सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् चिरकालमुत्सुकतया धृतात्मनोरनयोः परस्परवलोकनं प्रति । अभवद् विशालतरशैलसन्निभः क्षणमन्तरालविततीकृतः पटः ॥६९॥ वर-वधू की चिरकाल से एक दूसरे को देखने की तीव्र उत्कण्ठा थी, किन्तु उन दोनों के बीच में विस्तृत पर्दा कुछ देर के लिये एक बड़े भारी पहाड़के समान लग रहा था ॥६९॥ अपसारिते जवनिकापवारणे मिलितं कुमारमिथुनं परस्परम् । मनसोरिवात्तगुणयोः सुवाससोः कुसुमस्त्रजोर्विनिमयं विनिर्ममे ॥७०॥ जब पर्दा हटा लिया गया तो वर-वधू आपस में मिले और उन्होंने सूत्र में गूंथी गई सुगन्धित पुष्पमालाओं के साथ-साथ मानों अपने गुणवान् मन भी परस्पर बदल लिये ॥७०॥ हुतहव्यवाहपुरतः पुरोधसा समयोजि पाणियुगलं तयोर्मिथः । हृदयं तु पुष्पधनुषो निदेशतः प्रणयेन तत् प्रथममेव योजितम् ॥७१॥ यज्ञाग्नि की साक्षी में पुरोहित ने उन दोनों के हाथ एक दूसरे से मिला दिये, किन्तु उन दोनों के हृदयों को तो कामदेव के आदेश से प्रेम पहले ही मिला चुका था ॥७१॥ यदसुस्रुवन् करसरोजयोस्तयोरनिवारिताः सपदि घर्मबिन्दवः । समरोपयन् सपदि तत्र दूषणं हुतजातवेदसि जनाः सभासदः ॥७२॥ उन दोनों के करकमलों से शीघ्र (सात्विक भाव के कारण) जो अनिवार्यित पसीने की बूंदें निकलीं उसका दोष सभासद लोगों ने झट यज्ञाग्नि को दिया ॥७२॥ शिखिनः प्रदक्षिणविधेरनन्तरं गुरुणार्पिता हवनलाजमुष्टयः । अनवाप्य कम्प्रकरसम्पुटं तयोर्व्यवधिं विनैव पतिता हुताशने ॥७३॥ अग्नि की प्रदक्षिणा करने के बाद गुरु ने हवन करने के लिये जो लावे मुट्ठी में लेकर वर- वधू को दिये वे उनके कम्पित करसम्पुट में न ठहरने के कारण बिना व्यवधान के ही अग्नि में गिर गये ॥७३॥ अवलोकितुं पतिमुखेन्दुमादराद् वदनं मुहुर्गुरुजनेन यन्त्रिता । दरमुन्नमय्य भृशमानतं शिरः क्षणमक्षिपद्ममुदमुद्रयद् वधूः ॥७४॥ पति के मुखचन्द्र को देखने की उत्कण्ठा के कारण वधू ने, गुरुजनों की उपस्थिति से बारबार संकुचित होकर भी, (किसी न किसी प्रकार) अपने मुख को थोड़ा सा उठाकर पति का अत्यन्त चौड़ा सिर देखा और क्षण भर के लिये अपने नेत्र-कमलों की शोभा को विकसित किया ॥७४॥ अधिरोपिता नववधूः शिलातलं हृदयं निजञ्च परिणायकेन सा । प्रथमं कठोरतरमस्पृशत् पदा चरमे ममज्ज करुणास्रदीयसि ॥७५॥ नववधू को पति ने शिलातल पर और अपने हृदय पर आरूढ़ कराया, जिसमें से पहले को (शिलातल को), अत्यन्त कठोर होने के कारण वधू ने पैर से छुआ और दूसरे में, करुणा से कोमल होने के कारण, वह स्वयं डूब गई ॥७५॥