाधिनाथम् । आनायिभिर्द्रुतमन्यायिषत प्रकामं स्फारास्ततस्तरणयः स्थिरकर्णधाराः ॥४३॥ राजा को सेनासहित नदी के पार जाने का इच्छुक देख कर मल्लाह शीघ्र बड़ी बड़ी विस्तृत नौकायें ले आये जिनमें केवट बैठे हुये थे ॥ ४३ ॥ नीतोऽपि पारगमनाय गुरुप्रयत्नात् तीरस्थ एव परिपीतपयः प्रमत्तः । नाशु व्यगाहत करी गहनं ह्रदाम्भस्तप्तोऽपि तप्तकिरणस्य करैः कठोरैः ॥४४॥ एक प्रमत्त हाथी खूब जल पीकर तीर पर ही खड़ा रहा; यद्यपि महावत बड़े प्रयत्न से उसे चलने के लिये प्रेरित कर रहा था और वह स्वयं भी सूर्य की प्रचण्ड किरणों से सन्तप्त हो रहा था, तो भी वह नदी के गहरे जल में शीघ्रता से नहीं घुसा ॥ ४४ ॥ आधोरणान् मदवशादवधीरयन्तः स्तब्धाः क्षणं तटमधि द्विरदा मदान्धाः । उत्तेजितास्तरलिताः परतीरगर्जन्मत्तापरद्विरददुःसहदानगन्धैः ॥४५॥ उत्कट मद के कारण महावतों की अवज्ञा करके मदान्ध हाथी स्तब्ध होकर कुछ देर तक तट पर ही खड़े रहे, किन्तु सामने के तट पर चिंघाड़ते हुये मत्त शत्रु-हाथियों के मदजल की दुःसह गन्ध को सूँघने के कारण उत्तेजित होकर नदी के पार चले गये ॥ ४५ ॥