सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशः सर्गः १८३ आक्रीडनं वयसि याऽसिलताऽतिपूर्वे या यौवने पुरुषकारविकासहेतुः । या वार्धके खलु भवत्यवलम्बनाय स्वप्नेऽपि तां न खलु मुञ्चति चाहुवाणः॥२६॥ जो तलवार बचपन में खिलौने की तरह है, जो यौवन में पौरुष के विकास का कारण है और जो वृद्धावस्था में सहारे का काम देती है (प्रिया के समान प्रिय) उस तलवार को चौहाण स्वप्न में भी नहीं छोड़ता ॥ २६ ॥ तं वारणस्थितमवारितसन्निधानाः सेवावकाशकलनेष्वथ सावधानाः । जग्मुः प्रणन्तुमनसो युगपत् क्षितीशा वाहैः परस्परविमर्दनयन्त्रिताङ्गैः ॥२७॥ जिनको राजा के समीप जाने में कोई रुकावट नहीं थी और जो सेवाकार्य में सावधान थे वे विनीत मन वाले राजा लोग हाथी पर स्थित राव सुर्जन के साथ साथ उन घोड़ों पर चढ़ कर चले जिनके अंग, समीप समीप चलने के कारण, परस्पर रगड़ खा रहे थे ॥२७॥ प्रत्येकनामपरिकीर्तनपूर्वमुच्चैरावेदितोऽन्तिकचरेण नरेन्द्रसिंहः । नम्रोत्तमाङ्गमुचितप्रतिपत्तिभिस्तं राज्ञां समूगमनुरञ्जयति स्म विज्ञः ॥२८॥ समीपस्थ अनुचर ने राव सुर्जन को प्रत्येक राजा का उच्च स्वर में नाम ले लेकर आवेदन किया और महाराज ने, नतमस्तक होकर प्रणाम करने वाले उस राजसमूह के नमस्कारों का उचित उत्तर देकर, उसे प्रसन्न किया ॥ २८ ॥ माद्यन्मतङ्गजतुरङ्गमपदातिकानां दर्पोद्धतद्रुतगतैर्ध्वनयद् धरित्रीम् । निर्मथ्यमानमकरालयभीमघोषं भूपालपालितबलं युगपच्चचाल ॥२९॥ मदोत्कट हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों की दर्पोद्धत और तेज चाल से पृथ्वी को हिलाती हुई और मथित समुद्र के समान भयंकर घोष करती हुई वह राजसेना एक साथ चली ॥ २९ ॥ तत्सैन्यनिर्भरभराद् भुजगाधिनाथे त्रासान्मुमुक्षति महीमुदितप्रकम्पे । कूर्मः कटाहकुहरान्मुखमुन्नमय्य ब्रह्माण्डभङ्गचकितः परितो ददर्श ॥३०॥ उस सेना के भारी भार के कारण कम्पित होकर शेषनाग ने पृथ्वी को छोड़ देने की इच्छा की तो कच्छप भगवान् अपनी ढाल में से मुंह बाहर निकाल कर ब्रह्माण्ड भंग से चकित हुये चारों ओर देखने लगे ॥ ३० ॥ मन्दोल्लसत्पवनसङ्गतंरङ्गितान्ता व्योमस्पृशो रुरुचिरे रुचिराः पताकाः । तद्वैरिणां कवलनाय कृतोद्यमस्य कालस्य लोलरसना इव दिक्षु कीर्णाः ॥३१॥ मन्द मन्द चलने वाले वायु से हिलती हुई आकाश को छूने वाली सुन्दर पताकायें इस प्रकार शोभित हो रहीं थीं मानों राजा के शत्रुओं को खाने के लिये उद्यमशील काल की दिशाओं में फैलाई हुई चंचल जीभें हों ॥ ३१ ॥ मुक्ताः कुतूहलवशात् क्षणमश्ववारै र्वाहाः स्म भान्ति विशिखा इव सञ्चरन्तः । येषां यतां रयवशाद् घनवर्त्मनीव स्पर्शो भुवः खुरपदैरनुमीयते स्म ॥३२॥ कुतूहलवश थोड़ी देर के लिये सवारों से ढीले छोड़ दिये जाने पर घोड़े तीर की तरह छूट पड़े; वेग से दौड़ने के कारण ऐसा लगता था मानों वे आकाश में ही उड़ रहे हों, केवल उनके खुरों के चिह्नों से यह अनुमान लगाया जाता था कि वे भूमि का स्पर्श भी करते थे ॥ ३२ ॥ ୨