सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें१८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् किरीट को धारण करने के कारण वह नवोदित सूर्य को धारण करने वाले उदयाचल पर्वत के समान सुशोभित हो रहा था, निरन्तर बहनेवाले मदजल की गन्ध से आकृष्ट चंचल भ्रमर उसके कानों के पास गूंज रहे थे और वह इस प्रकार शोभित हो रहा था मानों उन भ्रमरों द्वारा गाये जा रहे अपने दानयश (मदजल को भी दान कहते हैं) को आधी आँखें मूंद कर मस्ती से सुन रहा हो, उसका अगला भाग सिन्दूर बिन्दुओं के समूह से चित्रित होने के कारण वह गेरू से शोभित पर्वत के समान लग रहा था, उस पर कम्बल की झूल बिछ रही थी और वह ध्वजदंड से शोभित था ॥ १७—२० ॥ आधोरणप्रहितपाणिमनुग्रहेण स्पृष्ट्वातिकौशलवशादनमन्तमेव । तं बृंहितेन मधुरेण कृतानुमोदं दन्तावलेन्द्रमवनीपतिरारुरोह ॥२१॥ अत्यन्त निपुण होने के कारण राव सुर्जन, हाथी को बिना झुकाये ही, महावत द्वारा प्रसारित हाथ को अनुग्रहपूर्वक छू करं, मधुर चिंघाड़ से अपने ऊपर राजा के बैठने का अनुमोदन करने वाले उस हाथी पर आरूढ़ हुये ॥ २१ ॥ आदर्शाबिम्बमदसीयविशालकीर्तेः क्रीडाभूमिभवनं किल राजलक्ष्म्याः । तस्योपरि स्थिरमराजत दुग्धसिन्धोरावर्तवद् विततवर्तुलमातपत्रम् ॥२२॥ राजा के ऊपर लगा हुआ विस्तृत, गोल और श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था मानों राजा की विशाल कीर्ति का शुभ्र दर्पण हो या राजलक्ष्मी का क्रीड़ाभवन हो या क्षीरसागर की स्थिर भँवर हो ॥ २२ ॥ तत्कर्मणि प्रणिहिताः प्रभुणा नियुक्तास्तत्कार्मुकं क्रमविदः करमस्य निन्युः । यत् सङ्गरेषु ददृशुर्गतजीवनाशाः कीनाशकासरविषाणसमं द्विषन्तः ॥२३॥ (शस्त्र देने के) कार्य में स्थापित, स्वामी द्वारा नियुक्त, क्रम को जानने वाले भृत्यों ने राजा के हाथ में वह धनुष अर्पित किया जिसे शत्रु-गण युद्ध में अपने जीवन की आशा छोड़ कर, यमराज के भैंसे के सींग के समान देखते थे ॥ २३ ॥ यत्रार्जवेन न भवेद् गुणवत्वलाभस्तत्र क्वचित् कुटिलतां कत्तिचिद् भजन्ते । बाणासनं यदवनीशकरे तदानीं संवर्तते स्म कुटिलं गुणयोगहेतोः ॥२४॥ जहाँ सीधेपन से गुणलाभ न हो सके वहाँ कोई-कोई कुटिलता से भी लाभ लेते हैं, इसलिये राजा के हाथ में गुणलाभ करने के लिये (प्रत्यञ्चा से युक्त होने के लिये) धनुष कुटिल बन रहा था ॥२४॥ पाणौ पुरैव शुभदेऽहनि या गृहीता कोशान्तरे विनिहिता हितकारिणी या । स्नेहं विना न खलु गच्छति या प्रसादं साऽस्य प्रियाऽसिलतिका सविधे सदैव २५ पहले ही शुभ मुहूर्त में जिसे हाथ में पकड़ा था (जिसका पाणिग्रहण किया था), जिसे कोश (म्यान) के अन्दर रखा था (जिसको कोश अर्थात् खजाना सौंप दिया था), जो सदा हित करने वाली है और जो स्नेह (तेल) के बिना नहीं चमकती (जो प्रेम के बिना प्रसन्न नहीं होती) वह, प्रिया के समान प्रिय तलवार, सदा राव सुर्जन के पास रहती है ॥ २५ ॥ (२३) कीनाशकासरविषाणसमं यमराजमहिषशृङ्गतुल्यम् ।