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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

१६४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शनकैर्विधृत्य करपल्लवं मुहुः सुतनोर्विधूनयति कौतुकात् प्रिये । निजकङ्कणक्वणितभाजि सा त्रपाचकितं दधे प्रतिगवाक्षमक्षिणी ॥८४॥ जब प्रियतम ने धीरे से प्रिया का कोमल हाथ पकड़ कर कुतूहलवश उसे हिलाया, तब अपने कंकणों की ध्वनि के कारण लज्जा से चकित होकर प्रिया झरोखे की ओर झाँकने लगी ॥८४॥ उपचीयमानविभवेन सन्ततं निबिडानुरागरुचिरेण सुभ्रुवः । अतिशयितां शिथिलयन्त्यथ त्रपा मदनेन सन्धिविधिमैहत स्वयम् ॥८५॥ निरन्तर बढ़ने वाले वैभव से युक्त तथा गहरे प्रेम के कारण सुन्दर कामदेव के साथ सुन्दर भौंहों वाली नायिका की लज्जा ने, अपने आधिक्य को ढीला करके, स्वयं सन्धि करना चाहा ॥८५॥ परिचुम्बनेच्छुरलमावृणोन्मुखं परिरिप्सुरङ्गमधिकं जुगूह सा । नियतं च नेतिपदमोरितं तया सुचिरं रहःसु विधिवाचकं प्रिये ॥८६॥ यद्यपि प्रिया स्वयं चुम्बन करना चाहती थी, तो भी चुम्बन के समय वह अपने मुख को काफी छिपा लेती थी ; यद्यपि उसकी इच्छा स्वयं आलिंगन करने की थी, तो भी आलिंगन के समय वह अपने शरीर को अधिक सिकोड़ लेती थी ; और एकान्त में प्रिय के प्रति बहुत देर तक वह निषेधात्मक पद (न कार) का उच्चारण करती थी, यद्यपि वह निषेध निश्चय ही विधि- वाचक (स्वीकृति सूचक) था ॥८६॥ उपगूहनानि चकिता नखक्षतादपि चुम्बनानि रदना॑र्पितव्रणात् ॥ स्फुरितस्पृहाऽपि दयितस्य सङ्गमे न तदाऽन्वमोदत नवोढकामिनी ॥८७॥ प्रिय के समागम के समय वह नवोढा वधू, अपनी इच्छा होने पर भी, नखक्षत के भय से आलिंगन का और दन्तक्षत के भय से चुम्बन का अनुमोदन नहीं कर सकी ॥८७॥ नवसौहृदं मृदुनयेन पालयन् मदनोपदेशमपि नातिलङ्घयन् । कियतीभिरेव रजनीभिरर्जुनिः सुतनोः स विश्वसितपात्रतां ययौ ॥८९॥ कोमलता की नीति से नये प्रेम की पालना करते हुये और कामदेव के उपदेश का भी अधिक उल्लंघन न करते हुये वे अर्जुन-पुत्र सुर्जन, कुछ रातों में ही, प्रिया के विश्वासपत्र बन गये ॥८८॥ उपनाभि चञ्चलकरे नरेश्वरे प्रतिषेधवाचकमसर्वमीरितम् । मदनस्य मङ्गलऋचस्तदाऽभवत् प्रणवो नवोढहरिणीदृशो वचः ॥८९॥ प्रियतम के नाभि के समीप चंचल हाथ बढ़ाने पर नवोढा प्रिया ने जिस निषेधात्मक पद (ऊँ ऊँ ऊँ) का अपूर्ण उच्चारण किया, वह उस समय कामदेव की मंगल ऋचाओं (मंत्रों) के प्रणव अर्थात् ओंकार (ऊँ) के समान सुशोभित हुआ ॥८९॥ न चकार चुम्बनविधौ विरोधितां न जुगूह देहमुपगूहनेष्वपि । उपनीविसञ्चरणचञ्चलं वधूः करपल्लवं रतिगुरोरवारयत् ॥९०॥ अब प्रिया चुम्बन का विरोध नहीं करती थी और न आलिंगन के समय अपने शरीर को सिकोड़ती थी ; अब वह रतिकलाप्रवीण पति के अपनी नाभि के पास चंचल हाथ को ही हटाती थी ॥९०॥

चतुर्दशः सर्गः १६५ चिरनिर्गतास्वपि सखीषु मन्दिरात् मदिरेक्षणा क्षणमवाङ्मुखी स्थिता । भृशमाचकाङ्क्ष शयनाधिरोहणे दयितेन पाणितलकर्षणं बलात् ॥९१॥ रतिगृह से सखियों के चले जाने के बाद भी बहुत देर तक मादकनयनी प्रिया नीचा मुख किये खड़ी रही क्योंकि उसकी प्रबल इच्छा थी कि प्रियतम ही उसका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक शय्या पर खींच लें ॥९१॥ नवसौहृदस्य परिपालनोत्सुका चकिता पुरः प्रणयभङ्गवैशसात् । उररीचकार निजखेदमप्यसौ हृदयेश्वरस्य हृदयानुवृत्तये ॥९२॥ नवीन प्रणय का उत्सुकता से पालन करने की इच्छा के कारण प्रेम के भंग के भय से घबरा कर प्रिया ने, हृदयेश्वर के मनोनुकूल कार्य करने के लिये कुछ कष्ट पाना भी स्वीकार कर लिया ॥९२॥ इति निर्विशन् विषयसम्भवं सुखं प्रमनाः समं वसुमतीशकन्यया । दिवसानि वंशबहुलानि वासिनां कतिचित् ततान सुकृतो सकौतुकम् ॥९३॥ इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक पुण्यात्मा राजा सुर्जन ने राजकुमारी कनकावती के साथ विषय सुख भोगते हुये, अपने बड़े वंश वाले ससुराल के लोगों में मिल कर कुछ दिन कुतूहलवश व्यतीत किये ॥९३॥ जिगमिषुः स्वपुरं स पुरस्कृतः सुकृतिनां नृपतिः सह भार्यया । अनुमतिं मतिमान् सुखमग्रहीद् विनयतो जगमालमहीपतेः ॥९४॥ पुण्यशील पुरुषों में अग्रगण्य राजा सुर्जन ने धर्मपत्नी के साथ अपनी नगरी में लौट जाने के लिये, विनय के कारण आसानी से, राजा जगमाल की स्वीकृति प्राप्त कर ली ॥९४॥ प्रतिष्ठासुः प्रातर्निजनगरमागामिनि दिने समेतः सम्बन्धव्यतिकरितमैत्रीमधुरितैः । कथानामाभोगैः प्रणयविनयोद्रेकपिशुनै- रनैषीदासीनः क्षणमिव निशां तां नरपतिः ॥९५॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अपनी नगरी की ओर प्रस्थान करने वाले राव सुर्जन ने, विवाह सम्बन्ध और मित्रता दोनों के मेल से मधुर लोगों के साथ बैठ कर प्रेम और विनय के उत्कर्ष को सूचित करने वाली कथाओं के विस्तार से उस रात्रि को पल के समान व्यतीत कर दिया ॥९५॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्दशः सर्गः

(९३) वासिनां तत्रत्यानां जनानां येषु बहुलानि वंशानि कुलानि संमिलन्ति स्म तादृशानि दिवसानि । (९५) सम्बन्धेन विवाहसम्बन्धेन व्यतिकरिता समृद्धा मैत्री तया मधुरितैः मनोहरैः ।

पञ्चदशः सर्गः नाथः कलानामथ कालयन्त्रितां विभावरीं यानमुखीं विभावयन् । छायाव्यपायाद् वहति स्म धूसरं वियोगिनारीवदनोपमं वपुः ॥ १ ॥ काल से नियमित रात्रि को जाते हुये देख कर कान्तिहीन चन्द्रमा ने विरहिणी स्त्री के मुख के समान पीला शरीर धारण किया ॥ १ ॥

  • यो वर्धयत्यम्बुनिधीन् दिवौकसां बिभर्ति कुक्षिं वपुषो व्ययेन यः । जीवातुराद्योऽस्य जगत्त्रयस्य यः स दुर्दशाया दशनान्तरं गतः ॥ २ ॥ जो समुद्रों के हृदयों को उछालता है, जो अपने शरीर तक को अर्पण करके देवताओं का पेट भरता है (देवगण चन्द्रमा की अमृतमयी कलाओं का उपभोग करते हैं) और जो तीनों लोकों के लिये जीवनौषधि है, वह चन्द्रमा भी दुर्भाग्य के मुंह में चला गया ! ॥ २ ॥ पीतारुणेनाक्षिगतेन कौमुदी जगाम लक्ष्मीर्मुदिताब्जकाननम् । कुत्रापि याता प्रथमं निशीथिनी कलङ्कशेषः पतितः कलाधिपः ॥ ३ ॥ लाल अरुण (सूर्य-सारथि) के उदित होने पर प्रसन्न कुमुद-लक्ष्मी कमलों के समूह में चली गई; रात्रि तो पहले ही कहीं चली गई थी। अतः अकेला चन्द्रमा भी, जिसका (कान्तिहीन होने के कारण और अपनी स्त्रियों के अन्यत्र भाग जाने के कारण) केवल कलंक ही शेष रह गया था, अस्त हो गया ॥ ३ ॥ दोषाः परं वृद्धिमयन्ति सन्ततं गुणास्तु मुञ्चन्ति विपत्सु पूरुषम् । कान्त्या विहीनस्य विधोः पतिष्यतः कलङ्क एवोद्भटतां जगाम यत् ॥ ४ ॥ विपत्ति में पुरुष के दोष बढ़ जाते हैं और गुण उसे छोड़ जाते हैं; अस्त होने वाले कान्तिहीन चन्द्रमा का कलंक ही बढ़ता गया ॥ ४ ॥ उद्यन्ननूरुर्मुखरञ्जनं पुरा दिशो विधाय क्षणमङ्गरागजाम् । लक्ष्मीं समग्रां निदधे निरत्ययामुदञ्चिताङ्गीषु सरोजराजिषु ॥ ५ ॥ उदय होने वाले अरुण ने पूर्वदिशा का शृङ्गार करने के लिये उसके मुख पर लाल उबटन लगाया और बचे-खुचे लाल उबटन की सारी शोभा को विकसित अंगों वाली कमलपंक्तियों पर फेंक दिया ॥ ५ ॥ कामं कलाभिः परिपूर्णमण्डलो धुनोतु धाम्ना तिमिराणि चन्द्रमाः । धाम्नां निधेरग्रसरेऽपि यद् बलं तमोनिरासे न भवेत् तदन्यतः ॥ ६ ॥ भले ही पूर्णविम्ब वाला चन्द्रमा अपनी सारी कलाओं के प्रकाश से अन्धकार को नष्ट करे, किन्तु अन्धकार को नष्ट करने की जो शक्ति सूर्य के सारथी में भी है वह अन्यत्र नहीं है ॥ ६ ॥

पञ्चदशः सर्गः १६७ शोणैः करैः संक्रमयन् मनोगतं पतङ्गकान्तेष्वनलं रथाङ्गयोः । सौभाग्यलक्ष्मीं गलहस्तयन् पुरः कुमुद्वतीनामुदगान् मरीचिमान् ॥ ७ ॥ चकवा-चकवी की विरहाग्नि को अपने लाल करों से सूर्यकान्त मणियों में सरकाते हुये और कुमुदिनी की सौभाग्यलक्ष्मी को गर्दन पकड़ कर बाहर निकालते हुये, भगवान् सूर्य उदित हुये ॥७॥ वातायनेभ्यः पतिता नभोमणेर्मरीचयो गैरकरागरोचिषः । मर्माण्यभिन्दन् नितरां भुजान्तराद् विमोचयन्तो दयितान् नतभ्रुवाम् ॥८॥ सूर्य की खिड़कियों की जालियों में से आनेवाली गेरू के समान लाल किरणों ने कामिनियों के बाहुपाश से प्रियतमों को छुड़ा कर उन्हें मर्मान्तिक कष्ट दिया ॥ ८ ॥ पद्माकराणां विरलाः शनैः शनैस्तरङ्गलेखा गणयन्निवोदिताः । सौरभ्यसारं सरसीरुहां हरन् समीरणः सञ्चरति स्म मन्थरम् ॥ ९ ॥ [L1

१६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नवोढवध्वा नमदाननश्रीयो नवीनमापीनकुचप्रसाधनम् । अन्योन्यमक्षिभ्रुवविभ्रमेङ्गितैर्नखक्षतं निर्दिदिशुर्मृगीदृशः ॥१४॥ लज्जा से नतमस्तक नई दुलहिन के सुडौल स्तनों पर नये आभूषण के समान सुशोभित, प्रियतम के नखक्षत को, मृगनयनी सखियों ने एक दूसरी को आँखों ही आँखों के कलापूर्ण इशारों से दिखाया ॥१४॥ इत्थं प्रवृत्ते दिवस्य सम्भ्रमे समाप्य कृत्यं कृतिनां पुरःसरः । देवान् द्विजातीन् मिलितान् गुरून्नपि प्रतिष्ठते स्म प्रयतः प्रणम्य सः ॥१५॥ इस प्रकार प्रातःकाल हो जाने पर कर्मठ-श्रेष्ठ सुर्जन ने, नित्य-कृत्य से निवृत्त होकर, देवताओं को, ब्राह्मणों को और एकत्रित गुरुवर्ग को सविनय सावधानीपूर्वक प्रणाम किया ॥१५॥ भूयिष्ठभूषामपि नव्यभूषणैः प्रसाध्य भूयः कनकावतीं सुताम् । यानोन्मुखीं

२२ पञ्चदशः सर्गः १६९ देवद्विजन्मातिथिदुर्गतान् मुहुः प्रयत्नतः प्रीणय तत्तदर्हणैः । मुक्त्वा मुखम्लानिमनीचमानसा वनीयकेभ्यो वितरोचितं वसु ॥२१॥ देव, ब्राह्मण, अतिथि और विपद्ग्रस्त व्यक्तियों को वार वार प्रयत्न से विविध सेवाओं द्वारा प्रसन्न करना और प्रसन्नमुख तथा विशालहृदय होकर याचकों को उचित धन देना ॥ २१ ॥ शुश्रूषमाणा गुरुवर्गमुद्गतश्रमा यदि स्याः सुकुमारभावतः । निर्वेदखेदं खलु तत्र मा कृथाः कृतार्थतामेव ततोऽवधारय ॥२२॥ यदि गुरुजनों की सेवा करते समय, सुकुमार होने के कारण, तुम थक भी जाओ, तो उससे कष्ट का अनुभव मत करना, किन्तु उस सेवा के कारण अपने आपको धन्य समझना ॥ २२ ॥ आम्रेडनं चेत् कुरुते गुरुः स्वयं प्रसन्नचेताः सुकुमारभाषितैः । भवेस्तदायासभिदे त्वदीशितुः सभाजनार्थं शुभवेशपेशला ॥२३॥ जब गुरुजन तुम्हारी सेवा से प्रसन्नचित्त होकर प्रेमपूर्ण कोमल वचनों से परिश्रम दूर करने के लिये तुमसे दो-तीन बार कहें ('तुम थक गई हो, अब भीतर जाओ' इस प्रकार दो-तीन बार कहें) तब सुन्दर वेश और शृङ्गार से सुसज्जित होकर अपने पति के सत्कार के लिये जाना ॥२३॥ चेष्टाभिरिष्टाभिरुदारभाषितैरकृत्रिमप्रेमपवित्रया धिया । सर्वास्ववस्थास्वपि सर्वतोमुखी विवर्धनीया दयितेऽनुकूलता ॥२४॥ प्रिय कर्मों से, उदार वचनों से और निश्छल प्रेम द्वारा पवित्र मन से, सब अवस्थाओं में सब प्रकार से, पति के प्रति अनुकूलता बढ़ाना ॥ २४ ॥ पत्यौ प्रतीपेऽपि तिरोहितव्यथा हिताय तस्याऽऽहितमानसा भव । विरुद्धभाषिण्यपि तत्र सत्रपा कृपानिदानं वद दैन्यवद् वचः ॥२५॥ पति के प्रतिकूल होने पर भी अपनी व्यथा को छिपा कर सदा उनके हित के लिये मन लगाना और पति के तुम्हारे विरुद्धवचन बोलने पर भी तुम लजीली और दीन बनकर उनको प्रसन्न करने वाले वचन बोलना ॥ २५ ॥ ईर्ष्यातिरेकोत्थवितर्कविभ्रमान् न चानुसन्धेयममुष्यदूषणम् । मा श्रद्दधीथाः श्रुतमप्युपेक्षया प्रतीतमप्यात्मतुदं विदूरय ॥२६॥ ईर्ष्या के आधिक्य से उत्पन्न तर्क-वितर्क के कारण पति के दूषण ढूँढ़ने का प्रयत्न मत करना । यदि उनके दोष सुन भी लो तो भी उनकी उपेक्षा कर देना और उनका विश्वास मत करना एवं यदि तुम स्वयं पति की कष्टदायक प्रतिकूलता का अनुभव करो तो भी उसे भुला देना ॥२६॥ निर्याति नो चेन् मनसस्तदुद्भटं प्रकाशनीयं न च दूषणं प्रिये । लौल्यात् प्रमादादथ चेत् प्रकाशितं निवेशनीयं परिहासभाषिते ॥२७॥ यदि पति का उग्र दोष मन से निकाला न जा सके तो भी उसे कभी पति के सामने प्रकट मत करना और यदि चापल्य से अथवा भूल से उसे प्रकट कर दो तो उसका समावेश हँसी में कर देना ॥ २७ ॥ (२३) आम्रेडनं द्विस्त्रिरुक्तम् ।

१७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् बुद्ध्यां विनिधाय च भर्तुराशयं बिभर्ति येनायमवारितां मुदम् । तेन प्रबन्धेन मनोऽस्य सन्ततं स्वतन्त्रमाराधय वीतमत्सरा ॥२८॥ पति के हृदयगत भावों को सोच-समझकर जिन बातों से उनको अत्यन्त प्रसन्नता मिले उन बातों से, सदा ईर्ष्यारहित होकर, पति के स्वतन्त्र मन को प्रसन्न रखना ॥ २८ ॥ द्रागुद्वहन्तं वनितामथापरामसूयया खेदय माऽवनीपतिम् । भूयिष्ठभार्या हि भवन्ति भूभृतस्त्ववापि तावच्छ्रुतिगोचरं गताः ॥२९॥ यदि तुम्हारे पति शीघ्र किसी अन्य स्त्री से भी विवाह कर लें तो भी ईर्ष्यालु बन कर उन्हें कष्ट मत देना। यह तो तुमने भी सुना ही है कि राजाओं के अनेक रानियाँ होती हैं ॥ २९ ॥ भवन्ति भार्याः शतशो महीभृतां गुणैर्भवत्येकतमा प्रतिष्ठिता । ताराः कलत्राण्यखिलाः कलाभृतो न रोहिणीसाम्यमुपैति काचन ॥३०॥ भले ही राजाओं के अनेक रानियाँ हों, किन्तु गुणों के कारण एक पटरानी ही प्रतिष्ठित होती है; चन्द्रमा के अनेक तारा-रूपी स्त्रियाँ हैं, किन्तु कोई भी रोहिणी की बराबरी नहीं कर सकती ॥ ३० ॥ मर्मस्पृशाप्यन्यगिरा निपीडिता न पीडयेस्तं प्रतिकूलचेष्टितैः । पत्युः प्रसादातिशयेऽपि पुत्रिके! न लङ्घनीयो विनयोचितः क्रमः ॥३१॥ अन्य (सपत्नी) की मर्मस्पर्शी वाणी से पीड़ित होकर भी तुम प्रतिकूल चेष्टाओं से उसे कष्ट मत देना। पुत्रि! पति के अत्यन्त प्रसन्न होने पर भी विनयोचित क्रम का उल्लंघन मत करना ॥ ३१ ॥ एवंविधैस्त्वं पतिदेवताव्रतैर्वितन्वती विश्वजनानुरञ्जनम् । सीमन्तिनीनामुपगम्य मौलितां स्वबान्धवानां मुखमुज्वलीकुरु ॥३२॥ इस प्रकार पतिव्रताधर्मों से तुम सब लोगों को आनन्द देती हुई स्त्रियों में शिरोभूत (श्रेष्ठ) बनकर अपने बन्धुओं का मुंह उजला करना ॥ ३२ ॥ एवं ब्रुवाणा विनयानताननां दृगम्बुपूरैः स्नपयन्त्यशीतलैः । मूर्धन्युपाघ्रायभृशोपगूहतां मुमोच कृच्छ्रेण कृशोदरीं प्रसूः ॥३३॥ विनय से नतमुख कृशोदरी कनकावती को पूर्वोक्त उपदेश देकर अपने गरम आँसुओं की धारा से उसे नहलाती हुई माता ने उसका गाढ़ आलिंगन करके और मस्तक सूंघकर बड़ी कठिनता से उसे छोड़ा ॥ ३३ ॥ मान्यास्तथान्या मिलिताः कुटुम्बिनीः क्रमेण सम्भाव्य पदाभिवन्दनैः । ताभिः कृताशीर्भिरथानुमोदिता नरेन्द्रपुत्रीनरयानमागमत् ॥३४॥ कनकावती ने (माता से विदा लेकर) अन्य एकत्रित सम्मान्य कुटुम्बिनी स्त्रियों को उनके पैर छूकर प्रणाम किया और उनसे शुभाशीर्वाद तथा आज्ञा लेकर वह राजकुमारी पालकी पर चढ़ गई ॥ ३४ ॥

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पञ्चदशः सर्गः १७१ यानान्तरं यातमन्वन्तरं नृपः समेतबन्धुर्गुणसिन्धुरन्वगात् । प्राप्तः पुरं शूरजनोऽपि सम्भृतप्रभूतमङ्गल्यमनोज्ञमण्डनम् ॥३५॥ बन्धुवर्ग से घिरे हुये गुणसमुद्र राव सुर्जन दूसरे यान पर चढ़कर पालकी के साथ-साथ चले और अनेक एकत्रित मांगलिक सुन्दर पदार्थों से सुसज्जित अपनी नगरी में पहुँच गये ॥ ३५ ॥ ऋद्धां समासाद्य पुरीं प्रथीयसा प्रतापजालेन तिरोहिताऽहितः । कालं कियन्तं कनकावतीसखो विहारभूमिं भ्रमति स्म भूपतिः ॥३६॥ प्रबल प्रताप से शत्रुओं को छिपा देने वाले राव सुर्जन अपनी समृद्ध नगरी में आकर कुछ समय तक कनकावती के साथ विहारभूमि में भ्रमण करते रहे ॥ ३६ !! पुंस्कोकिलालापपरिष्कृतिव्रतैः स वीज्यमानो मलयाद्रिमारुतैः । तल्पे नवीनाम्रदलोपकल्पिते निनाय रम्या मधुयामिनीरसौ ॥३७॥ [L12

१७२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भर्तुः प्रभावातिशयेन भूयसीं समश्नुते वृद्धिमसंशयं जनः । तेजोधिकं बिभ्रति वासराधिपे महत्त्वमुच्चैर्यदवाप वासरः ॥४२॥ लोग अपने स्वामी के अत्युत्कृष्ट प्रभाव के कारण भारी वृद्धि प्राप्त करते हैं; यही कारण था कि दिन के स्वामी सूर्य के (ग्रीष्म-ऋतु में) प्रचण्ड तेजस्वी बन जाने पर दिन भी बहुत बड़ा हो गया ॥ ४२ ॥ स्पर्शं खरोष्णं किल सोढुमक्षमा करैः कठोरैः क्वथितं विवस्वतः । आमूलमुत्सर्पि मृणालविग्रहा मुमोच चाल्पेन पयः सरोजिनी ॥४३॥ कोमल मृणाल शरीरवाली और इसीलिये सूर्य के अत्यन्त उष्ण स्पर्श को सहने में असमर्थ कमलिनी ने सूर्य की गरम किरणों से खौलने वाले और जड़ के आसपास ही फैलने वाले थोड़े से पानी को भी छोड़ दिया ॥ ४३ ॥ जग्मुर्युवानो न तथाऽतिनिर्वृतिं सगन्धसारैर्घनसारशीकरैः । स्नानोत्थितप्राणसमास्तनान्तरप्रसक्तिशीतैर्जलबिन्दुभिर्यथा ॥४४॥ युवकों को चन्दन और कपूर के लेप से उतनी शान्ति नहीं मिली जितनी उन्हें स्नान करके निकली हुईं प्रियतमाओं के स्तनों पर लगे हुये जलबिन्दुओं के शीतल स्पर्श से मिली ॥ ४४ ॥ अश्रान्तनिष्यन्दिजलार्द्रकञ्चुकप्रसन्नपीनस्तनकुम्भविभ्रमम् । धारागृहे रागभृतो मृगीदृशां विलोकयन्तो दिवसानयापयन् ॥४५॥ फौव्वारों के नीचे बैठ कर निरन्तर बरसने वाले जल के कारण गीली चोलियों में से स्पष्ट प्रतीत होने वाले मृगनयनियों के सुडौल स्तनों की शोभा को देख-देख कर प्रेमी युवकों ने गरमी के दिन व्यतीत किये ॥ ४५ ॥ पीताः पुरश्चण्डरुचो मरीचिभिर्निसर्गरूक्षैश्च समीरणैस्ततः । निःशेषितापाः सततं विगाहनै र्जलाशयाः कर्दमशेषतां ययुः ॥४६॥ सरोवरों के जल को पहले तो प्रचण्ड सूर्य की किरणों ने पिया, फिर स्वभाव से ही रूखे गरम पवनों ने पिया, फिर बचा-खुचा जल प्राणियों के निरन्तर स्नान करने के कारण समाप्त हो गया और उनमें कीचड़ ही शेष रह गया ॥ ४७ ॥ आरूढहर्म्याणि हिमाम्बुनिःसृतिप्रकामरम्ये मिथुनानि रात्रिषु । शीतांशुकांतोपलकुट्टिमोदरे शिरीषपुष्पास्तरणे स्म शेरते ॥४७॥ गरमी की रातों में पतिपत्नी महलों के ऊपरी भाग में चन्द्रकान्त मणियों से जड़े हुये फर्श पर, जो (चन्द्रोदय के कारण) बहने वाले शीतल जल से अत्यन्त आनन्ददायक बन रहा था, शिरीष पुष्पों का बिस्तर बिछा कर सोते थे ॥ ४७ ॥ (४३) मृणालशरीरा नलिनी आमूलमल्पेनाल्पतया उत्सर्पि विसारि पयोऽपि मुमोच ।

पञ्चदशः सर्गः १७३ पान्थो युवा पाटलपुष्पमुद्गतं मनोभुवो गन्धवहं स्म मन्यते । तन्निर्गता गन्धवहाः सुगन्धयोऽप्यमूर्च्छयन् मानसमस्य यन्मुहुः ॥४८॥ युवक पथिक ने गुलाब के विकसित पुष्प को कामदेव के अभिमान को धारण करने वाला माना क्योंकि उसमें से निकलने वाले (उसका स्पर्श करके आने वाले) सुगन्धित पवनों ने भी उसके मन को बार बार मूच्छित कर दिया ॥४८॥ झङ्कारिणः क्वापि गता मधुव्रताः स्वनप्रसङ्गोऽपि पिकस्य न क्वचित् । धिग् दैवमाम्रस्य फले पचेलिमे शुकस्य काकस्य च तुल्यभागिता ॥४९॥ (वसन्त में) गूँजनेवाले वे भ्रमर (अब ग्रीष्म में) पता नहीं कहाँ चले गये और अब तो कहीं कोयल की कूक भी सुनाई नहीं देती । धिक्कार है उस विधाता को जो आम के पके फल में तोते को और कौवे को बराबर भाग दे रहा है ! ॥४९॥ भ्राम्यन् पिपासुः पथि मारवे मुहुर्मरीचिकावोचिनिरुद्धनिर्गमे । अम्भोविहीने गहने तपोरयैः पपात सिन्धाविव विक्लवोऽध्वगः ॥५०॥ गर्मी के वेग से गहन, जलविहीन, मारवाड़ के रेतीले मार्ग में, जिसमें से मृगमरीचिका की लहरों के कारण निकलने का कोई चारा नहीं था, घूमता हुआ प्यासा पथिक व्याकुल होकर गिर पड़ा, मानों समुद्र में कूद पड़ा हो ॥५०॥ भ्रान्त्वाऽतिदूरं तरुगुल्मसंवृतं मृगः समासाद्य मितं पयः क्वचित् । आवृत्य तस्थौ तृषितोऽपि कातरां शनैश्चलन्तीं प्रतिपालयन् मृगीम् ॥५१॥ बहुत दूर तक इधर-उधर दौड़धूप करने वाले एक हिरण को किसी झाड़ी के नीचे थोड़ा-सा पानी मिल गया । प्यासा होने पर भी वह धीरे-धीरे चलने वाली (प्यास से) व्याकुल मृगी की प्रतीक्षा करते हुये उस जल को ढक कर बैठ गया ॥५१॥ एकस्य पाथोजदलस्य पार्श्वतो निलीय नेतुं तपतीव्रमातपम् । छायामदीर्घामपि सेवितुं समं रथाङ्गयुग्मं यतते स्म मौग्ध्यतः ॥५२॥ एक कमलदल के पास छिप कर, भयंकर गर्मी को बिताने के लिये, चकवा-चकवी का जोड़ा, मूढ़ता के कारण, उसकी छोटी-सी छाया में बराबर बराबर बैठने का यत्न कर रहा था ॥५२॥ कुञ्जोदरे वा तरुकोटरे वा निलीय कुत्रापि विनीय वासरम् । अस्तं गते घर्मघृणौ शनैः शनैः विनिर्ययौ कौशिकवत् पृथग्जनः ॥५३॥ किसी कुञ्ज के भीतर अथवा किसी वृक्ष की कोटर में छिप कर और किसी प्रकार दिन भर बिता कर, ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के अस्त हो जाने पर, तुच्छ पुरुष, उल्लुओं की तरह, धीरे धीरे बाहर निकले ॥५३॥ सूक्ष्मान्तरीये जघने घनस्तनी सहा न वोढुं रशनाकलापकम् । उत्फुल्लमल्लीकुसुमस्त्रजः परं नितम्बशोभां नितरामुपानयत् ॥५४॥ विशाल स्तनवाली कामिनी ने, पतले वस्त्र से शोभित नितम्ब पर करधनी का भार न सह सकने के कारण, विकसित मल्लिका के पुष्पों की माला से ही अपने नितम्ब की शोभा बढ़ाई ॥५४॥ (५३) घर्मघृणौ ग्रीष्मर्तुसूर्ये ।

१७४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स्वेदोदबिन्दुस्तिमितं मृगीदृशो वपुर्वहन्त्यास्तपतापनिःसहम् । गाढं ललाग स्फुटरागि कञ्चुकं स्वत्याजनत्रस्तमिव स्तनद्वये ॥५५॥ ग्रीष्म की गरमी को न सह सकने वाले सुकुमार शरीर वाली मृगनयनी की पसीने की बूंदों से गीली और इसलिये प्रकटित राग (लाली; अनुराग) वाली चोली, उतार कर फेंक दिये जाने के भय से, स्तनों से कस कर चिपक गई ॥५५॥ ग्रीष्मानुरोधादनुभूय भूपतिः स वारिधारा जलयन्त्रनिर्गताः । वारां विहारैश्चकमे निषेचनं विलासिनीनां करयन्त्रधारया ॥५६॥ ग्रीष्म के कारण राजा ने फौव्वारों से निकलने वाली जल की धाराओं का सेवन करके, जल-क्रीड़ा द्वारा करयन्त्र की धारा से कामिनियों को भिगोने की इच्छा की ॥५६॥ हंसान् हसन्त्यो गमनैरथालसैः सखीकरालम्बनलब्धसाहसाः । पेतुः पतङ्गांशुनिपातकातरास्तरङ्गिणीं त्रस्तकुरङ्गलोचनाः ॥५७॥ अपनी मन्द चाल से हंसों की हंसी उड़ाने वाली और भयभीत हिरणों की सी आँखों वाली तथा सूर्य की किरणों के गिरने से व्याकुल स्त्रियों ने, सखियों के हाथों के सहारे के कारण साहस करके, नदी में प्रवेश किया ॥५७॥ आकर्ण्य तारं कलनूपुरध्वनि पुराङ्गनानां पतगाः सितच्छदाः । आपेतुरुत्तानितदीर्घकन्धराः स्वयूथ्यनादभ्रमतः ससम्भ्रमाः ॥५८॥ उन रमणियों के सुन्दर नूपुरों की उच्च ध्वनि को सुनकर, अपने झुण्डों के शब्द के भ्रम से, सफेद पंखों वाले हंस, चकित होकर और अपनी लम्बी गर्दनें तान कर, आये ॥५८॥ सीमन्तिनीनां कलमेखलारवैर्जितस्वराः सारसपत्रिपंक्तयः । द्रागेव जग्मुः सलिलाशयान्तरं पराभवोद्भूतह्रियैव ताडिताः ॥५९॥ रमणियों की रशनाओं के सारसों के स्वरों को जीतने वाले स्वरों से परास्त होकर सारस पक्षियों की पंक्तियाँ मानों पराजय की लज्जा के कारण शीघ्र जलाशय के भीतर घुस गईं ॥५९॥ दूरादहंपूर्विकया समागतास्तटावधि प्रौढकुतूहलेरिताः । तोयावगाहे क्षणजातसम्भ्रमा नतभ्रुवस्तद्विपरीततां दधुः ॥६०॥ अत्यन्त कुतूहल से प्रेरित हुई रमणियाँ दूर से तट तक तो "मैं पहले चलूँ", "मैं पहले चलूँ" इस प्रकार की स्पर्धा से आईं, किन्तु जल में उतरने के समय, क्षण भर चकित होकर, "तुम पहले उतरो", "तुम पहले उतरो" कहने लगीं ॥६०॥ कामं समर्थापि पुरो नितम्बिनी नितम्बदघ्नेम्भसि साध्वसादिव । हस्तावलम्बे दयितस्य सस्पृहा निवर्तितुं सम्बवृते पराङ्मुखी ॥६१॥ नितम्ब तक आने वाले जल में उतरने के लिये समर्थ होने पर भी कोई कामिनी, प्रियतम के हाथ के सहारे को पाने की इच्छा के कारण, मानों भय से विमुख होकर लौटने लगी ॥६१॥

पञ्चदशः सर्गः १७५ कान्तेन सिक्तं प्रथमं पृथुस्तनी विपक्षमालोक्य विवृद्धवेपथुः । शीतातिरेकं प्रतिपाद्य कोपना जवादुदस्थाज्जलवेणिमध्यतः ॥६२॥ प्रियतम ने पहले सपत्नी पर जल छिड़का, यह देखकर किसी विशाल स्तनवाली कामिनी को क्रोध से रोमाञ्च हो गया और वह काफी सर्दी लगने का बहाना बना कर वेग से जल के प्रवाह से बाहर जाने के लिये उठ खड़ी हुई ॥ ६१ ॥ कान्ताभिषेकाय पुरः समुद्यता भुजद्वयाऽऽन्दोलननर्तितस्तनी । दोर्मूललोलेक्षणमेनमुन्मुखी विलोक्य भूयिष्ठमसिञ्चदक्षिणी ॥६३॥ प्रियतम पर दोनों हाथों से जल फेंकने के कारण भुजाओं के हिलने से नाचने वाले स्तनों वाली रमणी ने जब मुँह उठा कर देखा कि प्रियतम तो उसकी भुजाओं के मूल पर दृष्टि जमाये हैं, तो उसने प्रियतम की आँखों पर गहरा पानी फेंकना प्रारम्भ किया ॥ ६३ ॥ लग्नं कुचे केसरमम्बुजन्मनो विदूरयामीति नखक्षतस्पृशम् । सीत्काररुद्धस्मितमाक्षिपत् प्रियं सरोरुहाक्षी कटुसाचिवीक्षणैः ॥६४॥ 'तुम्हारे स्तन पर कमल का केसर लग गया है, इसे हटा देता हूँ'—यह कहकर नखक्षत का स्पर्श करने वाले प्रियतम पर, कमलनयनी ने, जिसकी मुस्कान को सीत्कार ने रोक दिया था, बनावटी क्रोध से टेढ़ी नजर डाली ॥ ६४ ॥ गत्वा कियद्दूरमुदीक्ष्य कौतुकाद् ग्रहीतुकामा कमलानि कामिनी । आलम्बितुं नालमुदग्रनालकं विदूनपाणिः परिगाढकण्टकैः ॥६५॥ कोई कामिनी कुतूहलवश कमलों को देख कर उनको तोड़ने के लिये कुछ दूर तक गई, किन्तु उठे हुये कमल-नाल के घने काँटों से हाथ छिलने के कारण उसे नहीं पकड़ सकी ॥ ६५ ॥ विम्बाधराक्रान्तिवितीर्णवेदनैर्निरुध्यमाना परितो मधुव्रतैः । त्रासादिव स्रस्तदुकूलमाकुला प्रियं सपत्नीपुरतोपि सस्वजे ॥६६॥ बिम्बाधर पर आक्रमण से कष्ट देने वाले भ्रमरों से चारों ओर घिरी हुई कामिनी ने, जिसका दुकूल गिर गया था, भय से घबरा कर सपत्नी के सामने ही प्रिय का आलिंगन कर लिया ॥ ६६ ॥ कस्याश्चिदम्भःस्नपितं नतभ्रुवः क्षणादसंलक्षितसूक्ष्मकञ्चुकम् । वक्षोजयुग्मं द्रुतहेमपूर्णयोर्ववाह कान्तिं किल काचकुम्भयोः ॥६७॥ किसी सुभ्रू के स्तन, जिनकी पतली चोली, कुछ समय के लिये, पानी से भींग जाने के कारण दिखाई नहीं दे रही थी, पिघले हुये सोने से भरे हुये काच के घड़ों के समान लगे ॥ ६७ ॥ दष्टाधरा मुग्धवधूर्मधुव्रतैः प्रियेण साकूतसहासमीक्षिता । तत्कालयोग्यप्रतिपत्तिकातरा विनष्टबाधेव नतानना स्थिता ॥६८॥ किसी मुग्धा को, जिसके अधर को भ्रमरों ने काट लिया था, प्रियतम ने हँस कर साभिप्राय देखा, इसलिये उस समय क्या करना चाहिये यह न सोच सकने के कारण, वह नीचा मुख करके इस प्रकार खड़ी हो गई मानों उसे पीड़ा ही न हो रही हो ॥ ६८ ॥

१७६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धारातिपाताच्चकिता कृशोदरी करेण यावत् पिहिताननेक्षणा । तावत् प्रियः पार्श्वगतां तथापरामसिञ्चदाशुस्मितपूर्वमम्बुभिः ॥६९॥ प्रियतम द्वारा फेंके गये जल की अधिक धाराओं के गिरने से चकित कृशोदरी ने जैसे ही अपने हाथों से मुँह और आँखें ढक लीं वैसे ही प्रियतम ने पास में खड़ी दूसरी प्रिया को, मुस्कुरा कर, शीघ्र पानी से सींचना शुरू किया ॥ ६९ ॥ दन्तच्छदं दन्तपदैर्यावकं गतानुलेपौ नखरक्षतैः स्तनौ । रागेण वीताञ्जनमीक्षणद्वयं व्यरोचयद् वारिचयो वरस्त्रियाः ॥७०॥ जिस प्रकार प्रियतम (चुम्बन के समय) प्रिया के अधर की लाक्षादिजन्य लालिमा को अपने दाँतों से हटा देता है, स्तनों के (चन्दन केसर आदि के) लेप को नखक्षत से दूर कर देता है और नेत्रों के अञ्जन को (चुम्बन, करस्पर्श आदि से) मिटा देता है, उसी प्रकार नदी के जल ने भी श्रेष्ठ काम

CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri २३ पञ्चदशः सर्गः १७७ पत्रालिलीना मकरी मृगीदृशां स्तनाचलेभ्यः पतिता ह्रदाम्भसि । रागोपि तावज्जडसङ्गिनोऽङ्गतः प्रसन्नमन्तर्विशति स्म तत्क्षणम् ।।७५।। मृगनयनियों के स्तनों पर चित्रित मकरी स्तनरूपी पर्वतों से सरोवर के जल में कूद पड़ी (मगर जल में रहते ही हैं) । (केसर और चन्दन आदि से) स्तनों पर चित्रित मकराकार चिह्न के जल से धुल जाने पर उसका राग (लालिमा) जल के संग के कारण शरीर से हट कर, उसी समय प्रसन्नतापूर्वक अन्तःकरण में प्रवेश कर गया, जिस प्रकार मूर्ख के साथ संभोग (जडसंग) करते समय विदग्ध नायिका का राग शरीर से हट कर अन्तःकरण में चला जाता है अर्थात् नायक के मूर्ख होने के कारण नायिका का शरीर राग (हावभाव) का प्रदर्शन नहीं करता, केवल अन्तः- करण ही अनुरागपूर्ण रहता है ।। ७५ ।। प्रेम्णा प्रियेणाम्बुजमम्बुजेक्षणकराम्बुजे यत् प्रथमं निवेशितम् । शङ्के तदेवास निवासभूः श्रियस्तदाश्रये श्रीरधिका यतोऽभवत् ।।७६।। पहले पहल कमलनयनी के कर-कमल में प्रियतम ने प्रेम से जो कमल दिया उस कमल में ही मानों लक्ष्मी जी रहती थीं क्योंकि उसको पाकर कमलनयनी की लक्ष्मी (शोभा) अधिक हो गई ।। ७६ ।। कीर्णं क्वचिन्मर्दितपुष्पदामभिः क्वचिच्च किञ्जल्कभरः सरोरुहाम् । पर्याविलं क्वापि हतैर्विलेपनैरभूत् तदम्भः सुदृशां विगाहनात् ।।७७।। उन कामिनियों के स्नान के कारण जल में कहीं तो मसली हुई फूलमालायें बिखर रही थीं, कहीं कमलों के केसर-समूह पड़े थे और कहीं कहीं वह जल घुले हुये लेपों के कारण मटमैला बन गया था ।। ७७ ।। प्रतिप्रतीपं विनिभालयन्ती द्राग् द्राघयन्ती क्वचिदम्बरान्तम् । लग्नाईवस्त्रप्रकटोच्चनीचे निलीयमानेव निजे शरीरे ।।७८।। भुजायुगस्वस्तिकया नितान्तं निपीडितोत्तुङ्कतरस्तनान्ता । काचिद् व्रजन्ती सरितस्तटान्तं कामेऽपि तन्वी तनुते स्म कामम् ।।७९।। जलक्रीड़ा के बाद नदी के प्रवाह से तीर की ओर आने वाली कामिनी, कभी प्रत्येक सपत्नी की ओर (तिरस्कार से) देखती थी, कभी हाथ बढ़ा कर साड़ी को खूब फैला लेती थी ताकि शरीर के अंग दिखाई न दें, गीले वस्त्र के शरीर से चिपक जाने के कारण उसके अंगों का उतार-चढ़ाव स्पष्ट प्रतीत हो रहा था और कभी वह झुक कर लज्जावश इस प्रकार चलती थी मानों अपने शरीर में ही छिप जाना चाहती हो, कभी वह अपने स्तनों को छिपाने के लिये (बायें हाथ को दाहिने कंधे पर और दाहिने हाथ को बायें कंधे पर रख कर) अपने दोनों हाथों को स्वस्तिक के आकार का बनाकर उनसे अपने अत्यन्त उच्च स्तनों के अग्रभाग को खूब दबाती हुई चलती थी; वह कामदेव को भी कामविह्वल बना रही थी ।। ७८-७९ ।। (७८) प्रतिप्रतीपं प्रतीपं प्रतीपं प्रति, एकैकाः सपत्नीः पश्यन्तीत्यर्थः । (७९) भुजायुगस्वस्तिकया स्वस्तिकाकारेण बाहुयुगलेन । Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi

१७८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इतिरचितविहारः पार्थिवः प्रेयसोभिः पयसि ललितलीलापेशलाभिः परीतः । करधृतविशदस्रग्गन्धसाराम्बराभिः परिजनवनिताभिः सेवितं तीरमागात् ॥८०॥ ललित लीला में निपुण प्रेयसियों से घिरे हुये राजा वारिविहार करके नदी के तीर पर चले आये जहाँ परिचारिकायें हाथों में सुन्दर मालायें, चन्दन और वस्त्र लिये खड़ी थीं ॥ ८० ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये पञ्चदशः सर्गः।

षोडशः सर्गः कालेऽथ शुद्धिमति शूरजनः समृद्धान् पत्नीसु तासु तनयान् जनयाञ्चकार । तेषामभूदधिगुणः किल भोजदेवः प्रासूत पट्टमहिषी कनकावती यम् ।। १ ।। राव सुर्जन ने शुद्ध और शुभ मुहूर्त में अपनी पत्नियों में समृद्ध पुत्र उत्पन्न किये जिनमें पटरानी कनकावती के पुत्र भोजदेव सबसे अधिक गुणवान् थे ।। १ ।। आरुह्य वाजिवरमूर्जितमाजिभूमौ नाराचराजिभिरुपार्जितजैत्रवीर्यः । जाग्रत्प्रगल्भभुजमण्डनमण्डलाग्रव्यग्रीकृतोप्रतरवैरिनृपालवर्गः ।। २ ।। भोजदेव उन्नत और श्रेष्ठ घोड़े पर चढ़ कर युद्ध भूमि में अपनी बाण परम्परा के द्वारा अपने उत्कृष्ट बल को प्रकट करके विजय प्राप्त करते थे और अपनी जागरूक तथा गंभीर भुजाओं को सुशोभित करने वाली तलवार से भयंकर शत्रु राजाओं के समूह को उद्विग्न कर देते थे ॥२॥ संख्येबु यः प्रतिभटक्षितिपालवक्षोविक्षोभजातरुधिरोद्धुरकर्दमाक्तम् । कौक्षेयकं खलु विपक्षम

॥८॥ Wait, look at "दधत्यधिपतेरधिराज्यलक्ष्मीम्": द ध त्य धि प ते र धि रा ज्य ल क्ष्मी म् ॥८॥

Line 9: (अकबर ने रणथंभौर दुर्ग को जीतने के लिये) कुछ यवन वीरों को आज्ञा दी जो अपनी

Line 10: विस्तृत और तेज तलवारों की धार से युद्धभूमि में सैकड़ों बार अपने पराक्रम से विजय प्राप्त कर Wait, look at "युद्धभूमि": in line 10, is it "युद्धभूमि" or "युद्धभमि"? Zoom in on line 10: "य द्ध भ मि" -> wait! Look at the 'भ': there is no 'ू' under 'भ'! It is: "युद्धभमि में सैकड़ों बार" ! Wait, let me look closely at "युद्धभमि": य (ya) with ु (u) and द्ध (ddha) = युद्ध Then भ with म (mi) = भमि or भूमि? Wait, there is no 'ू' stroke below भ! It literally is "युद्धभमि". Let me look really closely. Ah, there is no curve below भ. It looks like "युद्धभमि". But wait, could it be faint? In line 25: "युद्धभूमि" has a clear loop below भ. In line 10: the bottom of भ is flat, no loop at all

षोडशः सर्गः १८१ प्रास्थानिकध्वनिरथोद्धतदुन्दुभीनां भिन्दन्निव प्रतिरवैर्जगदण्डभाण्डम् । आपूरितत्रिदशभूधररन्ध्रमुच्चैर्दिक्‌चक्रमाक्रमत तत्क्षणमक्रमेण ॥ १३ ॥ तब जोरों से बजाये जाने वाले नगाड़ों के, युद्ध के लिये प्रस्थान की तैयारी की सूचना देने वाले शब्दों ने, अपनी प्रतिध्वनि से मानों ब्रह्माण्ड कटाह को भेद कर, उस समय क्रम का ध्यान न रख कर, सुमेरु पर्वत की गुफाओं को भर कर, जोरों से दिशाओं के समूह पर आक्रमण कर दिया ॥ १३॥ व्यग्रात्मनां निजनिजोचितसंविधानैस्तत्तत्क्रियासु विनियोजयतां जनौघान् । उच्चैः स्वरैस्त्वरयताञ्च पुनः पुनस्तान् कोलाहलः पुनरभूदपरो नराणाम्। १४। जनसमूह को अपने योग्य साधनों द्वारा अपने अपने कार्यों में नियुक्त करने वाले और ऊँचे स्वर में बारवार उनको जल्दी करने की आज्ञा देने वाले व्यस्त अधिकारी-वर्ग का कोलाहल भी सुनाई दे रहा था ॥ १४ ॥ जेतुं पतङ्गतुरगानिव पादयुग्ममुच्चैः क्षिपन्तमसकृद् विधृतं प्रयत्नात् । उच्चैर्जवेन विजितं विनतातनूजं हेषारवैरिव हसन्मुदीर्णदन्तम् ॥ १५॥ पर्याणपीडनपुरस्कृतपीठदेशं कण्ठक्वणत्कनककिङ्किणिकाकलापम् । वल्गागुणग्रहिलपाणिरुपानिनाय तूर्णं तुरङ्गमधिकारिजनः पुरस्तात् ॥ १६॥ सूर्य के घोड़ों को जीतने के लिये मानों अपनी टापें बार बार जोरों से फटकारने वाले, प्रयत्न- पूर्वक रोके जाने वाले, अपने वेग से जीते गये गरुड़ की मानों दाँत निकाल कर हिनहिनाने के बहाने हँसी उड़ानेवाले, कसी हुई काठी से सुसज्जित पीठ वाले और कण्ठ में बजने वाले सोने के घुँघरुओं की माला से सुशोभित घोड़े को लगाम पकड़ कर साईंस शीघ्रता से आगे लाया ॥ १५-१६॥ राकानिशाकरकरोत्करकोमलेन कीर्णेन चामरचयेन विरोचमानम् । स्वर्गापगारुचिरवीचिवितानकेन चित्रं प्रवाहमिव भानुमतः सुतायाः ॥१७॥ घण्टाभिराहितरुचं दधतीभिरुच्चैर्नादान् द्विषत्क्षितिभृतामभिचारमन्त्रान् । माणिक्यमुद्रितसुवर्णमयं किरीटं बिभ्राणमद्रिमुदयं महसामिवेशम् ॥१८॥ अव्याहतस्रुतमदद्रवगन्धलोलैर्झङ्कारिभिर्मधुकरैः श्रवणान्तिकस्थैः । उद्गीयमानमिव दानयशः स्वकीयं शृण्वन्तमर्धमुकुलीकृतलोचनान्तम् ॥१९॥ सिन्दूरबिन्दुचयचित्रितपूर्वभागं नागं महीधरमिवोदितधातुरागम् । आस्तीर्णकम्बलकुथं धृतकेतुमालमाधोरणः प्रमुखमीशितुरानिनाय ॥२०॥ फिर महावत प्रमुख हाथी को राजा के आगे लाया—वह हाथी पूर्णिमा के चन्द्रमा के किरण- समूह के समान कोमल और विस्तृत चँवरों से सुशोभित होने के कारण गंगा की सुन्दर लहरों की भँवरों से शोभित यमुना के प्रवाह के समान लग रहा था, उसके दोनों ओर लटकने वाले घंटे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और उनके जोर से बजने के कारण जो शब्द निकल रहे थे वे ऐसे लग रहे थे मानों शत्रुराजाओं को नष्ट कर देने वाले अभिचार मंत्र हों, माणिक जड़े हुये सोने के (१८) उदयं बिभ्राणं महसांमीशं सूर्यं बिभ्राणमद्रिमिव किरीटं बिभ्राणं गजमित्यर्थः ।

१८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् किरीट को धारण करने के कारण वह नवोदित सूर्य को धारण करने वाले उदयाचल पर्वत के समान सुशोभित हो रहा था, निरन्तर बहनेवाले मदजल की गन्ध से आकृष्ट चंचल भ्रमर उसके कानों के पास गूंज रहे थे और वह इस प्रकार शोभित हो रहा था मानों उन भ्रमरों द्वारा गाये जा रहे अपने दानयश (मदजल को भी दान कहते हैं) को आधी आँखें मूंद कर मस्ती से सुन रहा हो, उसका अगला भाग सिन्दूर बिन्दुओं के समूह से चित्रित होने के कारण वह गेरू से शोभित पर्वत के समान लग रहा था, उस पर कम्बल की झूल बिछ रही थी और वह ध्वजदंड से शोभित था ॥ १७—२० ॥ आधोरणप्रहितपाणिमनुग्रहेण स्पृष्ट्वातिकौशलवशादनमन्तमेव । तं बृंहितेन मधुरेण कृतानुमोदं दन्तावलेन्द्रमवनीपतिरारुरोह ॥२१॥ अत्यन्त निपुण होने के कारण राव सुर्जन, हाथी को बिना झुकाये ही, महावत द्वारा प्रसारित हाथ को अनुग्रहपूर्वक छू करं, मधुर चिंघाड़ से अपने ऊपर राजा के बैठने का अनुमोदन करने वाले उस हाथी पर आरूढ़ हुये ॥ २१ ॥ आदर्शाबिम्बमदसीयविशालकीर्तेः क्रीडाभूमिभवनं किल राजलक्ष्म्याः । तस्योपरि स्थिरमराजत दुग्धसिन्धोरावर्तवद् विततवर्तुलमातपत्रम् ॥२२॥ राजा के ऊपर लगा हुआ विस्तृत, गोल और श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था मानों राजा की विशाल कीर्ति का शुभ्र दर्पण हो या राजलक्ष्मी का क्रीड़ाभवन हो या क्षीरसागर की स्थिर भँवर हो ॥ २२ ॥ तत्कर्मणि प्रणिहिताः प्रभुणा नियुक्तास्तत्कार्मुकं क्रमविदः करमस्य निन्युः । यत् सङ्गरेषु ददृशुर्गतजीवनाशाः कीनाशकासरविषाणसमं द्विषन्तः ॥२३॥ (शस्त्र देने के) कार्य में स्थापित, स्वामी द्वारा नियुक्त, क्रम को जानने वाले भृत्यों ने राजा के हाथ में वह धनुष अर्पित किया जिसे शत्रु-गण युद्ध में अपने जीवन की आशा छोड़ कर, यमराज के भैंसे के सींग के समान देखते थे ॥ २३ ॥ यत्रार्जवेन न भवेद् गुणवत्वलाभस्तत्र क्वचित् कुटिलतां कत्तिचिद् भजन्ते । बाणासनं यदवनीशकरे तदानीं संवर्तते स्म कुटिलं गुणयोगहेतोः ॥२४॥ जहाँ सीधेपन से गुणलाभ न हो सके वहाँ कोई-कोई कुटिलता से भी लाभ लेते हैं, इसलिये राजा के हाथ में गुणलाभ करने के लिये (प्रत्यञ्चा से युक्त होने के लिये) धनुष कुटिल बन रहा था ॥२४॥ पाणौ पुरैव शुभदेऽहनि या गृहीता कोशान्तरे विनिहिता हितकारिणी या । स्नेहं विना न खलु गच्छति या प्रसादं साऽस्य प्रियाऽसिलतिका सविधे सदैव २५ पहले ही शुभ मुहूर्त में जिसे हाथ में पकड़ा था (जिसका पाणिग्रहण किया था), जिसे कोश (म्यान) के अन्दर रखा था (जिसको कोश अर्थात् खजाना सौंप दिया था), जो सदा हित करने वाली है और जो स्नेह (तेल) के बिना नहीं चमकती (जो प्रेम के बिना प्रसन्न नहीं होती) वह, प्रिया के समान प्रिय तलवार, सदा राव सुर्जन के पास रहती है ॥ २५ ॥ (२३) कीनाशकासरविषाणसमं यमराजमहिषशृङ्गतुल्यम् ।

षोडशः सर्गः १८३ आक्रीडनं वयसि याऽसिलताऽतिपूर्वे या यौवने पुरुषकारविकासहेतुः । या वार्धके खलु भवत्यवलम्बनाय स्वप्नेऽपि तां न खलु मुञ्चति चाहुवाणः॥२६॥ जो तलवार बचपन में खिलौने की तरह है, जो यौवन में पौरुष के विकास का कारण है और जो वृद्धावस्था में सहारे का काम देती है (प्रिया के समान प्रिय) उस तलवार को चौहाण स्वप्न में भी नहीं छोड़ता ॥ २६ ॥ तं वारणस्थितमवारितसन्निधानाः सेवावकाशकलनेष्वथ सावधानाः । जग्मुः प्रणन्तुमनसो युगपत् क्षितीशा वाहैः परस्परविमर्दनयन्त्रिताङ्गैः ॥२७॥ जिनको राजा के समीप जाने में कोई रुकावट नहीं थी और जो सेवाकार्य में सावधान थे वे विनीत मन वाले राजा लोग हाथी पर स्थित राव सुर्जन के साथ साथ उन घोड़ों पर चढ़ कर चले जिनके अंग, समीप समीप चलने के कारण, परस्पर रगड़ खा रहे थे ॥२७॥ प्रत्येकनामपरिकीर्तनपूर्वमुच्चैरावेदितोऽन्तिकचरेण नरेन्द्रसिंहः । नम्रोत्तमाङ्गमुचितप्रतिपत्तिभिस्तं राज्ञां समूगमनुरञ्जयति स्म विज्ञः ॥२८॥ समीपस्थ अनुचर ने राव सुर्जन को प्रत्येक राजा का उच्च स्वर में नाम ले लेकर आवेदन किया और महाराज ने, नतमस्तक होकर प्रणाम करने वाले उस राजसमूह के नमस्कारों का उचित उत्तर देकर, उसे प्रसन्न किया ॥ २८ ॥ माद्यन्मतङ्गजतुरङ्गमपदातिकानां दर्पोद्धतद्रुतगतैर्ध्वनयद् धरित्रीम् । निर्मथ्यमानमकरालयभीमघोषं भूपालपालितबलं युगपच्चचाल ॥२९॥ मदोत्कट हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों की दर्पोद्धत और तेज चाल से पृथ्वी को हिलाती हुई और मथित समुद्र के समान भयंकर घोष करती हुई वह राजसेना एक साथ चली ॥ २९ ॥ तत्सैन्यनिर्भरभराद् भुजगाधिनाथे त्रासान्मुमुक्षति महीमुदितप्रकम्पे । कूर्मः कटाहकुहरान्मुखमुन्नमय्य ब्रह्माण्डभङ्गचकितः परितो ददर्श ॥३०॥ उस सेना के भारी भार के कारण कम्पित होकर शेषनाग ने पृथ्वी को छोड़ देने की इच्छा की तो कच्छप भगवान् अपनी ढाल में से मुंह बाहर निकाल कर ब्रह्माण्ड भंग से चकित हुये चारों ओर देखने लगे ॥ ३० ॥ मन्दोल्लसत्पवनसङ्गतंरङ्गितान्ता व्योमस्पृशो रुरुचिरे रुचिराः पताकाः । तद्वैरिणां कवलनाय कृतोद्यमस्य कालस्य लोलरसना इव दिक्षु कीर्णाः ॥३१॥ मन्द मन्द चलने वाले वायु से हिलती हुई आकाश को छूने वाली सुन्दर पताकायें इस प्रकार शोभित हो रहीं थीं मानों राजा के शत्रुओं को खाने के लिये उद्यमशील काल की दिशाओं में फैलाई हुई चंचल जीभें हों ॥ ३१ ॥ मुक्ताः कुतूहलवशात् क्षणमश्ववारै र्वाहाः स्म भान्ति विशिखा इव सञ्चरन्तः । येषां यतां रयवशाद् घनवर्त्मनीव स्पर्शो भुवः खुरपदैरनुमीयते स्म ॥३२॥ कुतूहलवश थोड़ी देर के लिये सवारों से ढीले छोड़ दिये जाने पर घोड़े तीर की तरह छूट पड़े; वेग से दौड़ने के कारण ऐसा लगता था मानों वे आकाश में ही उड़ रहे हों, केवल उनके खुरों के चिह्नों से यह अनुमान लगाया जाता था कि वे भूमि का स्पर्श भी करते थे ॥ ३२ ॥ ୨