सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अभिरेजुरुज्ज्वलितशक्रदिङ्मुखां हिमरोचिषः कतिपये मरीचयः । चकितञ्चकोरनयनाभिरीक्षिता जयवैजयन्त्य इव पुष्पधन्वनः ॥५६॥ फिर चन्द्रमा की, पूर्व दिशा के मुख को प्रकाशित करने वालीं कुछ किरणें, जिनकी ओर चकोर चकित होकर देख रहे थे, कामदेव की विजय-पताकाओं के समान शोभित हुईं ॥५६॥ दयितस्य तूर्णतरभाविसङ्गमं कथयन्त्यतिस्फुटमुखप्रसादतः । प्रियदूतिकेव पुरुहूतदिक् पुरः शिथिलीचकार तम उल्वणं निशः ॥५७॥ पूर्व दिशा-रूपी प्रिय दूती ने अपने मुख की प्रसन्नता (उज्ज्वलता) से प्रिय चन्द्र-रूपी नायक के शीघ्र होने वाले समागम को सूचित करते हुये, रात्रि-रूपी नायिका के उग्र अन्धकार-रूपी दुःख को कम कर दिया ॥५७॥ परिरभ्य पार्श्वमिलितां पुरो दिशं कृतकानुरागकलितः कलानिधिः । अदिशद् दिवोऽङ्कमनुकुङ्कुमारुणान् क्रमशः करानभिमुखप्रसारितान् ॥५८॥ कलानिधि चन्द्रमा ने दिखावटी प्रेम का प्रदर्शन करके समीप आई हुई पूर्व दिशा का गाढ़ आलिंगन किया और अपने केसर जैसे लाल कर क्रमशः आगे बढ़ाकर उसके वक्षःस्थल पर धर दिये ॥५८॥ प्रथमानुरागविगमेन पूर्वदिक्परिरम्भमुज्झितवता हिमत्विषा । शमितप्रदोषतमसा प्रसेदुषा सुरवर्त्मनि स्थितिरकारि निर्मले ॥ ५९ ॥ जब दिखावटी प्रेम का पहला उफ़ान ठंडा पड़ गया तब चन्द्रमा ने पूर्व दिशा का आलिंगन छोड़ दिया और अन्धकार-रूपी (परस्त्रीसंभोगजन्य) पाप को दूर करके प्रसन्न होने वाले चन्द्रमा देवताओं के निर्मल मार्ग में (आकाश में) स्थित हुये ॥५९॥ उदितः समग्रकलया कलानिधिस्तपनस्य पादहतिभिः प्रपीडिताम् । चिरकालमुद्रितमुखों कुमुद्वतीं व्यतनोत् प्रबोधयितुमायतां रुचिम् ॥६०॥ फिर सम्पूर्ण कलाओं से उदित होकर चन्द्रमा ने सूर्य के पैरों से रौंदी हुई और चिर काल से . मुरझाये हुये मुख से पड़ी हुई कुमुदिनी को जगाने के लिये (प्रफुल्लित करने के लिये) अपनी प्रीति को विस्तृत किया ॥६०॥ अमृतद्रवेण जगती कृतार्थिता द्रवताञ्च येन दृषदोऽपि लम्भिता । उदये स्वभर्तुरपि तस्य जज्वलुः किमहो महौषधिगणाः प्रतिक्षपम् ॥६१॥ जिस चन्द्रमा ने अपनी अमृत वर्षा से संसार को कृतार्थ किया और जिसने पत्थरों (चन्द्र- कान्त मणियों) तक के हृदयों को पिघला दिया, आश्चर्य है कि अपने ऐसे स्वामी के उदय होने पर ओषधि-समूह रात्रि में जल उठा (चमकने लगा) ! ॥६१॥ विहितौ तुषारकिरणस्य धामभिर्मकरध्वजावतितरङ्गितावुभौ । स्थितिमेक एव न जहौ यथोचितामपरः परस्थितिमपि व्यलोपयत् ॥६२॥ चन्द्रमा की किरणों के प्रकाश ने दोनों मकरध्वजों को (समुद्र को और कामदेव को) अत्यन्त तरंगित कर दिया । उनमें से एक ने (समुद्र ने) तो (ज्वार आ जाने के कारण) अपनी उचित (६२) मकरध्वजौ समुद्रकामदेवौ ।