सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशः सर्गः १८१ प्रास्थानिकध्वनिरथोद्धतदुन्दुभीनां भिन्दन्निव प्रतिरवैर्जगदण्डभाण्डम् । आपूरितत्रिदशभूधररन्ध्रमुच्चैर्दिक्चक्रमाक्रमत तत्क्षणमक्रमेण ॥ १३ ॥ तब जोरों से बजाये जाने वाले नगाड़ों के, युद्ध के लिये प्रस्थान की तैयारी की सूचना देने वाले शब्दों ने, अपनी प्रतिध्वनि से मानों ब्रह्माण्ड कटाह को भेद कर, उस समय क्रम का ध्यान न रख कर, सुमेरु पर्वत की गुफाओं को भर कर, जोरों से दिशाओं के समूह पर आक्रमण कर दिया ॥ १३॥ व्यग्रात्मनां निजनिजोचितसंविधानैस्तत्तत्क्रियासु विनियोजयतां जनौघान् । उच्चैः स्वरैस्त्वरयताञ्च पुनः पुनस्तान् कोलाहलः पुनरभूदपरो नराणाम्। १४। जनसमूह को अपने योग्य साधनों द्वारा अपने अपने कार्यों में नियुक्त करने वाले और ऊँचे स्वर में बारवार उनको जल्दी करने की आज्ञा देने वाले व्यस्त अधिकारी-वर्ग का कोलाहल भी सुनाई दे रहा था ॥ १४ ॥ जेतुं पतङ्गतुरगानिव पादयुग्ममुच्चैः क्षिपन्तमसकृद् विधृतं प्रयत्नात् । उच्चैर्जवेन विजितं विनतातनूजं हेषारवैरिव हसन्मुदीर्णदन्तम् ॥ १५॥ पर्याणपीडनपुरस्कृतपीठदेशं कण्ठक्वणत्कनककिङ्किणिकाकलापम् । वल्गागुणग्रहिलपाणिरुपानिनाय तूर्णं तुरङ्गमधिकारिजनः पुरस्तात् ॥ १६॥ सूर्य के घोड़ों को जीतने के लिये मानों अपनी टापें बार बार जोरों से फटकारने वाले, प्रयत्न- पूर्वक रोके जाने वाले, अपने वेग से जीते गये गरुड़ की मानों दाँत निकाल कर हिनहिनाने के बहाने हँसी उड़ानेवाले, कसी हुई काठी से सुसज्जित पीठ वाले और कण्ठ में बजने वाले सोने के घुँघरुओं की माला से सुशोभित घोड़े को लगाम पकड़ कर साईंस शीघ्रता से आगे लाया ॥ १५-१६॥ राकानिशाकरकरोत्करकोमलेन कीर्णेन चामरचयेन विरोचमानम् । स्वर्गापगारुचिरवीचिवितानकेन चित्रं प्रवाहमिव भानुमतः सुतायाः ॥१७॥ घण्टाभिराहितरुचं दधतीभिरुच्चैर्नादान् द्विषत्क्षितिभृतामभिचारमन्त्रान् । माणिक्यमुद्रितसुवर्णमयं किरीटं बिभ्राणमद्रिमुदयं महसामिवेशम् ॥१८॥ अव्याहतस्रुतमदद्रवगन्धलोलैर्झङ्कारिभिर्मधुकरैः श्रवणान्तिकस्थैः । उद्गीयमानमिव दानयशः स्वकीयं शृण्वन्तमर्धमुकुलीकृतलोचनान्तम् ॥१९॥ सिन्दूरबिन्दुचयचित्रितपूर्वभागं नागं महीधरमिवोदितधातुरागम् । आस्तीर्णकम्बलकुथं धृतकेतुमालमाधोरणः प्रमुखमीशितुरानिनाय ॥२०॥ फिर महावत प्रमुख हाथी को राजा के आगे लाया—वह हाथी पूर्णिमा के चन्द्रमा के किरण- समूह के समान कोमल और विस्तृत चँवरों से सुशोभित होने के कारण गंगा की सुन्दर लहरों की भँवरों से शोभित यमुना के प्रवाह के समान लग रहा था, उसके दोनों ओर लटकने वाले घंटे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और उनके जोर से बजने के कारण जो शब्द निकल रहे थे वे ऐसे लग रहे थे मानों शत्रुराजाओं को नष्ट कर देने वाले अभिचार मंत्र हों, माणिक जड़े हुये सोने के (१८) उदयं बिभ्राणं महसांमीशं सूर्यं बिभ्राणमद्रिमिव किरीटं बिभ्राणं गजमित्यर्थः ।