भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

चतुर्दशः सर्गः १५९ अवलम्ब्य दण्डमुपयास्यता पुरो विधुतं स्मरेण विधुताऽन्यभीतिना । ययुरेव दूरमपि यावदीप्सितं मुषितेक्षणेऽपि तिमिरेऽभिसारिकाः ॥५२॥ जिस प्रकार अपने आगे चलने वाले किसी स्वस्थ नेत्र वाले व्यक्ति द्वारा एक सिरे से पकड़ी गई लाठी का दूसरा सिरा पकड़कर उसके पीछे पीछे निर्भय चलकर अन्धा भी अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है, उसी प्रकार अन्य वस्तुओं (अन्य व्यक्तियों अथवा सर्पादिक जन्तुओं) द्वारा उत्पन्न भय को नष्ट कर देने वाले तथा अपने आगे-आगे चलने वाले कामदेव द्वारा पकड़ी गई लाठी का सहारा लेकर दृक्शक्ति को नष्ट कर देने वाले निविड़ अन्धकार में भी अभिसारि- कायें दूर तक अपने गन्तव्य संकेत स्थानों पर जा पहुँचीं ॥ यदि 'विधुताऽन्यभीतिना' के स्थान पर 'विधुनान्यभीतिना' पाठ हो, तो यह अर्थ होगा :- अन्य से (राहु, सूर्य आदि से) भयभीत चन्द्रमा शुक्लपक्ष में भी, (अपने मित्र) कामदेव के आगे-आगे रहने के कारण साहस करके, किसी प्रकार बड़ी कठिनता से अपनी किरणों-रूपी दण्ड का सहारा लेकर टिका रहता है; किन्तु अभिसारिकाओं की विशेषता देखिये कि वे निर्भय होकर कृष्णपक्ष के निविड़ अन्धकार में भी, जब दृक्शक्ति नष्ट हो जाती है, अकेली ही, अपने दूर के संकेत स्थानों तक चली जाती हैं ॥५२॥ निबिडाधिनिर्दलितहृद्विनिःसृतैरिव कोकयोर्विरहवर्हिषः कणैः । तिमिरोच्चयस्य तनुकण्टकैरिव स्फुरितं तमोमणिभिरम्बरास्तरे ॥५३॥ चकवा-चकवी के गहरे शोक से दले हुये हृदयों में से निकले हुये विरहाग्नि के स्फुलिंगों के समान लगने वाले और अन्धकार के रोमाञ्चों के समान शोभित होने वाले खद्योत (जुगनू) आकाश में चमक रहे थे ॥५३॥ निलये निलीय मुखनेत्रमुद्रणमवलम्ब्य कालविभुतां विभावन् । शुककोकिलप्रभृतिरन्धमूकवच्छ्रुतवानुलूककुलदीर्घडम्बरम् ॥५४॥ तोते और कोयल इत्यादि अपने-अपने घोंसलों में छिपकर तथा मुंह और आँखें बन्द करके गूंगे और अन्धे बने हुये, समय की महिमा का विचार करके, उल्लुओं की लम्बी चीखें सुन रहे थे ॥५४॥ अधिमूलमिन्द्रककुभोऽथ लोचनैरविभावितस्फुटविशेषमुन्मुखैः । तिमिरोर्म्मुराशिसपुलिनोपमं पुरः किमपीक्ष्यते स्म शबलोज्ज्वलाकृति ॥५५॥ तब पूर्व दिशा के नीचे एक ऐसी वस्तु (चन्द्रमा), जिसकी विशेष आकृति उन्मुख नेत्रों द्वारा भी स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही थी, जो अन्धकाररूपी समुद्र के किनारे चमकती हुई रेत के ढेर के समान लग रही थी और जो कुछ-कुछ धुंधलेपन से चमक रही थी, दिखाई दी ॥५५॥ (५२) 'विधुनाऽन्यभीतिना' इति पाठान्तरम् । विधुता निवारिता अन्येभ्यः सर्पगतस्खलनादिभ्यो भीतिः भयं अर्थात् अभिसारिकाणां येन तेन पुरः अग्रे उप समीपे यास्यता गच्छतेत्यर्थः स्मरेण कामेन विधुतं दण्डमवलम्ब्य अभिसारिकाः अन्धवत् सूचीभेद्येऽपि तमसि यथेच्छं दूरमपि किमुत समीपं ययुरेव। 'विधुनाऽन्य- भीतिना' इति पाठे त्वयमर्थः—अन्येभ्यः राहुसूर्यादिभ्यो भीतिर्यस्य तादृशेन विधुना चन्द्रेण कर्त्रा पुरः अग्रे उप समीपे यास्यता गच्छतेत्यर्थः स्मरेण कामेन हेतुना दण्डं किरणस्वरूपमवलम्ब्य विधुतं कथमपि अवस्थितं भावे क्तः। अभिसारिकास्तु घनान्धकारेऽपि ययुरेव। अत्र शुक्लदलोदितात् चन्द्रात् अभिसारिकाणां व्यतिरेको दर्शितः। तथा हि विधुरन्येभ्यो बिभेति अभिसारिकास्तु निर्भयाः, तस्य स्मरः सहायकः इमास्तु निःसहायाः, स तु दण्डावलम्बी इमास्तु निर्दण्डाः, स