सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशः सर्गः १५७ विकलं वियोज्य मिथुनं रथाङ्गयोस्तमसेऽवकाशमचिराद् वितन्वती । अवमत्य सम्भृतपुटाञ्जलीन् द्विजांश्चपला पलायत जवात् पितृप्रसूः ॥३९॥ व्याकुल चक्रवाकमिथुन का परस्पर वियोग करके (रात्रि में चकवा-चकवी साथ-साथ नहीं रहते, ऐसा कवियों का समय है) तथा अन्धकार को शीघ्र आने का मार्ग देकर और हाथ जोड़े हुये दीन ब्राह्मणों के समान लगने वाले, चोंचों को बन्द करके घोंसलों में बैठे हुये पक्षियों की अवज्ञा करके चंचल संध्या वेग से भाग गई ॥३९॥ उदयं प्रयाति नियतं तमोहरो हरिवाहनस्य हरितोऽङ्कमास्थितः । इति रोषतः किमु तमः समुत्तभन्मलिनीचकार पुर एव तन्मुखम् ॥४०॥ इन्द्र की दिशा (पूर्व दिशा) की गोद का आलिंगन करके चन्द्रमा उदय हो रहा है, इस क्रोध के कारण ही उत्तेजित होकर मानों अन्धकार ने (परपुरुष का समागम करने वाली) पूर्व दिशा के मुख को मलिन बना दिया ॥४०॥ व्यसनेन वासरमणेर्विमूर्च्छितां नलिनीं निमीलितसरोजलोचनाम् । विधुरालिधोरणिरधीरपक्षतिक्ष्व्यजनैरवीजयदथोच्चनिस्वना ॥४१॥ प्रियतम सूर्य के वियोग में अपने कमल-नयनों को बन्द करके मूर्च्छित पड़ी हुई कमलिनी को चिल्लाती हुई व्याकुल भ्रमरों की पंक्ति, सखियों के समान, अपने अधीर पंखों से हवा कर रही थी ॥४१॥ कुशलः स्वकीयसुखकृत्य एव यः स मुदा जगाम मधुपः कुमुद्वतीम् । अपरः पुनः परवशोडतिसौहृदात् कमलोदरेषु सहते स्म बन्धनम् ॥४२॥ जिसे केवल अपने ही सुख का ध्यान था वह भ्रमर तो कुमुदिनी के पास चला गया, किन्तु जो सच्चे प्रेम के वश में था उस भ्रमर ने कमलिनी के उदर में बन्धन भी सहा ॥४२॥ इतरेतरं घटितकन्धरं दधावधिचञ्चु चञ्चुमनिमेषलोचनम् । तदपि व्ययुज्यत युगं रथाङ्गयो नियतिं निवर्तयति नैव पौरुषम् ॥४३॥ जो परस्पर कन्धे से कन्धा और चोंच से चोंच मिलाकर एक दूसरे को निर्निमेष-दृष्टि से देख रहा था, उस चकवा-चकवी के जोड़े को भी वियोग का कष्ट सहना पड़ा ! हाय ! पौरुष भी दुर्भाग्य को नहीं हटा पाता ॥४३॥ निरगुर्गभीरगिरिगह्वरोदरात् तरसा तमांसि सहितानि कौशिकैः । दुरितं दृशोः श्रवणयोश्च देहिनां समकालमेव फलितं तदाभवत् ॥४४॥ पहाड़ों की गहरी गुफाओं के अन्दर से अन्धकार और उल्लू साथ-साथ निकले। उस समय लोगों के आँखों और कानों के पाप एक साथ फलीभूत हुये (आँखों के पाप के कारण अन्धकार में दृष्टि काम न दे सकी और कानों के पाप के कारण उल्लुओं के शब्द सुनने पड़े) ॥४४॥