सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् अवशिष्टसान्ध्यकिरणात् त्रसन्निव द्विषतोऽस्तगस्य करपातशङ्कया । इतरा निरुध्य हरितः समन्ततश्चरमं रुरोध चरमां तमश्चयः ॥४५॥ अस्त होनेवाले अपने शत्रु सूर्य के कर पात की शंका के कारण बची-खुची सांध्य किरणों से भयभीत अन्धकार ने अन्य दिशाओं को घेरकर अब पश्चिम दिशा को भी अच्छी तरह घेर लिया ॥४५॥ विरलं तमः प्रथममुद्गतं क्वचिज्जनयत् तदाकृतिषु तत् तथा भ्रमम् । निबिडीभवत्तु निखिलं विधाय तन्नयनातिगं भ्रमकथां न्यवर्तयत् ॥४६॥ पहले अन्धकार कहीं-कहीं प्रकट हुआ जिससे लोगों को विविध पदार्थों की आकृति में भ्रम होने लगा, किन्तु जब अन्धकार घना होकर छा गया और इसलिये दृष्टिप्रसार का प्रसंग ही नहीं रहा तो आकृतिभ्रम का भी कोई प्रश्न न रहा ॥४६॥ किमशीतरोचिषि परोक्षतां गते हरितोऽपि तस्य सरणीमशिश्रियन् । विरहादमुष्य