भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१६४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शनकैर्विधृत्य करपल्लवं मुहुः सुतनोर्विधूनयति कौतुकात् प्रिये । निजकङ्कणक्वणितभाजि सा त्रपाचकितं दधे प्रतिगवाक्षमक्षिणी ॥८४॥ जब प्रियतम ने धीरे से प्रिया का कोमल हाथ पकड़ कर कुतूहलवश उसे हिलाया, तब अपने कंकणों की ध्वनि के कारण लज्जा से चकित होकर प्रिया झरोखे की ओर झाँकने लगी ॥८४॥ उपचीयमानविभवेन सन्ततं निबिडानुरागरुचिरेण सुभ्रुवः । अतिशयितां शिथिलयन्त्यथ त्रपा मदनेन सन्धिविधिमैहत स्वयम् ॥८५॥ निरन्तर बढ़ने वाले वैभव से युक्त तथा गहरे प्रेम के कारण सुन्दर कामदेव के साथ सुन्दर भौंहों वाली नायिका की लज्जा ने, अपने आधिक्य को ढीला करके, स्वयं सन्धि करना चाहा ॥८५॥ परिचुम्बनेच्छुरलमावृणोन्मुखं परिरिप्सुरङ्गमधिकं जुगूह सा । नियतं च नेतिपदमोरितं तया सुचिरं रहःसु विधिवाचकं प्रिये ॥८६॥ यद्यपि प्रिया स्वयं चुम्बन करना चाहती थी, तो भी चुम्बन के समय वह अपने मुख को काफी छिपा लेती थी ; यद्यपि उसकी इच्छा स्वयं आलिंगन करने की थी, तो भी आलिंगन के समय वह अपने शरीर को अधिक सिकोड़ लेती थी ; और एकान्त में प्रिय के प्रति बहुत देर तक वह निषेधात्मक पद (न कार) का उच्चारण करती थी, यद्यपि वह निषेध निश्चय ही विधि- वाचक (स्वीकृति सूचक) था ॥८६॥ उपगूहनानि चकिता नखक्षतादपि चुम्बनानि रदना॑र्पितव्रणात् ॥ स्फुरितस्पृहाऽपि दयितस्य सङ्गमे न तदाऽन्वमोदत नवोढकामिनी ॥८७॥ प्रिय के समागम के समय वह नवोढा वधू, अपनी इच्छा होने पर भी, नखक्षत के भय से आलिंगन का और दन्तक्षत के भय से चुम्बन का अनुमोदन नहीं कर सकी ॥८७॥ नवसौहृदं मृदुनयेन पालयन् मदनोपदेशमपि नातिलङ्घयन् । कियतीभिरेव रजनीभिरर्जुनिः सुतनोः स विश्वसितपात्रतां ययौ ॥८९॥ कोमलता की नीति से नये प्रेम की पालना करते हुये और कामदेव के उपदेश का भी अधिक उल्लंघन न करते हुये वे अर्जुन-पुत्र सुर्जन, कुछ रातों में ही, प्रिया के विश्वासपत्र बन गये ॥८८॥ उपनाभि चञ्चलकरे नरेश्वरे प्रतिषेधवाचकमसर्वमीरितम् । मदनस्य मङ्गलऋचस्तदाऽभवत् प्रणवो नवोढहरिणीदृशो वचः ॥८९॥ प्रियतम के नाभि के समीप चंचल हाथ बढ़ाने पर नवोढा प्रिया ने जिस निषेधात्मक पद (ऊँ ऊँ ऊँ) का अपूर्ण उच्चारण किया, वह उस समय कामदेव की मंगल ऋचाओं (मंत्रों) के प्रणव अर्थात् ओंकार (ऊँ) के समान सुशोभित हुआ ॥८९॥ न चकार चुम्बनविधौ विरोधितां न जुगूह देहमुपगूहनेष्वपि । उपनीविसञ्चरणचञ्चलं वधूः करपल्लवं रतिगुरोरवारयत् ॥९०॥ अब प्रिया चुम्बन का विरोध नहीं करती थी और न आलिंगन के समय अपने शरीर को सिकोड़ती थी ; अब वह रतिकलाप्रवीण पति के अपनी नाभि के पास चंचल हाथ को ही हटाती थी ॥९०॥