सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिक्षाविशेषवशतस्तुरगाधिरूढैरापादिताः सपदि मण्डलिकां तुरङ्गाः । जाम्बूनदाभरणकर्बुरितास्तदानीमालातचक्रधिषणां दधिरे न कस्य ॥३३॥ शिक्षा विशेष के कारण सवारों ने घोड़ों को गोल घेरे में दौड़ाया; उस समय सोने के आभूषणों से सज्जित घोड़े जलती हुई और चारों ओर घुमाई जाने वाली मशाल के घेरे की बुद्धि उत्पन्न कर रहे थे ॥ ३३ ॥ यानक्रमादतिनिरन्तरतामुपेतौ द्वौ सादिनौ प्रणयसङ्कथनेन यान्तौ । घ्रात्वा परस्परमुखं क्षणतो हयाभ्यां साक्षेपनादमथ दूरमनायिषाताम् ॥३४॥ साथ साथ चलने के कारण अत्यन्त समीप आये हुये दो सवार परस्पर प्रेमालाप करते हुये जा रहे थे, किन्तु उनके घोड़ों ने शीघ्र एक दूसरे का मुंह सूंघ कर आक्षेप के साथ हिनहिना कर उन्हें दूर कर दिया ॥ ३४ ॥ दैवादुपेत्य बडवाधिरुहं तुरङ्गी कश्चित् पथि प्रतिहतप्रसरावकाश