सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
DevanagariHindipublished256 पृष्ठ
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पञ्चदशः सर्गः नाथः कलानामथ कालयन्त्रितां विभावरीं यानमुखीं विभावयन् । छायाव्यपायाद् वहति स्म धूसरं वियोगिनारीवदनोपमं वपुः ॥ १ ॥ काल से नियमित रात्रि को जाते हुये देख कर कान्तिहीन चन्द्रमा ने विरहिणी स्त्री के मुख के समान पीला शरीर धारण किया ॥ १ ॥
- यो वर्धयत्यम्बुनिधीन् दिवौकसां बिभर्ति कुक्षिं वपुषो व्ययेन यः । जीवातुराद्योऽस्य जगत्त्रयस्य यः स दुर्दशाया दशनान्तरं गतः ॥ २ ॥ जो समुद्रों के हृदयों को उछालता है, जो अपने शरीर तक को अर्पण करके देवताओं का पेट भरता है (देवगण चन्द्रमा की अमृतमयी कलाओं का उपभोग करते हैं) और जो तीनों लोकों के लिये जीवनौषधि है, वह चन्द्रमा भी दुर्भाग्य के मुंह में चला गया ! ॥ २ ॥ पीतारुणेनाक्षिगतेन कौमुदी जगाम लक्ष्मीर्मुदिताब्जकाननम् । कुत्रापि याता प्रथमं निशीथिनी कलङ्कशेषः पतितः कलाधिपः ॥ ३ ॥ लाल अरुण (सूर्य-सारथि) के उदित होने पर प्रसन्न कुमुद-लक्ष्मी कमलों के समूह में चली गई; रात्रि तो पहले ही कहीं चली गई थी। अतः अकेला चन्द्रमा भी, जिसका (कान्तिहीन होने के कारण और अपनी स्त्रियों के अन्यत्र भाग जाने के कारण) केवल कलंक ही शेष रह गया था, अस्त हो गया ॥ ३ ॥ दोषाः परं वृद्धिमयन्ति सन्ततं गुणास्तु मुञ्चन्ति विपत्सु पूरुषम् । कान्त्या विहीनस्य विधोः पतिष्यतः कलङ्क एवोद्भटतां जगाम यत् ॥ ४ ॥ विपत्ति में पुरुष के दोष बढ़ जाते हैं और गुण उसे छोड़ जाते हैं; अस्त होने वाले कान्तिहीन चन्द्रमा का कलंक ही बढ़ता गया ॥ ४ ॥ उद्यन्ननूरुर्मुखरञ्जनं पुरा दिशो विधाय क्षणमङ्गरागजाम् । लक्ष्मीं समग्रां निदधे निरत्ययामुदञ्चिताङ्गीषु सरोजराजिषु ॥ ५ ॥ उदय होने वाले अरुण ने पूर्वदिशा का शृङ्गार करने के लिये उसके मुख पर लाल उबटन लगाया और बचे-खुचे लाल उबटन की सारी शोभा को विकसित अंगों वाली कमलपंक्तियों पर फेंक दिया ॥ ५ ॥ कामं कलाभिः परिपूर्णमण्डलो धुनोतु धाम्ना तिमिराणि चन्द्रमाः । धाम्नां निधेरग्रसरेऽपि यद् बलं तमोनिरासे न भवेत् तदन्यतः ॥ ६ ॥ भले ही पूर्णविम्ब वाला चन्द्रमा अपनी सारी कलाओं के प्रकाश से अन्धकार को नष्ट करे, किन्तु अन्धकार को नष्ट करने की जो शक्ति सूर्य के सारथी में भी है वह अन्यत्र नहीं है ॥ ६ ॥