सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
षोडशः सर्गः १८१ प्रास्थानिकध्वनिरथोद्धतदुन्दुभीनां भिन्दन्निव प्रतिरवैर्जगदण्डभाण्डम् । आपूरितत्रिदशभूधररन्ध्रमुच्चैर्दिक्चक्रमाक्रमत तत्क्षणमक्रमेण ॥ १३ ॥ तब जोरों से बजाये जाने वाले नगाड़ों के, युद्ध के लिये प्रस्थान की तैयारी की सूचना देने वाले शब्दों ने, अपनी प्रतिध्वनि से मानों ब्रह्माण्ड कटाह को भेद कर, उस समय क्रम का ध्यान न रख कर, सुमेरु पर्वत की गुफाओं को भर कर, जोरों से दिशाओं के समूह पर आक्रमण कर दिया ॥ १३॥ व्यग्रात्मनां निजनिजोचितसंविधानैस्तत्तत्क्रियासु विनियोजयतां जनौघान् । उच्चैः स्वरैस्त्वरयताञ्च पुनः पुनस्तान् कोलाहलः पुनरभूदपरो नराणाम्। १४। जनसमूह को अपने योग्य साधनों द्वारा अपने अपने कार्यों में नियुक्त करने वाले और ऊँचे स्वर में बारवार उनको जल्दी करने की आज्ञा देने वाले व्यस्त अधिकारी-वर्ग का कोलाहल भी सुनाई दे रहा था ॥ १४ ॥ जेतुं पतङ्गतुरगानिव पादयुग्ममुच्चैः क्षिपन्तमसकृद् विधृतं प्रयत्नात् । उच्चैर्जवेन विजितं विनतातनूजं हेषारवैरिव हसन्मुदीर्णदन्तम् ॥ १५॥ पर्याणपीडनपुरस्कृतपीठदेशं कण्ठक्वणत्कनककिङ्किणिकाकलापम् । वल्गागुणग्रहिलपाणिरुपानिनाय तूर्णं तुरङ्गमधिकारिजनः पुरस्तात् ॥ १६॥ सूर्य के घोड़ों को जीतने के लिये मानों अपनी टापें बार बार जोरों से फटकारने वाले, प्रयत्न- पूर्वक रोके जाने वाले, अपने वेग से जीते गये गरुड़ की मानों दाँत निकाल कर हिनहिनाने के बहाने हँसी उड़ानेवाले, कसी हुई काठी से सुसज्जित पीठ वाले और कण्ठ में बजने वाले सोने के घुँघरुओं की माला से सुशोभित घोड़े को लगाम पकड़ कर साईंस शीघ्रता से आगे लाया ॥ १५-१६॥ राकानिशाकरकरोत्करकोमलेन कीर्णेन चामरचयेन विरोचमानम् । स्वर्गापगारुचिरवीचिवितानकेन चित्रं प्रवाहमिव भानुमतः सुतायाः ॥१७॥ घण्टाभिराहितरुचं दधतीभिरुच्चैर्नादान् द्विषत्क्षितिभृतामभिचारमन्त्रान् । माणिक्यमुद्रितसुवर्णमयं किरीटं बिभ्राणमद्रिमुदयं महसामिवेशम् ॥१८॥ अव्याहतस्रुतमदद्रवगन्धलोलैर्झङ्कारिभिर्मधुकरैः श्रवणान्तिकस्थैः । उद्गीयमानमिव दानयशः स्वकीयं शृण्वन्तमर्धमुकुलीकृतलोचनान्तम् ॥१९॥ सिन्दूरबिन्दुचयचित्रितपूर्वभागं नागं महीधरमिवोदितधातुरागम् । आस्तीर्णकम्बलकुथं धृतकेतुमालमाधोरणः प्रमुखमीशितुरानिनाय ॥२०॥ फिर महावत प्रमुख हाथी को राजा के आगे लाया—वह हाथी पूर्णिमा के चन्द्रमा के किरण- समूह के समान कोमल और विस्तृत चँवरों से सुशोभित होने के कारण गंगा की सुन्दर लहरों की भँवरों से शोभित यमुना के प्रवाह के समान लग रहा था, उसके दोनों ओर लटकने वाले घंटे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और उनके जोर से बजने के कारण जो शब्द निकल रहे थे वे ऐसे लग रहे थे मानों शत्रुराजाओं को नष्ट कर देने वाले अभिचार मंत्र हों, माणिक जड़े हुये सोने के (१८) उदयं बिभ्राणं महसांमीशं सूर्यं बिभ्राणमद्रिमिव किरीटं बिभ्राणं गजमित्यर्थः ।
१८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् किरीट को धारण करने के कारण वह नवोदित सूर्य को धारण करने वाले उदयाचल पर्वत के समान सुशोभित हो रहा था, निरन्तर बहनेवाले मदजल की गन्ध से आकृष्ट चंचल भ्रमर उसके कानों के पास गूंज रहे थे और वह इस प्रकार शोभित हो रहा था मानों उन भ्रमरों द्वारा गाये जा रहे अपने दानयश (मदजल को भी दान कहते हैं) को आधी आँखें मूंद कर मस्ती से सुन रहा हो, उसका अगला भाग सिन्दूर बिन्दुओं के समूह से चित्रित होने के कारण वह गेरू से शोभित पर्वत के समान लग रहा था, उस पर कम्बल की झूल बिछ रही थी और वह ध्वजदंड से शोभित था ॥ १७—२० ॥ आधोरणप्रहितपाणिमनुग्रहेण स्पृष्ट्वातिकौशलवशादनमन्तमेव । तं बृंहितेन मधुरेण कृतानुमोदं दन्तावलेन्द्रमवनीपतिरारुरोह ॥२१॥ अत्यन्त निपुण होने के कारण राव सुर्जन, हाथी को बिना झुकाये ही, महावत द्वारा प्रसारित हाथ को अनुग्रहपूर्वक छू करं, मधुर चिंघाड़ से अपने ऊपर राजा के बैठने का अनुमोदन करने वाले उस हाथी पर आरूढ़ हुये ॥ २१ ॥ आदर्शाबिम्बमदसीयविशालकीर्तेः क्रीडाभूमिभवनं किल राजलक्ष्म्याः । तस्योपरि स्थिरमराजत दुग्धसिन्धोरावर्तवद् विततवर्तुलमातपत्रम् ॥२२॥ राजा के ऊपर लगा हुआ विस्तृत, गोल और श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था मानों राजा की विशाल कीर्ति का शुभ्र दर्पण हो या राजलक्ष्मी का क्रीड़ाभवन हो या क्षीरसागर की स्थिर भँवर हो ॥ २२ ॥ तत्कर्मणि प्रणिहिताः प्रभुणा नियुक्तास्तत्कार्मुकं क्रमविदः करमस्य निन्युः । यत् सङ्गरेषु ददृशुर्गतजीवनाशाः कीनाशकासरविषाणसमं द्विषन्तः ॥२३॥ (शस्त्र देने के) कार्य में स्थापित, स्वामी द्वारा नियुक्त, क्रम को जानने वाले भृत्यों ने राजा के हाथ में वह धनुष अर्पित किया जिसे शत्रु-गण युद्ध में अपने जीवन की आशा छोड़ कर, यमराज के भैंसे के सींग के समान देखते थे ॥ २३ ॥ यत्रार्जवेन न भवेद् गुणवत्वलाभस्तत्र क्वचित् कुटिलतां कत्तिचिद् भजन्ते । बाणासनं यदवनीशकरे तदानीं संवर्तते स्म कुटिलं गुणयोगहेतोः ॥२४॥ जहाँ सीधेपन से गुणलाभ न हो सके वहाँ कोई-कोई कुटिलता से भी लाभ लेते हैं, इसलिये राजा के हाथ में गुणलाभ करने के लिये (प्रत्यञ्चा से युक्त होने के लिये) धनुष कुटिल बन रहा था ॥२४॥ पाणौ पुरैव शुभदेऽहनि या गृहीता कोशान्तरे विनिहिता हितकारिणी या । स्नेहं विना न खलु गच्छति या प्रसादं साऽस्य प्रियाऽसिलतिका सविधे सदैव २५ पहले ही शुभ मुहूर्त में जिसे हाथ में पकड़ा था (जिसका पाणिग्रहण किया था), जिसे कोश (म्यान) के अन्दर रखा था (जिसको कोश अर्थात् खजाना सौंप दिया था), जो सदा हित करने वाली है और जो स्नेह (तेल) के बिना नहीं चमकती (जो प्रेम के बिना प्रसन्न नहीं होती) वह, प्रिया के समान प्रिय तलवार, सदा राव सुर्जन के पास रहती है ॥ २५ ॥ (२३) कीनाशकासरविषाणसमं यमराजमहिषशृङ्गतुल्यम् ।
षोडशः सर्गः १८३ आक्रीडनं वयसि याऽसिलताऽतिपूर्वे या यौवने पुरुषकारविकासहेतुः । या वार्धके खलु भवत्यवलम्बनाय स्वप्नेऽपि तां न खलु मुञ्चति चाहुवाणः॥२६॥ जो तलवार बचपन में खिलौने की तरह है, जो यौवन में पौरुष के विकास का कारण है और जो वृद्धावस्था में सहारे का काम देती है (प्रिया के समान प्रिय) उस तलवार को चौहाण स्वप्न में भी नहीं छोड़ता ॥ २६ ॥ तं वारणस्थितमवारितसन्निधानाः सेवावकाशकलनेष्वथ सावधानाः । जग्मुः प्रणन्तुमनसो युगपत् क्षितीशा वाहैः परस्परविमर्दनयन्त्रिताङ्गैः ॥२७॥ जिनको राजा के समीप जाने में कोई रुकावट नहीं थी और जो सेवाकार्य में सावधान थे वे विनीत मन वाले राजा लोग हाथी पर स्थित राव सुर्जन के साथ साथ उन घोड़ों पर चढ़ कर चले जिनके अंग, समीप समीप चलने के कारण, परस्पर रगड़ खा रहे थे ॥२७॥ प्रत्येकनामपरिकीर्तनपूर्वमुच्चैरावेदितोऽन्तिकचरेण नरेन्द्रसिंहः । नम्रोत्तमाङ्गमुचितप्रतिपत्तिभिस्तं राज्ञां समूगमनुरञ्जयति स्म विज्ञः ॥२८॥ समीपस्थ अनुचर ने राव सुर्जन को प्रत्येक राजा का उच्च स्वर में नाम ले लेकर आवेदन किया और महाराज ने, नतमस्तक होकर प्रणाम करने वाले उस राजसमूह के नमस्कारों का उचित उत्तर देकर, उसे प्रसन्न किया ॥ २८ ॥ माद्यन्मतङ्गजतुरङ्गमपदातिकानां दर्पोद्धतद्रुतगतैर्ध्वनयद् धरित्रीम् । निर्मथ्यमानमकरालयभीमघोषं भूपालपालितबलं युगपच्चचाल ॥२९॥ मदोत्कट हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों की दर्पोद्धत और तेज चाल से पृथ्वी को हिलाती हुई और मथित समुद्र के समान भयंकर घोष करती हुई वह राजसेना एक साथ चली ॥ २९ ॥ तत्सैन्यनिर्भरभराद् भुजगाधिनाथे त्रासान्मुमुक्षति महीमुदितप्रकम्पे । कूर्मः कटाहकुहरान्मुखमुन्नमय्य ब्रह्माण्डभङ्गचकितः परितो ददर्श ॥३०॥ उस सेना के भारी भार के कारण कम्पित होकर शेषनाग ने पृथ्वी को छोड़ देने की इच्छा की तो कच्छप भगवान् अपनी ढाल में से मुंह बाहर निकाल कर ब्रह्माण्ड भंग से चकित हुये चारों ओर देखने लगे ॥ ३० ॥ मन्दोल्लसत्पवनसङ्गतंरङ्गितान्ता व्योमस्पृशो रुरुचिरे रुचिराः पताकाः । तद्वैरिणां कवलनाय कृतोद्यमस्य कालस्य लोलरसना इव दिक्षु कीर्णाः ॥३१॥ मन्द मन्द चलने वाले वायु से हिलती हुई आकाश को छूने वाली सुन्दर पताकायें इस प्रकार शोभित हो रहीं थीं मानों राजा के शत्रुओं को खाने के लिये उद्यमशील काल की दिशाओं में फैलाई हुई चंचल जीभें हों ॥ ३१ ॥ मुक्ताः कुतूहलवशात् क्षणमश्ववारै र्वाहाः स्म भान्ति विशिखा इव सञ्चरन्तः । येषां यतां रयवशाद् घनवर्त्मनीव स्पर्शो भुवः खुरपदैरनुमीयते स्म ॥३२॥ कुतूहलवश थोड़ी देर के लिये सवारों से ढीले छोड़ दिये जाने पर घोड़े तीर की तरह छूट पड़े; वेग से दौड़ने के कारण ऐसा लगता था मानों वे आकाश में ही उड़ रहे हों, केवल उनके खुरों के चिह्नों से यह अनुमान लगाया जाता था कि वे भूमि का स्पर्श भी करते थे ॥ ३२ ॥ ୨
१८४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिक्षाविशेषवशतस्तुरगाधिरूढैरापादिताः सपदि मण्डलिकां तुरङ्गाः । जाम्बूनदाभरणकर्बुरितास्तदानीमालातचक्रधिषणां दधिरे न कस्य ॥३३॥ शिक्षा विशेष के कारण सवारों ने घोड़ों को गोल घेरे में दौड़ाया; उस समय सोने के आभूषणों से सज्जित घोड़े जलती हुई और चारों ओर घुमाई जाने वाली मशाल के घेरे की बुद्धि उत्पन्न कर रहे थे ॥ ३३ ॥ यानक्रमादतिनिरन्तरतामुपेतौ द्वौ सादिनौ प्रणयसङ्कथनेन यान्तौ । घ्रात्वा परस्परमुखं क्षणतो हयाभ्यां साक्षेपनादमथ दूरमनायिषाताम् ॥३४॥ साथ साथ चलने के कारण अत्यन्त समीप आये हुये दो सवार परस्पर प्रेमालाप करते हुये जा रहे थे, किन्तु उनके घोड़ों ने शीघ्र एक दूसरे का मुंह सूंघ कर आक्षेप के साथ हिनहिना कर उन्हें दूर कर दिया ॥ ३४ ॥ दैवादुपेत्य बडवाधिरुहं तुरङ्गी कश्चित् पथि प्रतिहतप्रसरावकाश
२४ षोडशः सर्गः १८५ श्यामद्युतः पिदधतो हरितां मुखानि विष्वग्विसारिमदवारिझरं क्षरन्तः । वातेरिता इव नवीनघनाः सनादमीयुर्महीधरनिभा महिता महेभाः ॥३९॥ काली कान्ति वाले, दिशाओं के मुखों को ढाँकने वाले, चारों ओर विस्तृत मदजल की झड़ी लगाने वाले, पर्वतों के समान बड़े बड़े हाथी, वायु से प्रेरित नये मेघों के समान, गरजते हुये चले ॥ ३९ ॥ उत्तंसितोज्वलविचित्रपतत्रिपत्रा गाढोपगूहितकटीधृतकिंकिणीकाः । आस्फालितप्रहरणाः प्रथितस्वदर्पा जग्मुः समुद्धतगतेन पदातिमुख्याः ॥४०॥ (मयूर आदि) पक्षियों के उज्ज्वल और रंग बिरंगे पंखों को सिर पर लगाकर, घुंघरुओं की माला को कमर में अच्छी तरह बाँध कर, अपने अभिमान को प्रकट करने वाले पैदल सैनिक शस्त्रों पर हाथ फेरते हुये उद्धत चाल से चल रहे थे ॥ ४० ॥ वल्गान्तविस्फुरितशोणितसङ्गिफैनैरश्वैः श्वसद्भिरुपकूलमथापगायाः । भालेषु रेणुभरकर्दमितं वहन्तः स्वेदोदबिन्दुलहरीं ययुरश्ववाराः ॥४१॥ लगाम के कोने की रगड़ से निकले हुये खून के कारण लाल फेन वाले हाँफते हुये घोड़ों पर बैठे हुये सवार अपने ललाटों पर पसीने की लहरों को, जो (टापों से उड़ी हुई) धूल के कारण कहीं कहीं कीचड़ की तरह बन गई थी, धारण करते हुये, नदी के किनारे किनारे जा रहे थे (नदी की भाँति सवार भी फेन, कीचड़ और लहरों से युक्त थे) ॥ ४१ ॥ उच्चैस्तया गतमिवान्तिकमुष्णरश्मेः पादैर्नितान्तपरुषैः परितापिताङ्गम् । नैसर्गिकीं गतिमपास्य मुहुर्जवेन रोधो रुरोध करियूथमथापगायाः ॥४२॥ ऊँचाई के कारण सूर्य को छूने वाले और सूर्य की अत्यन्त कड़ी किरणों से संतप्त अंगों वाले हाथियों के समूह ने, अपनी स्वाभाविक धीमी चाल छोड़ कर, वेग से नदी का तट घेर लिया ॥४२॥ पारं प्रयातमनसं सवरूथिनीकमालोक्य तत्र सरितो मनुजाधिनाथम् । आनायिभिर्द्रुतमन्यायिषत प्रकामं स्फारास्ततस्तरणयः स्थिरकर्णधाराः ॥४३॥ राजा को सेनासहित नदी के पार जाने का इच्छुक देख कर मल्लाह शीघ्र बड़ी बड़ी विस्तृत नौकायें ले आये जिनमें केवट बैठे हुये थे ॥ ४३ ॥ नीतोऽपि पारगमनाय गुरुप्रयत्नात् तीरस्थ एव परिपीतपयः प्रमत्तः । नाशु व्यगाहत करी गहनं ह्रदाम्भस्तप्तोऽपि तप्तकिरणस्य करैः कठोरैः ॥४४॥ एक प्रमत्त हाथी खूब जल पीकर तीर पर ही खड़ा रहा; यद्यपि महावत बड़े प्रयत्न से उसे चलने के लिये प्रेरित कर रहा था और वह स्वयं भी सूर्य की प्रचण्ड किरणों से सन्तप्त हो रहा था, तो भी वह नदी के गहरे जल में शीघ्रता से नहीं घुसा ॥ ४४ ॥ आधोरणान् मदवशादवधीरयन्तः स्तब्धाः क्षणं तटमधि द्विरदा मदान्धाः । उत्तेजितास्तरलिताः परतीरगर्जन्मत्तापरद्विरददुःसहदानगन्धैः ॥४५॥ उत्कट मद के कारण महावतों की अवज्ञा करके मदान्ध हाथी स्तब्ध होकर कुछ देर तक तट पर ही खड़े रहे, किन्तु सामने के तट पर चिंघाड़ते हुये मत्त शत्रु-हाथियों के मदजल की दुःसह गन्ध को सूँघने के कारण उत्तेजित होकर नदी के पार चले गये ॥ ४५ ॥
ग)!! IT IS AN EXACT, 100% PERFECT VASANTATILAKA METER! Let's check the letters again: स्ते (1) ह (2) स्त (3) -> wait, is it 'हस्त'? Wait, 'हस्त' doesn't mean anything with 'रङ्गततरलां' unless... wait, what word starts with 'हस्त'? Wait! Could it be "स्तेहस्तरङ्गततरलां"? Wait, why "हस्तरङ्गततरलां"? Or is it "स्तेऽस्तरङ्गततरलां"? Wait, if it's "ऽस्त", then syllable 2 is missing! Syllable 2 MUST exist for the meter to have 14 syllables! If it's 'ह', then ह is syllable 2! Wait, look at that letter: it has a top bar, then down-right curve, loop... wait, is it 'ह'? Wait! Could it be 'ऽह'? No. Could it be 'सह'? Wait, look at the letter before 'स्त': It is 'ह'! Wait, why 'हस्तरङ्गततरलां'? Wait, could it be "उत्तस्तरङ्गततरलां"? No, the first letter is 'ह' or 'अ' or 'उ'? Wait, look at the Hindi: "लहरों से चञ्चल नदी को तैर गये". "तैर गये" = what verb? Wait! Where
षोडशः सर्गः १८७ संसारवेणिमिवशुद्धगुरुपदिष्टविद्याभिरुद्यमविशेषभृतो विविक्ताः । उत्तेरुरातरमतित्वरयाऽतिरिक्तं केचिद् वितीर्य तरिभिः सरितं सुखेन ॥५२॥ जिस प्रकार विवेकी पुरुष, विशेष उद्यम करके, सद्गुरु से उपदिष्ट शुद्ध विद्याओं द्वारा इस संसारप्रवाह को सुखपूर्वक पार कर जाते हैं, उसी प्रकार कुछ लोगों ने, जल्दी के कारण अधिक खेवाई देकर, नावों द्वारा उस नदी को सुखपूर्वक पार कर लिया ॥ ५२ ॥ आवेष्टय मौलिवसनेन धनुः सतूगं सव्येतरेण च करेण शिरोऽवलम्ब्य । एकेन कश्चन करालत रङ्गमालां दोष्णा नुदन्नतिबलस्तरति स्म दूरम् ॥५३॥ तरकस के साथ धनुष को अपनी पगड़ी से पीठ पर बाँध कर और दाहिने हाथ से सिर को सहारा देकर, एक वीर सैनिक केवल बायें हाथ से ही भीषण लहरों वाली नदी को दूर तक तैर गया ॥ ५३ ॥ निर्माय कश्चिदुडुपं दृढबन्धनाढ्यमारोप्य तत्र दयितां दरकम्पिताङ्गीम् । व्यावृत्त्य कातरमुखं मुहुरेतदीयं पश्यन् गुणार्पितकरः शनकैस्ततार ॥५४॥ कोई दृढ़ बन्धन से युक्त छोटी सी नाव बना कर और उस पर भय से कम्पित शरीर वाली प्रिया को बैठा कर तथा रस्सी पकड़ कर, प्रिया के कातर मुख को बार बार देखता हुआ, धीरे धीरे पार चला गया ॥ ५४ ॥ तीर्त्वेत्थं तटिनीं [.....]हैरंलिहिंराकुला— [....]र्ती मनुजाधिपः पृतनया प्रीतिप्रफुल्लाननः । उद्दण्डाऽहितचण्डडिण्डिमरवेरुज्जृम्भमाणत्वरः सम्प्राप्तः पृथुपौरुषः पुरमसौ पौरान् समुल्लासयन् ॥५५॥ प्रेम से प्रसन्न मुख वाले और सेना से घिरे हुये राजा सुर्जन ने इस प्रकार मेघों को छूने वाली बड़ी-बड़ी लहरों से व्याकुल नदी को पार किया और उद्धत शत्रुओं के प्रचण्ड वाद्यों के शब्दों को सुन कर जल्दी चलने वाले महान् पराक्रमी राजा, नागरिकों को प्रसन्न करते हुये, अपने (रणथं- भौर) नगर में पहुँच गये ॥ ५५ ॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये षोडशः सर्गः ॥
(५२) आतरस्तरपण्यम् ।
सप्तदशः सर्गः अथापरेद्युः परदर्पहन्ता सन्नह्य सैन्यैरविषण्णचेताः । युद्धाय बद्धातिशयप्रयत्नः सपत्नसेनाभिमुखं प्रतस्थे ॥ १ ॥ फिर दूसरे दिन, शत्रुओं के अभिमान को चूर करने वाले राव सुर्जन कवच इत्यादि से सुस- ज्जित होकर, सेना को साथ लेकर, अव्यग्र मन से, युद्ध के लिये अधिक प्रयत्नशील होकर, शत्रुसेना के सम्मुख चले ॥ १ ॥ तस्य प्रयातुः पटहप्रणादाश्चमूरचोद्भूतनधूलयश्च । समं पुरोऽवस्थितशात्रवाणां श्रोत्राणि नेत्राणि च रुन्धते स्म ॥ २ ॥ उनके प्रयाण के समय बजने वाले नगाड़ों के शब्दों ने और उनकी सेना से उड़ने वाली धूल ने सामने स्थित शत्रुओं के कानों और आँखों को एक साथ आक्रान्त किया ॥ २ ॥ दिशोभिमानं किमु किन्नु तासां पर्यन्तमव्याहतमश्नुवानम् । विलङ्घ्य किं ताः स्थितमस्तपारं विलोकयामास बलं स शत्रोः ॥ ३ ॥ उस शत्रुसेना को, जो चारों
सप्तदशः सर्गः १८९ घण्टानिनादैरुपबृंहितेन दिग्वारणश्रोत्रविदारणेन । आधोरणस्फालनदीपितानां मदद्विपानां घनबृंहितेन ॥ ८ ॥ घोणारवैर्घुर्रघुरिकानिनादैस्तुरङ्गमाणां गुरुहेषितेन । बाहू समास्फोटयतां भटानामत्युद्भटैरारभटीनिनादैः ॥ ९ ॥ आग्नेययन्त्रैः पततामजस्रमुदर्चिषामायसगोलकानाम् । निर्घातपातप्रतिमैश्च घोषैर्नादैकरूपं जगदादधानम् ॥१०॥ दिग्गजों के कानों को फाड़ने वाली तथा घंटों के शब्दों से बढ़ी हुई, महावतों के चलाने से उत्तेजित मदोत्कट हाथियों की भयंकर चिंघाड़ों से, नाक से 'घुर्घुर' शब्द करने वाले घोड़ों के जोरों से हिनहिनाने से, भुजाओं को फटकार कर ताल ठोकने वाले प्रबल वीरों के उद्धत शब्दों से और तोपों से लगातार निकलने वाले जलते हुये लोहे के गोलों के जोरों से गिरने से वह शत्रुसेना जगत् को नादमय बना रही थी (जगत् नादब्रह्म से निकला है) ॥ ८-१०॥ ततः शरौघाः परवीरचक्रात् निश्चक्रमुः सस्वनमक्रमेण । धारा इवाम्भोधरविप्रकीर्णा वातेन तिर्यग्गतिमश्नुवानाः ॥११॥ इसके बाद शत्रुवीरों के समुदाय से, बिना क्रम के, जोरों के शब्दों के साथ बाणवृष्टि होने लगी जो बादलों से बरसने वाली और वायुवेग के कारण टेढ़ी बनी हुईं धारावृष्टि के समान लग रही थी ॥ ११ ॥ चमूरमुष्यापि [समृद्धिम]न्तः समं समाक्रान्तवती विपक्षान् । अजिह्मगैर्जिह्मगतुल्यरूपैस्तेषां पृषत्काऽलिमपार्थयद्भिः ॥१२॥ समृद्ध[बल] वाले राव सुर्जन की सेना ने भी उसी समय शत्रुओं पर आक्रमण किया और सर्पों के समान ल[म्बे] वाले बाणों से शत्रुओं के बाणसमूह को बेकार कर दिया ॥ १२ ॥ स्वसम्मुखं सञ्च[र]तोस्तदानीमनीकयोः सङ्गररङ्गभाजोः । [द्व]योः क्षणादैक्यमभूद् यथाम्भःप्रवाहयोः प्रावृषि तीव्रवेगात् ॥१३॥ युद्धभूमि में एक दूसरे के सामने लड़ने वाली उन दोनों सेनाओं का कुछ देर के लिये ऐक्य हो गया जैसे वर्षा ऋतु में दो तरफ से बहने वाले जलप्रवाहों का मेल हो जाता है ॥१३॥ नभःस्थितं तावदरुद्ध युद्धे रजोन्धकारोऽरुणमग्रतो यः । भूमिं स्थितस्तं भटशोणितोत्थः परो न्यरौत्सीदरुणः प्रवाहः ॥१४॥ उस युद्ध में धूल के अन्धकार ने ऊपर उड़ कर आकाश में स्थित सूर्य को घेर लिया ; तब वीरों के भूमिस्थ रुधिर प्रवाह ने उस धूल के अन्धकार को घेर लिया । (सेना से उड़ी हुई धूल ने आकाश में जाकर सूर्य को ढाँक दिया और युद्धभूमि में बहने वाले वीरों के रक्तप्रवाह ने उस धूल को नीचे बिठा दिया) ॥१४॥ (१२) अजिह्मगाः बाणाः जिह्मगाः सर्पाः ।
१९० सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् रजस्तमोद्धतरावकाशे जगत्यनासाद्य पदं कुतश्चित् । विवेश सत्वं सुतरां भटानां स्वतन्त्रमन्तःकरणं तदानीम् ॥१५॥ उस समय जगत् रजस् (धूल) के तमस् (अन्धकार) से घिर रहा था, अतः सत्व (सत्व गुण; बल) रजस्तमोमय (रजोगुण और तमोगुण से आक्रान्त; धूल के अन्धकार से युक्त) संसार में कहीं स्थान न पाकर, वीरों के स्वतन्त्र अन्तःकरणों में प्रवेश कर गया अर्थात् वीरों के हृदयों में बल का संचार हो गया ॥१५॥ आकृष्य दूरं गुणमाशु मुक्ते विनिर्गतेऽङ्गानि विभिद्य बाणे । अपारिता वाचयितुं परेण वृथा बभूवुर्भटनामवर्णाः ॥१६॥ ज्या को दूर तक खींच कर शीघ्रता से छोड़े गये बाण के शत्रु के अंगों के भेद कर बाहर निकल जाने के कारण शत्रु उस वीर के नाम के उस बाण पर खुदे हुये अक्षरों को न पढ़ सका और वे अक्षर व्यर्थ ही रहे ॥१६॥ पुरः परेण क्षिपता शिरस्त्रमाकङ्कपत्रं निटले निखातः । पुंसः परावृत्तिपराङ्मुखस्य शरः किरीटस्य चकार कान्तिम् ॥१७॥ किसी शत्रु का बाण एक वीर के ललाट में इतना अन्दर घुस गया कि उसकी जड़ ही बाहर रही, फिर भी वह वीर युद्ध में सामने ही डटा रहा और उस बाण का बाहर दिखाई देने वाला मूल- भाग उस वीर, के मस्तक पर किरीट के समान कान्ति को करता रहा ॥१७॥ मर्मातिगेनाऽहितमार्गणेन विभिन्नमर्मा न चचाल कश्चित् । सम्वर्मयामास वपुर्विशङ्कः स्वाभाविकेनैव हि साहसेन ॥१८॥ शत्रु के मर्मस्पर्शी बाणों से किसी वीर का कवच छिन्न भिन्न हो गया, फिर भी वह वीर युद्ध में डटा रहा और निःशंक होकर उसने अपने शरीर को अपने स्वाभाविक साहस के कवच से सुशोभित किया ॥१८॥ निरुन्धति व्योमनि मार्गमह्नो निरङ्कुशे रेणुकृतान्धकारे । आनन्दसान्द्रस्मितचन्द्रिकाभिव्यक्तं प्रवीरस्य मुखं व्यलोकि ॥१९॥ उद्धत धूल ने दिन के मार्ग को रोक कर आकाश को व्याप्त कर लिया, फिर भी आनन्द की घनी मुस्कान रूपी चाँदनी में किसी वीर का मुख स्पष्ट दिखाई दिया ॥१९॥ संयोज्यमाने विशिखेन चापे विलूनशीर्षोपि शरेण सद्यः । कबन्धभावेऽपि तथैव कश्चिद् विदूरमाकृष्य मुमोच बाणम् ॥२०॥ कोई वीर अपने धनुष पर बाण चढ़ा ही रहा था कि शत्रु ने उसका सिर काट गिराया, फिर भी उस वीर के कबन्ध (रुंड) ने ही उस बाण को दूर तक खींच कर छोड़ा ॥२०॥ (१७) आकंकपत्रमुपमूलं यावत् ।
सप्तदशः सर्गः १९१ प्रणोदितानां सरयं शराणामन्योन्यसंघट्टभवो हुताशः । लग्नः पताकासु ततान दूरादुल्काविकासभ्रममभ्रसीम्नि ॥२१॥ वेग से छोड़े गये बाणों के परस्पर संघर्ष से जो अग्नि उत्पन्न हुई वह पताकाओं में लग कर आकाश में दूर से ऐसी लगी मानों कोई तारा टूट रहा हो ॥२१॥ नीतं नभः शत्रुशरै र्विलूनं शिरः प्रवीरस्य विरोचते स्म । गतं किमु व्योमसदां वधूनां विधूयमानाननचुम्बनाय ॥२२॥ शत्रुओं के बाण से काटा गया और आकाश में उछाला गया किसी वीर का सिर इस प्रकार शोभित हुआ मानों वह स्वर्ग की अप्सराओं के हिलते हुये मुख को चूमने के लिये गया हो (युद्ध में काम आने वाले वीरों को वरने के लिये अप्सरायें आती हैं) ॥२२॥ नितान्तनिस्वाद्यतया पिशाचा रक्तं स्रवन्तीमविगाहमानाः । अस्रं पपुः पाणितलोपगूढकृत्तेभशुण्डाविवरैर्विदूरात् ॥२३॥ पिशाचगण उस अत्यन्त स्वादिष्ट रक्त को रक्त-नदी में बिना घुसे ही दूर से, हाथियों की कटी हुई सूंडों के छेदों से पी रहे थे ॥२३॥ आसन्नगाधेऽस्रसरित्प्रवाहे कृत्तद्विपाः कुत्रचिदन्तरौपाः । ददर्श येषु स्थितमेत्य कालः क्रव्याशिनां वारिविहारलीलाः ॥२४॥ रक्तासवास्वा[द...] क्रव्याद्वधूगीतसमानकालम् । वेतालकान्ता[कर...]कृतानुबन्धान् नटतः कबन्धान् ॥२५॥ उस अगाध प्रवाह वाली रक्त नदी में मरे हुये हाथी टापुओं की तरह लग रहे थे जिन पर चढ़ कर [साक्षात्] काल मांसभक्षियों की (रक्त-नदी में) जलक्रीड़ायें देख रहा था—पिशाचों की स्त्रियाँ खून-रक्तमदिरा पीकर मस्त होकर गीत गा रही थीं और वेताल स्त्रियाँ तालियाँ बजा रही थीं जिनके ताल पर कबन्ध (रुंड) नाच रहे थे ॥२४-२५॥ [मांसा]शया शोणितपङ्करुद्धं मौलिस्थमाणिक्यदलं निगीर्य । लग्नं [गले] गाढमथोज्जिगीषुर्व्यग्रा शिवा तीव्रतरं ववाशे ॥२६॥ रुधिर रूपी कीचड़ में सने हुये किसी वीर के शिरोभूषण में जड़े हुये माणिक-समूह को मांस समझ कर एक गीदड़ी (शृगाली) उसे निगलने लगी, किन्तु वह गले में जाकर गहरा फँस गया और विचारी गीदड़ी व्याकुल होकर बुरी तरह चिल्लाने लगी ॥२६॥ ततः परं वीक्ष्य विपक्षसैन्यैः पताकिनीं विक्लवितां स्वकीयाम् । अवातरद् वातरयं तुरङ्गममारूढवान् शूरजनो रणाय ॥२७॥ इसके बाद अपनी सेना को शत्रु सेनाओं द्वारा व्याकुल देख कर राव सुर्जन पवन के समान वेगशील घोड़े पर चढ़कर युद्धभूमि में कूद पड़े ॥२७॥ (२६) ववाशे चीञ्चकार ।
१९२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मौर्वीरवेण व्रणयन्नरातिश्रोत्राणि स त्राणकरो नतानाम् । अगाहताऽगाधबलं बलीयान् यथाम्बुराशिं प्रथमो वराहः ॥२८॥ विनीत पुरुषों की रक्षा करने वाले बलवान् राव सुर्जन अपने धनुष की ज्या की टंकार से शत्रुओं के कानों को घायल करते हुये, शत्रुओं की अपार सेना में उसी प्रकार घुस पड़े जिस प्रकार आदिवराह (वराहावतार) अथाह समुद्र में (पृथ्वी का उद्धार करने के लिये) घुस गये थे ॥२८॥ निषङ्गसङ्गत्वरमेकमन्यं करं धनुःस्थं श्रवणस्थमन्यम् । मौर्वीषयोगे परमेकदेनं पश्यंश्चतुर्बाहुममंस्त लोकः ॥२९॥ उस समय ऐसा प्रतीत होता था कि मानों राव सुर्जन का एक हाथ तरकस से जल्दी जल्दी बाण निकालने में लगा है, दूसरा हाथ धनुष को पकड़े है, तीसरा हाथ प्रत्यंचा को कान तक खींच रहा है और चौथा हाथ प्रत्यंचा पर चढ़े हुये बाण को छोड़ रहा है—ऐसी प्रतीति होने के कारण उन चतुर्बाहुमान् (चौहाण) वीर सुर्जन को लोगों ने उस समय वास्तव में चतुर्बाहुमान् (चतुर्भुज) ही समझा ॥२९॥ अपीडयन् म्लेच्छभटानभीक्ष्णं तीक्ष्णाः पृषत्काः प्रभुणा विमुक्ताः । जन्तूनिव प्रान्तरसीमसंस्थान् वर्षोपलास्तोयधरेण नुन्नाः ॥३०॥ राजा द्वारा छोड़ें गये तीक्ष्ण बाण उन यवन वीरों को उसी तरह बराबर पीड़ा देते रहे, जिस तरह मेघ द्वारा बरसाये गये ओले दूर निर्जन भयरहित स्थान की सीमा में रहने वाले (छोटे-छोटे) प्राणियों को पीड़ित करते हैं ॥३०॥ व्ययोजयन् कांश्चन जीवनेन बाणास्तदानीं यवनवीरान् । कल्पावसानोदितचण्डभानोः स्फुरन्मयूखा इव जीवलोकान् ॥३१॥ उनके बाणों ने कई यवनवीरों को अपने प्राणों से वियुक्त कर दिया, जैसे प्रलय के समय उदित प्रचण्ड सूर्य की तीव्र किरणें जीवों को प्राणों से वियुक्त कर देती हैं ॥३१॥ आयामवत्श्मश्रुशिरस्त्रभाञ्जि शिरांसि तेषां रुधिरापगासु । स्वच्छन्दमास्कन्द्य निषेदिवांसः सुखेन खेलां दधति स्म गृध्राः ॥३२॥ लम्बी चौड़ी दाढ़ी और शिरस्त्राणों से युक्त उन यवनों के रुधिर की नदियों में पड़े हुए सिरों पर फैल पसर कर आराम से बैठे हुये गिद्ध सुखपूर्वक खेल रहे थे ॥३२॥ अजिह्मगानामपि नाम तेषां तत्कर्तृकं मोचनमेव युक्तम् । गुणाश्रयं दर्शितपक्षपातं कुर्वन्ति येऽमी परभेदहेतोः ॥३३॥ यद्यपि वे 'अजिह्मग' (बाण; सरल) थे तो भी राजा के लिये उनको छोड़ देना ही उचित था क्योंकि वे 'पक्षपात' (पक्ष अर्थात् बाण के पिछले भाग के साथ गिर कर; किसी पक्ष का अनु- चित समर्थन) दिखला कर दूसरों को भेदने के लिये (पीड़ा देने के लिये) ही 'गुण' (प्रत्यञ्चा.; गुण) का आश्रय लेते थे ॥३३॥ (३०) प्रान्तरसीमसंस्थान् दूरशून्यमार्गसीम्नि स्थितान् । (३३) तत्कर्तृकं राज्ञा कृतमित्यर्थः ।
२५ सप्तदशः सर्गः १९३ अजिह्मगाः सन्त्वथ जिह्मगा वा कर्णेजपा दूरतरे विधेयाः । येऽन्तः प्रविश्य प्रथमं परेषां प्राणाननाकृष्य बहिर्न यान्ति ॥३४॥ चाहे सरल (अजिह्मग) हों, चाहे कुटिल (जिह्मग), वाणों को 'कर्णेजप' (कान में गुन- गुनाने वाले अर्थात् कान तक खींच कर छोड़े जाने वाले) होने के कारण दूर छोड़ना ही अच्छा है (अथवा चाहे सरल हों, चाहे कुटिल, वाणों (अजिह्मग) को, साँपों (जिह्मग) को और चुगलखोरों (कर्णेजप) को दूर छोड़ना ही अच्छा है) क्योंकि ये पहले दूसरों के भीतर घुस कर, बिना उनके प्राणों को बाहर निकाले, स्वयं भी बाहर नहीं निकलते ॥३४॥ तद्बाणवह्नोरनलं विषोढुं ज्वालां करालामथ पारसीकाः । विदुद्रुवुर्दावशिखिप्रतप्ता जीवा इवारण्यचराः पराञ्चः ॥३५॥ राव सुर्जन के वाणों की भयंकर प्रज्वलित अग्नि को वे यवन नहीं सह सके और विमुख होकर भाग गये, जैसे दावानल के भयंकर संताप को न सह कर वन के प्राणी भाग जाते हैं ॥३५॥ ते त्रासजान्धंतमसावसन्ना विस्रस्तशस्त्राः परितो भ्रमन्तः । नालक्षयन् सूक्षिणमन्तिकस्थं प्रभुं नृपाणामपि शासितारम् ॥३६॥ भय से उत्पन्न गहरे अन्धकार से घिरे हुये वे यवन अपने शस्त्र छोड़ कर चारों ओर भाग खड़े हुये और घबराहट के कारण वे राजाओं के भी शासक और अपने रक्षक अकबर को, जो समीप ही स्थित थे, नहीं देख पाये ॥३६॥ तथाविधांस्तानपि वीक्ष्य...पः सर्वसहामण्डलसार्वभौमः । सहासमाह स्...धीरस्वनः सैनिकनाथमुख्यान् ॥३७॥ भूमण्डल के सार्वभौम [सम्राट] अकबर ने अपने मुख्य सेनापतियों को इस प्रकार भयभीत देख कर, हँसते हुये, मेघ के समान गंभीर स्वर में, उनसे यों कहा ॥३७॥ ...ङ्गोणीशांस्तरसा स्वदोर्भ्यां शश्वत्समुत्तीर्णवतां सहेलम् । ... भवेन् मोहतमोवकाशस्तडागकासारविगाहनेषु ॥३८॥ [आश्च]र्य है कि जिन वीरों ने सदा अपने बाहुबल से समुद्रों तक को वेग से खेल ही खेल में पार कर [लि]या, उन्हें आज छोटे से तालाब को पार करने में भयंकर व्यामोह हो रहा है ! ॥३८॥ [उ]ल्लङ्घिता यैरर्लघूप्रतापैः कुतूहलेनैव कुलाचलेन्द्राः । [गण्ड]शैलाक्रमणेऽपि तेषां सम्भावितो विप्रतिपत्तिलेशः ॥३९॥ जिन महाप्रतापी वीरों ने कुतूहल में ही बड़े बड़े पर्वतों को पार कर लिया, उन्हें आज पहाड़ से गिरी हुई शिला को पार करने में शंका हो रही है ! ॥३९॥ विरोधिभूपालवरूथिनीशे निरन्तरापि प्रसभं सुखेन । मया समासादि समुद्रसीमा समुद्रनेमिर्भवतां बलेन ॥४०॥ बड़े बड़े शत्रुराजाओं के सेनापतियों के होते हुये भी उन्हें हठात् परास्त करके इस अव्यवहित समुद्ररशना पृथ्वी को मैंने आप ही लोगों के पराक्रम के कारण सुख से प्राप्त किया है ॥४०॥ (३६) सूक्षिणं रक्षकम् । - (३९) गण्डशैलाः पर्वतात् पतिताः स्थूलोपलाः ।
१९४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमानमन्नेव ममैष चापः क्ष्मापालमुख्यान् नमयाञ्चकार । निदानमस्मिन् नितरामुदग्रा भवादृशामेव पराक्रमर्द्धिः ॥४१॥ मेरे इस धनुष ने बिना झुके ही (क्योंकि इस पर प्रत्यंचा चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं हुई) बड़े बड़े श्रेष्ठ राजाओं को झुका दिया है—इसका कारण भी आप जैसे वीरों का अत्यन्त प्रबल पराक्रम ही है ॥४१॥ यशांसि युष्माकमहो जिहीर्षुर्जगत्प्रकाशान्यपि जाङ्गलोऽयम् । मध्येमृधं धामभृतां नृपाणां यान्यर्जितान्यूर्जितविक्रमेण ॥४२॥ आप लोगों ने युद्ध में बड़े बड़े तेजस्वी राजाओं को परास्त करके अपने प्रबल पराक्रम से जो जगद्विख्यात यश संचित किया है उस यश को आज यह जंगली मिटा देना चाहता है ! ॥४२॥ अतः परं किन्नु विडम्बनं स्यादपत्रपायाः परमावधिर्वा । पृष्ठं परे यत् समितौ भटानां पश्यन्ति वक्षोऽपि कुलाङ्गनानाम् ॥४३॥ इससे बढ़ कर और क्या अपमान हो सकता है और इससे बढ़ कर लज्जा की और कौन-सी पराकाष्ठा हो सकती है कि लोग वीरों की युद्ध में पीठ और कुलीन स्त्रियों का वक्षःस्थल देख सकें ! ॥४३॥ कार्यं समीचीनमथेतरद् वा निर्वाहकाले कुरुते नरो यत् । तत् प्राक्प्रणीतं विपरीतकृत्यं प्रमाष्टि यस्तस्य वश्यम् ॥४४॥ आपत्काल में पुरुष जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है वह अवश्य ही पहले किये गये बड़े भारी बुरे या अच्छे कार्य को भी मिटा देता है ॥४४॥ पराजितेऽस्मिन्नपरं शरव्यं भवद्विधानां न महीतलेऽस्मिन् । वेलाविलासावधि वारिराशेर्वशीकृतं तत् खलु विश्वमेव ॥४५॥ इसे पराजित कर देने पर इस भूमंडल में आप जैसों के बाणों का और लक्ष्य नहीं बचता क्योंकि फिर समुद्र तट तक सारा विश्व अपने ही वश में है ॥४५॥ इतीरितास्ते प्रभुणा प्रवीरा ह्रिया च भीत्या च निवर्तिताश्वाः । शूरं प्रजह्नुः समकालमेव निजैर्निजैर्निर्दयमुद्धतास्त्रैः ॥४६॥ अपने सम्राट् द्वारा इस प्रकार प्रेरित उन यवन वीरों ने लज्जा और भय के कारण अपने अपने घोड़े वापस लौटा लिये और उन सबने अपने अपने उद्धत शस्त्रों से निर्दयतापूर्वक एक साथ वीर सुर्जन पर प्रहार किये ॥४६॥ चिरं परिश्रान्तिपरीतदेहः श्वसन् सफेनप्लुतशोणितास्यः । अथास्य वाहः परवाहिनोशैः शिलीमुखैस्तीक्ष्णमुखैरघानि ॥४७॥ इसके बाद उन शत्रुसेनापतियों ने राव सुर्जन के घोड़े को, जिसका शरीर अत्यन्त परिश्रम के कारण चूर-चूर हो रहा था, जो बुरी तरह हाँफ रहा था और जिसके मुँह से फेन और खून निकल रहा था, अपने तेज बाणों से मार दिया ॥४७॥
सप्तदशः सर्गः १९५ यावत् तुरङ्गं पतनोन्मुखं तं विहाय वाहान्तरमभ्युपैति । तावद् विपक्षाः किल चापमौर्वीमुर्वीपतेस्तस्य विलनवन्तः ॥४८॥ जिस समय राव सुर्जन उस गिरने वाले घोड़े को छोड़ कर दूसरे घोड़े पर चढ़ रहे थे उसी समय शत्रुओं ने उनके धनुष की प्रत्यंचा को काट दिया ॥४८॥ बाणासनं तद् विनिकार्य विद्वाञ्जवेन जग्राह स मण्डलाग्रम् । तं भीममूर्तिर्भ्रमयन् बभासे यथा दिनेशः परिवेषसङ्गात् ॥४९॥ विद्वान् सुर्जन ने शीघ्र उस धनुष को फेंक कर वेग से तलवार हाथ में ले ली और भयंकर रूप धर कर उस तलवार को चारों ओर घुमाते हुये वे परिधि से घिरे हुए सूर्य के समान शोभित हुए ॥४९॥ कौक्षेयकाक्षेपपरिक्षतानां क्षितिक्षितां ख्यातविपक्षगानाम् । अक्षीणदाक्ष्यः क्षतजैरभीक्षमक्षालयत् क्षोणितलस्य कुक्षिम् ॥५०॥ युद्ध-कुशल राजा ने विख्यात शत्रु-राजाओं के अपनी तलवार के प्रहारों से उत्पन्न घावों से बहने वाले रुधिर से निरन्तर धरातल की कोख को पाट दिया ॥५०॥ विनिघ्नतस्तस्य समन्तस्तानरीन् नरेन्द्रस्य तुरङ्गमेन्द्रः । भ्रमन् विभाति स्म यथा मरालः स्फुरन्महावर्तविवर्तमानः ॥५१॥ शत्रुओं को मारने वाले राजा और उसका घोड़ा युद्धभूमि में चारों ओर घूमता हुआ, बड़ी भँवर में घूमने वाल हंस के [समान शोभित हो] रहा था ॥५१॥ अथापरे वैरि[वधैषिणोऽन्ये] विनिर्जितप्रोन्मदमेदिनीशाः । [म]र्माणि सम्भिद्यपि भेदयन्तः शस्त्रैः प्रजापालममुं प्रजह्रुः ॥५२॥ इसके [बाद] बड़े-बड़े उन्मद राजाओं को जीतने वाले अन्य शत्रु-सेनापतियों ने, राव सुर्जन के कवच [तथा व]क्षस्थल को भेदते हुये, शस्त्रों से उन पर प्रहार किये ॥५२॥ [अ]त्युग्रैः कङ्कटभेदिभिस्तैः प्रबाध्यमानाननुवेलमस्त्रैः । [अ]व्यग्रचेताः सममुग्रवेगात् प्रत्यग्रहीत् तान् प्रहराजतेजाः ॥५३॥ कवच [को भेदने] वाले अत्यन्त तीव्र शस्त्रों से लगातार प्रहार करने वाले उन शत्रु सेनापतियों के प्रहारों [को सूर्य] के समान तेजस्वी राव सुर्जन ने अव्यग्रचित्त होकर रोका और प्रबल वेग से उन पर वार करना प्रारंभ किया ॥५३॥ सम्भावयामास तमुग्रसत्त्वं हूमायूँजः सन्ततसाधुवादैः । सा स्यादसाधारणता गुणानां प्रमोद्येद् यद्विषतोपि चेतः ॥५४॥ महान् पराक्रमी राव सुर्जन की, हुमायूँ के पुत्र अकबर बार बार 'वाह वाह' कहते हुये, भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे; वास्तव में गुणों की असाधारणता वही है जो शत्रु के चित्त को भी प्रसन्न कर दे ॥५४॥ (५३) कंकटभेदिभिः कवचभेदिभिः ।
१९६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् गुरुसमरसमुत्थरेणुपूरैर्मलिनितमात्मवपुस्त्विषामधीशः । विमलयितुमिवोदके निमङ्क्षुश्चरमपयोनिधिसन्निधिं जगाम ॥५५॥ सूर्य भगवान् उस भीषण युद्ध में उड़ी हुई धूल के समूह से मैले बने हुये अपने शरीर को जल में डुबकी लगा कर साफ़ करने के लिये ही मानों पश्चिमी समुद्र के पास गए ॥५५॥ अकबरधरणोशः सन्निवृत्य स्वसैन्यं शिविरमुखमयासीद् वासरस्यावसाने बहलरुधिरधाराधोरणीधौतदेह- स्तदनु निववृते च क्षोणिपालः स्वदुर्गम् ॥५६॥ दिन डूबने पर सम्राट् अकबर अपनी सेना को लौटा कर शिविर की ओर चले और तब राजा सुर्जन भी, जिनके शरीर से गहरी रुधिर धारायें बह रहीं थीं, अपने दुर्ग में लौट गये ॥५६॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये सप्तदशः सर्गः।
अष्टादशः सर्गः यावदुद्यमभृतोऽस्य रणाय स्वैरमुल्लसति दुन्दुभिनादः । तावदेव सचिवः शकभर्तुः प्रातरेत्य मिलितः प्रतिहारे ॥ १ ॥ जिस समय युद्ध के लिये तैयार होने वाले राव सुर्जन के नगाड़ों के शब्द जोरों से बजने लगे, उसी समय प्रातःकाल अकबर के मंत्री (मानसिंह) द्वार पर मिलने आये ॥ १ ॥ अर्हणाभिरुचितोपचिताभिस्तेन चारुचरितेन स नीतः । संसदं मृदुपदां गुणगुर्वीमाददे गुरुमतिर्गिरमेताम् ॥ २ ॥ सुन्दर चरित्रवाले राजा सुर्जन उनको उचित आदर सत्कार के साथ सभा में ले आये और बुद्धिमान् मंत्री ने शब्दों से कोमल और गुणों से भारी ये वचन कहे ॥ २ ॥ आगतः स्वयमहं निखिलोर्वीसार्बभौमवचनव्यपदेशात् । सौहृदातिशयतः स्फुटबन्धोर्बोधनाय नयशालिवचोभिः ॥ ३ ॥ समस्त भूमंडल के सार्वभौम अकबर के आदेश के कारण मैं स्वयं यहाँ आया हूँ। आप मेरे बन्धु
१९८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नर्मदाश्रयविशेषपवित्रा ये भवन्ति विषया वसुपूर्णाः । जाह्नवीविमलवेणिविचित्रा पार्वतीपरिवृढस्य पुरी च ॥ ७ ॥ वासरेशसुतयाऽधिकशोभं मण्डलं च निखिलं मथुरायाः । गृह्यतां नियमतश्चिरकालं यद्यदिच्छसि परं च सुराज्यम् ॥ ८ ॥ एकमेव नृपते ! रणपूर्वस्तम्भदुर्गमिदमर्पय तस्मै । एवमेव हि शके शितुरस्य प्रीतियतिमती भवति स्यात् ॥ ९ ॥ नर्मदा के आश्रय के कारण विशेष रूप से पवित्र और धनधान्य से पूर्ण प्रदेश तथा पार्वतीपति भगवान् शिव की भागीरथी के निर्मल प्रवाह से पवित्र पुरी काशी एवं सूर्यसुता यमुना के कारण अधिक सुन्दर मथुरा का सम्पूर्ण मंडल तथा अन्य जो भी सुन्दर राज्य आप लेना चाहें वह सब आप नियमपूर्वक चिरकाल के लिये ग्रहण कीजिये, और राजन् ! केवल एक यह रणस्तम्भपुर का दुर्ग अकबर को समर्पण कीजिये । ऐसा करने पर ही यवन सम्राट् का प्रेम आपके प्रति विशाल होगा ॥७-९॥ कुर्वते समयतः खलु सन्धि बिभ्रतोऽपि बहलोज्ज्वलतेजः । वीतिहोत्रहरितोऽङ्कमुपास्ते शीतकालमधि घर्ममयूखः ॥१०॥ विशाल और उज्ज्वल तेजस्वी पुरुष भी समय देख [कर सन्धि करते] हैं; सूर्य भी शीतकाल में अग्नि की दिशा (आग्नेय कोण) की गोद में शरण [लेता है ॥१०॥] हीनशक्तिविभवेऽपि जयः स्यात् कुत्रचिद् [घूणाक्षर]कल्पः । तं विलोक्य न तु नीतिविरुद्धं बुद्धिमान् व्यवसितुं विदधीत ॥११॥ यदि शक्ति और वैभव रहित पुरुष को कहीं घूणाक्षरन्याय से विजय प्राप्त हो [भी] जाय, तो उसे देख कर बुद्धिमान् पुरुष को नीतिविरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिये ॥११॥ ये स्वतोऽधिकबलेषु न कुर्युः सन्धिमन्धितधियो गुरुगर्वात् । स्रोतसीव पतिताः प्रतिकूले ते व्रजन्ति न कदाचन पारम् ॥१२॥ जो लोग भारी अभिमान के कारण अन्धी बुद्धि वाले बन कर अपने से अधिक [बल]वान् शत्रु से सन्धि नहीं करते वे, प्रतिकूल प्रवाह में पड़े हुये प्राणियों के समान, क[भी पार] नहीं जा सकते ॥१२॥ म्लानतामयति यत्र न कीर्तिर्भूयसी क्षतिरुदेति न यस्मात् । तं बलीयसि विरोधिनि सन्धिं कुर्वतः क इव तेऽत्र विमर्शः ॥१३॥ जिसके कारण भारी हानि का उदय न हो और जिसके कारण कीर्ति भी मलिन न हो ऐसी सन्धि यदि बलवान् शत्रु के साथ हो सके तो इसे करने में आपके लिये इतने सोच-विचार की क्या आवश्यकता है ? ॥१३॥ (१०) वीतिहोत्रस्याग्नेः हरित आग्नेयकोणस्येत्यर्थः ।
अष्टादशः सर्गः १९९ सर्वथाऽधिकबलैः प्रतिपक्षै विग्रहे ग्रहिलतान्न हि गच्छेत् । कः प्रतीपतरचण्डसमीरं शर्म लिप्सुरभियाति रयेण ॥१५४॥ अपने से सब प्रकार अधिक बलशाली शत्रु से युद्ध करने के लिये दुराग्रह नहीं करना चाहिये । अपना कल्याण चाहने वाला कौन पुरुष अत्यन्त प्रचण्ड वायु के सामने वेग से दौड़ेगा ? ॥१५४॥ दुर्गमेकमुपनीय नृपास्मै गृह्यते यदि पुरत्रयमस्मात् । ईदृशा विनिमयेन बभूव प्रत्युताधिकतरस्तव लाभः ॥१५५॥ राजन् ! यदि आप इनको एक दुर्ग देकर इनसे तीन नगर ले लें, तो इस विनिमय से उलटे आपको ही अधिक लाभ है ॥१५५॥ ग्रन्थित्वमपदे किमु कुर्वन् खेदयस्यधिबलं यवनेशम् । किन्नु कर्णपदवीन्न गतस्ते जैत्रसिंहतनयस्य विपाकः ॥१५६॥ अस्थान में दुराग्रह करके आप सेना के साथ यवन सम्राट् को व्यर्थ में क्यों कष्ट दे रहे हैं ? क्या जैत्रसिंह के पुत्र हम्मीरदेव का परिणाम आपने नहीं सुना ? ॥१५६॥ वारिकाननमही...स्त्वग्रहीत् तदधिपान् स निगृह्य । शिष्यते परमि... तत्र यततेऽद्भुततेजाः ॥१५७॥ सम्राट् ने जल, वन अ... उनके स्वामियों को बन्दी बनाकर, जीत लिया है; केवल यह आप ही का दुर्ग म... इसलिये अद्भुत तेजस्वी सम्राट् इसको लेने का यत्न कर रहे हैं ॥१५७॥ ...क्ता प्रबलवैरिन्ृपालैः सद्गुणैश्च भवता धरणीयम् । ...वितरणाम्बुनदीभिः कीर्तिभिश्च भुवनं विशदाभिः ॥१५८॥ अ... इस पृथ्वी को प्रबल शत्रुओं के रुधिर से रक्त और अपने उत्तम गुणों से अनुरक्त बना र... है; आपने... विश्व को अपने दान जल की विस्तृत नदियों से पूर्ण और अपनी स्वच्छ... से... कर दिया है ॥१५८॥ ...तरमिहास्ति विधेयं शस्त्रचापतपसां नृपतीनाम् । पुण्यवानसि विनैव हि यत्नं सर्वमेव समपद्यत तत् ते ॥१५९॥ शस्त्र और धनुष-रूपी तप वाले राजाओं के लिये इसके बाद जो कर्तव्य शेष रह जाता है, वह बिना यत्न ही आपको मिल रहा है, अतः आप बड़े पुण्यात्मा हैं ॥१५९॥ नर्मदान्वयजशर्मदतोयां नर्मदां नियमवानवगाह्य । वीतशङ्कमधुना मधुरास्ताः पश्य पावनभुवो मधुरायाः ॥१२०॥ नर्मद के कुल के लोगों के लिये जिसका जल कल्याणकारक है ऐसी नर्मदा में नियमपूर्वक स्नान करके अब निःशंक होकर आप मथुरा की मधुर और पवित्र भूमि के दर्शन करें ॥१२०॥
२०० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्योतिरुज्जवलतरां यतयो यां शीलयन्ति सततं यतचित्ताः । अन्तरिक्षनगरीं गणभर्तुस्तां विलोक्य भवितासि कृतार्थः ॥२१॥ यति लोग यतचित्त होकर जिस अत्यन्त उज्ज्वल ज्योतिर्मयी भगवान् शिव की अन्तरिक्ष नगरी काशी का सदा सेवन किया करते हैं उसके दर्शन करके आप अपने आपको कृतार्थ कीजिये ॥२१॥ सोपपत्तिकमथाधिकपथ्यं भाषितं चिरममुष्य विचार्य । पुण्यतीर्थगमनाय मनीषी सोऽन्ववर्तत मनः शकभर्तुः ॥२२॥ मानसिंह के युक्तियुक्त और अत्यन्त हितकारी वचनों पर बहुत देर तक विचार करके, पुण्य तीर्थों में जाने के इच्छुक राव सुर्जन ने अकबर के मनोनुकूल कार्य कर दिया ॥२२॥ तं विसृज्य विषयं वशिवर्यस्त्वर्यमाण इव तीर्थविनोदैः । अन्वितः पुरजनैरनुरागान्निर्जगाम नगरान्नरनाथः ॥२३॥ संयमी पुरुषों में श्रेष्ठ राव सुर्जन उस प्रदेश को छोड़कर तीर्थों में जाने के लिये जल्दी करते हुये, प्रेम के कारण नागरिकों के साथ, नगर से चल दिये ॥२३॥ वासरैः कतिपयैः पतिरुर्व्याः सोऽथ वर्त्म वि...विलङ्घ्य । नर्मदामृदुसमीरसनाथं सन्निवेशमक... ॥२४॥ राजा सुर्जन ने कुछ दिनों में उस विस्तृत मार्ग ... के कोमल पवन से युक्त स्थान में अपनी सेना का शिविर बनाया ॥२४॥ नीत्वा स कत्यपि समा भुवि नर्मदायास्तद्वासिनो जनपदान् वशगान् कृत्वा । पुण्यामपूर्णसुकृतैर्मनुजैर्दुरापां प्राप प्रियां मधुपुरीं श्वसद... ॥२५॥ नर्मदा की भूमि में कुछ वर्ष रहकर और वहाँ के निवासी नागरिकों को व... के राव सुर्जन, अल्प पुण्य वाले पुरुषों के लिये दुष्प्राप्य तथा भगवान् कृष्ण की प्रिय, पुण्य...थुरा पहुँचे ॥२५॥ कालिन्दीपुलिनमथो विगाहमानं गोपालः स्वकुलपुरस्कृ... पुरोधाः । व्यासस्तं वशिनमुदाहरत् प्रमोदादुन्मीलन्मधुपुरमाधुरी... ॥२६॥ अपने कुटुम्बियों के साथ यमुना के तट का सेवन करने वाले, मथुरा पुरी के विक... सौन्दर्य में निमग्न, संयमी राव सुर्जन से उनके पुरोहित गोपाल व्यास ने प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार मथुरा का वर्णन किया ॥२६॥ रक्तोत्पलैरभिनवैरभितः स्फुरद्भिः स्फीतेन्द्रनीलमणिमेदुरमुग्धवेणिः । आभाति पातकतरुक्षतजाक्तधारा धर्मस्य खड्गलतिकेव कलिन्दकन्या ॥२७॥ किनारे-किनारे विकसित नवीन लाल कमलों के कारण उज्ज्वल नीलम के समान सुन्दर प्रवाह वाली यमुना, पापों के समूहों को मारने के कारण उनके रुधिर से सनी हुई धार वाली धर्म (यमराज) की तलवार के समान सुशोभित हो रही है ॥२७॥ ०