सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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चतुर्दशः सर्गः १६५ चिरनिर्गतास्वपि सखीषु मन्दिरात् मदिरेक्षणा क्षणमवाङ्मुखी स्थिता । भृशमाचकाङ्क्ष शयनाधिरोहणे दयितेन पाणितलकर्षणं बलात् ॥९१॥ रतिगृह से सखियों के चले जाने के बाद भी बहुत देर तक मादकनयनी प्रिया नीचा मुख किये खड़ी रही क्योंकि उसकी प्रबल इच्छा थी कि प्रियतम ही उसका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक शय्या पर खींच लें ॥९१॥ नवसौहृदस्य परिपालनोत्सुका चकिता पुरः प्रणयभङ्गवैशसात् । उररीचकार निजखेदमप्यसौ हृदयेश्वरस्य हृदयानुवृत्तये ॥९२॥ नवीन प्रणय का उत्सुकता से पालन करने की इच्छा के कारण प्रेम के भंग के भय से घबरा कर प्रिया ने, हृदयेश्वर के मनोनुकूल कार्य करने के लिये कुछ कष्ट पाना भी स्वीकार कर लिया ॥९२॥ इति निर्विशन् विषयसम्भवं सुखं प्रमनाः समं वसुमतीशकन्यया । दिवसानि वंशबहुलानि वासिनां कतिचित् ततान सुकृतो सकौतुकम् ॥९३॥ इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक पुण्यात्मा राजा सुर्जन ने राजकुमारी कनकावती के साथ विषय सुख भोगते हुये, अपने बड़े वंश वाले ससुराल के लोगों में मिल कर कुछ दिन कुतूहलवश व्यतीत किये ॥९३॥ जिगमिषुः स्वपुरं स पुरस्कृतः सुकृतिनां नृपतिः सह भार्यया । अनुमतिं मतिमान् सुखमग्रहीद् विनयतो जगमालमहीपतेः ॥९४॥ पुण्यशील पुरुषों में अग्रगण्य राजा सुर्जन ने धर्मपत्नी के साथ अपनी नगरी में लौट जाने के लिये, विनय के कारण आसानी से, राजा जगमाल की स्वीकृति प्राप्त कर ली ॥९४॥ प्रतिष्ठासुः प्रातर्निजनगरमागामिनि दिने समेतः सम्बन्धव्यतिकरितमैत्रीमधुरितैः । कथानामाभोगैः प्रणयविनयोद्रेकपिशुनै- रनैषीदासीनः क्षणमिव निशां तां नरपतिः ॥९५॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अपनी नगरी की ओर प्रस्थान करने वाले राव सुर्जन ने, विवाह सम्बन्ध और मित्रता दोनों के मेल से मधुर लोगों के साथ बैठ कर प्रेम और विनय के उत्कर्ष को सूचित करने वाली कथाओं के विस्तार से उस रात्रि को पल के समान व्यतीत कर दिया ॥९५॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्दशः सर्गः
(९३) वासिनां तत्रत्यानां जनानां येषु बहुलानि वंशानि कुलानि संमिलन्ति स्म तादृशानि दिवसानि । (९५) सम्बन्धेन विवाहसम्बन्धेन व्यतिकरिता समृद्धा मैत्री तया मधुरितैः मनोहरैः ।