सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशः सर्गः १६७ शोणैः करैः संक्रमयन् मनोगतं पतङ्गकान्तेष्वनलं रथाङ्गयोः । सौभाग्यलक्ष्मीं गलहस्तयन् पुरः कुमुद्वतीनामुदगान् मरीचिमान् ॥ ७ ॥ चकवा-चकवी की विरहाग्नि को अपने लाल करों से सूर्यकान्त मणियों में सरकाते हुये और कुमुदिनी की सौभाग्यलक्ष्मी को गर्दन पकड़ कर बाहर निकालते हुये, भगवान् सूर्य उदित हुये ॥७॥ वातायनेभ्यः पतिता नभोमणेर्मरीचयो गैरकरागरोचिषः । मर्माण्यभिन्दन् नितरां भुजान्तराद् विमोचयन्तो दयितान् नतभ्रुवाम् ॥८॥ सूर्य की खिड़कियों की जालियों में से आनेवाली गेरू के समान लाल किरणों ने कामिनियों के बाहुपाश से प्रियतमों को छुड़ा कर उन्हें मर्मान्तिक कष्ट दिया ॥ ८ ॥ पद्माकराणां विरलाः शनैः शनैस्तरङ्गलेखा गणयन्निवोदिताः । सौरभ्यसारं सरसीरुहां हरन् समीरणः सञ्चरति स्म मन्थरम् ॥ ९ ॥ [L1