सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१ चतुर्दशः सर्गः १६१ स्थिति (मर्यादा) को ही छोड़ा, किन्तु दूसरे ने (कामदेव ने) तो (अतनु होने के कारण) न केवल अपनी ही स्थिति (शरीर) छोड़ी, अपितु दूसरों की (विरह-पीड़ितों की) स्थिति (मर्यादा) का भी लोप कर दिया ॥६२॥ यदि चन्द्रिकाऽपि मिथुनं रथाङ्गयोरदहन्न तत्र शशिनोऽनुयोज्यता । विरहाग्निदग्धमनसां हि कामिनामपि जीवितं व्रजति वज्रकीलताम् ॥६३॥ यदि शीतल चन्द्रिका ने भी चकवा-चकवी के जोड़ों को (विरह के कारण) जला दिया, तो इसमें चन्द्रमा की कोई प्रेरणा नहीं थी (और न चन्द्रिका का ही कोई दोष था) क्योंकि जिन लोगों का हृदय विरहाग्नि से जल जाता है उनको तो अपना ही जीवन वज्र के समान पीड़ा देने लग जाता है (विरही विरहाग्नि से जले, चाँदनी से नहीं; और जब उनका जीवन ही उन्हें पीड़ा देने लगा तो उन्हें चाँदनी भी कष्ट दे तो इसमें कौन सा आश्चर्य है) ॥६३॥ उदितः कलानिधिरहासि कैरवैः ककुभः प्रसेदुरुदजृम्भि सागरैः । बिसिनी तु बन्धुविरहेण मूर्च्छिता जगदेव वेद तमसा तिरोहितम् ॥६४॥ कलानिधि चन्द्रमा उदित हुये; कुमुद हँसने लगे; दिशायें प्रसन्न हो उठीं; सागर तरंगित होने लगे; किन्तु विचारी कमलिनी के लिये तो, जो अपने प्रियतम सूर्य के विरह में मूर्च्छित थी, सारे संसार में अँधेरा ही छा रहा था ॥६४॥ उदिते कलाभृति कुतूहलान्वितैः कृतमङ्गलः प्रथममग्रजन्मभिः । परिवारितः परिजनैरथार्जुनिः स जगाम धाम जगमालभूभृतः ॥६५॥ चन्द्रमा के उदित होने पर कुतूहलयुक्त ब्राह्मणों ने पहले मंगलाचरण किया और फिर अर्जुन- पुत्र सुर्जन, अपने परिजनों से घिरे हुये, राजा जगमाल के महल में गये ॥६५॥ वरसङ्गिमङ्गलमृदङ्गनिखनः क्रमशः समीपतरवर्त्तितां व्रजन् । पुलकैश्चकार नितरां वधूवपुः सहसा प्रगाढपरिरम्भकञ्चुकम् ॥६६॥ वर के साथ-साथ चलने वाले मांगलिक मृदंग का शब्द जैसे-जैसे क्रमशः समीप आता गया वैसे-वैसे ही खूब कसी हुई चोली वाला वधू का शरीर सहसा पुलकित होता गया ॥६६॥ दधिचन्दनाईकलशोपशोभितं विलसद्विचित्रतरचारुतोरणम् । पवमाननर्तितपताकमुच्चकैरविशद् वितानविततं स मण्डपम् ॥६७॥ दही, चन्दन और गीले कलशों से शोभित, मनोहर विविध चित्रों से युक्त सुन्दर तोरण वाले, पवन से नचाई गईं पताका वाले तथा ऊँचे विस्तृत शामियाने से शोभित मण्डप भवन में सुर्जन ने प्रवेश किया ॥६७॥ धृतचारुमङ्गलपटावगुण्ठनां कनकासने विनिहितां कुमारिकाम् । परिणेतुमानतमुखीमुपानयन्नहमप्रिकाभिरुचिताप्तबान्धवाः ॥६८॥ सुन्दर मांगलिक वस्त्र का घूंघट निकाले नीचा सिर करके सुवर्ण के सिंहासन पर बैठी हुई राजकुमारी को श्रेष्ठ बन्धुवर्ग, "मैं आगे चलूँ" "मैं आगे चलूँ" ऐसी इच्छा रखनेवाली (सखियों) द्वारा, (मण्डपभवन में) विवाह के लिये लिवा लाया ॥६८॥