सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
चतुर्दशः सर्गः १५७ विकलं वियोज्य मिथुनं रथाङ्गयोस्तमसेऽवकाशमचिराद् वितन्वती । अवमत्य सम्भृतपुटाञ्जलीन् द्विजांश्चपला पलायत जवात् पितृप्रसूः ॥३९॥ व्याकुल चक्रवाकमिथुन का परस्पर वियोग करके (रात्रि में चकवा-चकवी साथ-साथ नहीं रहते, ऐसा कवियों का समय है) तथा अन्धकार को शीघ्र आने का मार्ग देकर और हाथ जोड़े हुये दीन ब्राह्मणों के समान लगने वाले, चोंचों को बन्द करके घोंसलों में बैठे हुये पक्षियों की अवज्ञा करके चंचल संध्या वेग से भाग गई ॥३९॥ उदयं प्रयाति नियतं तमोहरो हरिवाहनस्य हरितोऽङ्कमास्थितः । इति रोषतः किमु तमः समुत्तभन्मलिनीचकार पुर एव तन्मुखम् ॥४०॥ इन्द्र की दिशा (पूर्व दिशा) की गोद का आलिंगन करके चन्द्रमा उदय हो रहा है, इस क्रोध के कारण ही उत्तेजित होकर मानों अन्धकार ने (परपुरुष का समागम करने वाली) पूर्व दिशा के मुख को मलिन बना दिया ॥४०॥ व्यसनेन वासरमणेर्विमूर्च्छितां नलिनीं निमीलितसरोजलोचनाम् । विधुरालिधोरणिरधीरपक्षतिक्ष्व्यजनैरवीजयदथोच्चनिस्वना ॥४१॥ प्रियतम सूर्य के वियोग में अपने कमल-नयनों को बन्द करके मूर्च्छित पड़ी हुई कमलिनी को चिल्लाती हुई व्याकुल भ्रमरों की पंक्ति, सखियों के समान, अपने अधीर पंखों से हवा कर रही थी ॥४१॥ कुशलः स्वकीयसुखकृत्य एव यः स मुदा जगाम मधुपः कुमुद्वतीम् । अपरः पुनः परवशोडतिसौहृदात् कमलोदरेषु सहते स्म बन्धनम् ॥४२॥ जिसे केवल अपने ही सुख का ध्यान था वह भ्रमर तो कुमुदिनी के पास चला गया, किन्तु जो सच्चे प्रेम के वश में था उस भ्रमर ने कमलिनी के उदर में बन्धन भी सहा ॥४२॥ इतरेतरं घटितकन्धरं दधावधिचञ्चु चञ्चुमनिमेषलोचनम् । तदपि व्ययुज्यत युगं रथाङ्गयो नियतिं निवर्तयति नैव पौरुषम् ॥४३॥ जो परस्पर कन्धे से कन्धा और चोंच से चोंच मिलाकर एक दूसरे को निर्निमेष-दृष्टि से देख रहा था, उस चकवा-चकवी के जोड़े को भी वियोग का कष्ट सहना पड़ा ! हाय ! पौरुष भी दुर्भाग्य को नहीं हटा पाता ॥४३॥ निरगुर्गभीरगिरिगह्वरोदरात् तरसा तमांसि सहितानि कौशिकैः । दुरितं दृशोः श्रवणयोश्च देहिनां समकालमेव फलितं तदाभवत् ॥४४॥ पहाड़ों की गहरी गुफाओं के अन्दर से अन्धकार और उल्लू साथ-साथ निकले। उस समय लोगों के आँखों और कानों के पाप एक साथ फलीभूत हुये (आँखों के पाप के कारण अन्धकार में दृष्टि काम न दे सकी और कानों के पाप के कारण उल्लुओं के शब्द सुनने पड़े) ॥४४॥
१५८ सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् अवशिष्टसान्ध्यकिरणात् त्रसन्निव द्विषतोऽस्तगस्य करपातशङ्कया । इतरा निरुध्य हरितः समन्ततश्चरमं रुरोध चरमां तमश्चयः ॥४५॥ अस्त होनेवाले अपने शत्रु सूर्य के कर पात की शंका के कारण बची-खुची सांध्य किरणों से भयभीत अन्धकार ने अन्य दिशाओं को घेरकर अब पश्चिम दिशा को भी अच्छी तरह घेर लिया ॥४५॥ विरलं तमः प्रथममुद्गतं क्वचिज्जनयत् तदाकृतिषु तत् तथा भ्रमम् । निबिडीभवत्तु निखिलं विधाय तन्नयनातिगं भ्रमकथां न्यवर्तयत् ॥४६॥ पहले अन्धकार कहीं-कहीं प्रकट हुआ जिससे लोगों को विविध पदार्थों की आकृति में भ्रम होने लगा, किन्तु जब अन्धकार घना होकर छा गया और इसलिये दृष्टिप्रसार का प्रसंग ही नहीं रहा तो आकृतिभ्रम का भी कोई प्रश्न न रहा ॥४६॥ किमशीतरोचिषि परोक्षतां गते हरितोऽपि तस्य सरणीमशिश्रियन् । विरहादमुष्य
चतुर्दशः सर्गः १५९ अवलम्ब्य दण्डमुपयास्यता पुरो विधुतं स्मरेण विधुताऽन्यभीतिना । ययुरेव दूरमपि यावदीप्सितं मुषितेक्षणेऽपि तिमिरेऽभिसारिकाः ॥५२॥ जिस प्रकार अपने आगे चलने वाले किसी स्वस्थ नेत्र वाले व्यक्ति द्वारा एक सिरे से पकड़ी गई लाठी का दूसरा सिरा पकड़कर उसके पीछे पीछे निर्भय चलकर अन्धा भी अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है, उसी प्रकार अन्य वस्तुओं (अन्य व्यक्तियों अथवा सर्पादिक जन्तुओं) द्वारा उत्पन्न भय को नष्ट कर देने वाले तथा अपने आगे-आगे चलने वाले कामदेव द्वारा पकड़ी गई लाठी का सहारा लेकर दृक्शक्ति को नष्ट कर देने वाले निविड़ अन्धकार में भी अभिसारि- कायें दूर तक अपने गन्तव्य संकेत स्थानों पर जा पहुँचीं ॥ यदि 'विधुताऽन्यभीतिना' के स्थान पर 'विधुनान्यभीतिना' पाठ हो, तो यह अर्थ होगा :- अन्य से (राहु, सूर्य आदि से) भयभीत चन्द्रमा शुक्लपक्ष में भी, (अपने मित्र) कामदेव के आगे-आगे रहने के कारण साहस करके, किसी प्रकार बड़ी कठिनता से अपनी किरणों-रूपी दण्ड का सहारा लेकर टिका रहता है; किन्तु अभिसारिकाओं की विशेषता देखिये कि वे निर्भय होकर कृष्णपक्ष के निविड़ अन्धकार में भी, जब दृक्शक्ति नष्ट हो जाती है, अकेली ही, अपने दूर के संकेत स्थानों तक चली जाती हैं ॥५२॥ निबिडाधिनिर्दलितहृद्विनिःसृतैरिव कोकयोर्विरहवर्हिषः कणैः । तिमिरोच्चयस्य तनुकण्टकैरिव स्फुरितं तमोमणिभिरम्बरास्तरे ॥५३॥ चकवा-चकवी के गहरे शोक से दले हुये हृदयों में से निकले हुये विरहाग्नि के स्फुलिंगों के समान लगने वाले और अन्धकार के रोमाञ्चों के समान शोभित होने वाले खद्योत (जुगनू) आकाश में चमक रहे थे ॥५३॥ निलये निलीय मुखनेत्रमुद्रणमवलम्ब्य कालविभुतां विभावन् । शुककोकिलप्रभृतिरन्धमूकवच्छ्रुतवानुलूककुलदीर्घडम्बरम् ॥५४॥ तोते और कोयल इत्यादि अपने-अपने घोंसलों में छिपकर तथा मुंह और आँखें बन्द करके गूंगे और अन्धे बने हुये, समय की महिमा का विचार करके, उल्लुओं की लम्बी चीखें सुन रहे थे ॥५४॥ अधिमूलमिन्द्रककुभोऽथ लोचनैरविभावितस्फुटविशेषमुन्मुखैः । तिमिरोर्म्मुराशिसपुलिनोपमं पुरः किमपीक्ष्यते स्म शबलोज्ज्वलाकृति ॥५५॥ तब पूर्व दिशा के नीचे एक ऐसी वस्तु (चन्द्रमा), जिसकी विशेष आकृति उन्मुख नेत्रों द्वारा भी स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही थी, जो अन्धकाररूपी समुद्र के किनारे चमकती हुई रेत के ढेर के समान लग रही थी और जो कुछ-कुछ धुंधलेपन से चमक रही थी, दिखाई दी ॥५५॥ (५२) 'विधुनाऽन्यभीतिना' इति पाठान्तरम् । विधुता निवारिता अन्येभ्यः सर्पगतस्खलनादिभ्यो भीतिः भयं अर्थात् अभिसारिकाणां येन तेन पुरः अग्रे उप समीपे यास्यता गच्छतेत्यर्थः स्मरेण कामेन विधुतं दण्डमवलम्ब्य अभिसारिकाः अन्धवत् सूचीभेद्येऽपि तमसि यथेच्छं दूरमपि किमुत समीपं ययुरेव। 'विधुनाऽन्य- भीतिना' इति पाठे त्वयमर्थः—अन्येभ्यः राहुसूर्यादिभ्यो भीतिर्यस्य तादृशेन विधुना चन्द्रेण कर्त्रा पुरः अग्रे उप समीपे यास्यता गच्छतेत्यर्थः स्मरेण कामेन हेतुना दण्डं किरणस्वरूपमवलम्ब्य विधुतं कथमपि अवस्थितं भावे क्तः। अभिसारिकास्तु घनान्धकारेऽपि ययुरेव। अत्र शुक्लदलोदितात् चन्द्रात् अभिसारिकाणां व्यतिरेको दर्शितः। तथा हि विधुरन्येभ्यो बिभेति अभिसारिकास्तु निर्भयाः, तस्य स्मरः सहायकः इमास्तु निःसहायाः, स तु दण्डावलम्बी इमास्तु निर्दण्डाः, स
१६० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अभिरेजुरुज्ज्वलितशक्रदिङ्मुखां हिमरोचिषः कतिपये मरीचयः । चकितञ्चकोरनयनाभिरीक्षिता जयवैजयन्त्य इव पुष्पधन्वनः ॥५६॥ फिर चन्द्रमा की, पूर्व दिशा के मुख को प्रकाशित करने वालीं कुछ किरणें, जिनकी ओर चकोर चकित होकर देख रहे थे, कामदेव की विजय-पताकाओं के समान शोभित हुईं ॥५६॥ दयितस्य तूर्णतरभाविसङ्गमं कथयन्त्यतिस्फुटमुखप्रसादतः । प्रियदूतिकेव पुरुहूतदिक् पुरः शिथिलीचकार तम उल्वणं निशः ॥५७॥ पूर्व दिशा-रूपी प्रिय दूती ने अपने मुख की प्रसन्नता (उज्ज्वलता) से प्रिय चन्द्र-रूपी नायक के शीघ्र होने वाले समागम को सूचित करते हुये, रात्रि-रूपी नायिका के उग्र अन्धकार-रूपी दुःख को कम कर दिया ॥५७॥ परिरभ्य पार्श्वमिलितां पुरो दिशं कृतकानुरागकलितः कलानिधिः । अदिशद् दिवोऽङ्कमनुकुङ्कुमारुणान् क्रमशः करानभिमुखप्रसारितान् ॥५८॥ कलानिधि चन्द्रमा ने दिखावटी प्रेम का प्रदर्शन करके समीप आई हुई पूर्व दिशा का गाढ़ आलिंगन किया और अपने केसर जैसे लाल कर क्रमशः आगे बढ़ाकर उसके वक्षःस्थल पर धर दिये ॥५८॥ प्रथमानुरागविगमेन पूर्वदिक्परिरम्भमुज्झितवता हिमत्विषा । शमितप्रदोषतमसा प्रसेदुषा सुरवर्त्मनि स्थितिरकारि निर्मले ॥ ५९ ॥ जब दिखावटी प्रेम का पहला उफ़ान ठंडा पड़ गया तब चन्द्रमा ने पूर्व दिशा का आलिंगन छोड़ दिया और अन्धकार-रूपी (परस्त्रीसंभोगजन्य) पाप को दूर करके प्रसन्न होने वाले चन्द्रमा देवताओं के निर्मल मार्ग में (आकाश में) स्थित हुये ॥५९॥ उदितः समग्रकलया कलानिधिस्तपनस्य पादहतिभिः प्रपीडिताम् । चिरकालमुद्रितमुखों कुमुद्वतीं व्यतनोत् प्रबोधयितुमायतां रुचिम् ॥६०॥ फिर सम्पूर्ण कलाओं से उदित होकर चन्द्रमा ने सूर्य के पैरों से रौंदी हुई और चिर काल से . मुरझाये हुये मुख से पड़ी हुई कुमुदिनी को जगाने के लिये (प्रफुल्लित करने के लिये) अपनी प्रीति को विस्तृत किया ॥६०॥ अमृतद्रवेण जगती कृतार्थिता द्रवताञ्च येन दृषदोऽपि लम्भिता । उदये स्वभर्तुरपि तस्य जज्वलुः किमहो महौषधिगणाः प्रतिक्षपम् ॥६१॥ जिस चन्द्रमा ने अपनी अमृत वर्षा से संसार को कृतार्थ किया और जिसने पत्थरों (चन्द्र- कान्त मणियों) तक के हृदयों को पिघला दिया, आश्चर्य है कि अपने ऐसे स्वामी के उदय होने पर ओषधि-समूह रात्रि में जल उठा (चमकने लगा) ! ॥६१॥ विहितौ तुषारकिरणस्य धामभिर्मकरध्वजावतितरङ्गितावुभौ । स्थितिमेक एव न जहौ यथोचितामपरः परस्थितिमपि व्यलोपयत् ॥६२॥ चन्द्रमा की किरणों के प्रकाश ने दोनों मकरध्वजों को (समुद्र को और कामदेव को) अत्यन्त तरंगित कर दिया । उनमें से एक ने (समुद्र ने) तो (ज्वार आ जाने के कारण) अपनी उचित (६२) मकरध्वजौ समुद्रकामदेवौ ।
२१ चतुर्दशः सर्गः १६१ स्थिति (मर्यादा) को ही छोड़ा, किन्तु दूसरे ने (कामदेव ने) तो (अतनु होने के कारण) न केवल अपनी ही स्थिति (शरीर) छोड़ी, अपितु दूसरों की (विरह-पीड़ितों की) स्थिति (मर्यादा) का भी लोप कर दिया ॥६२॥ यदि चन्द्रिकाऽपि मिथुनं रथाङ्गयोरदहन्न तत्र शशिनोऽनुयोज्यता । विरहाग्निदग्धमनसां हि कामिनामपि जीवितं व्रजति वज्रकीलताम् ॥६३॥ यदि शीतल चन्द्रिका ने भी चकवा-चकवी के जोड़ों को (विरह के कारण) जला दिया, तो इसमें चन्द्रमा की कोई प्रेरणा नहीं थी (और न चन्द्रिका का ही कोई दोष था) क्योंकि जिन लोगों का हृदय विरहाग्नि से जल जाता है उनको तो अपना ही जीवन वज्र के समान पीड़ा देने लग जाता है (विरही विरहाग्नि से जले, चाँदनी से नहीं; और जब उनका जीवन ही उन्हें पीड़ा देने लगा तो उन्हें चाँदनी भी कष्ट दे तो इसमें कौन सा आश्चर्य है) ॥६३॥ उदितः कलानिधिरहासि कैरवैः ककुभः प्रसेदुरुदजृम्भि सागरैः । बिसिनी तु बन्धुविरहेण मूर्च्छिता जगदेव वेद तमसा तिरोहितम् ॥६४॥ कलानिधि चन्द्रमा उदित हुये; कुमुद हँसने लगे; दिशायें प्रसन्न हो उठीं; सागर तरंगित होने लगे; किन्तु विचारी कमलिनी के लिये तो, जो अपने प्रियतम सूर्य के विरह में मूर्च्छित थी, सारे संसार में अँधेरा ही छा रहा था ॥६४॥ उदिते कलाभृति कुतूहलान्वितैः कृतमङ्गलः प्रथममग्रजन्मभिः । परिवारितः परिजनैरथार्जुनिः स जगाम धाम जगमालभूभृतः ॥६५॥ चन्द्रमा के उदित होने पर कुतूहलयुक्त ब्राह्मणों ने पहले मंगलाचरण किया और फिर अर्जुन- पुत्र सुर्जन, अपने परिजनों से घिरे हुये, राजा जगमाल के महल में गये ॥६५॥ वरसङ्गिमङ्गलमृदङ्गनिखनः क्रमशः समीपतरवर्त्तितां व्रजन् । पुलकैश्चकार नितरां वधूवपुः सहसा प्रगाढपरिरम्भकञ्चुकम् ॥६६॥ वर के साथ-साथ चलने वाले मांगलिक मृदंग का शब्द जैसे-जैसे क्रमशः समीप आता गया वैसे-वैसे ही खूब कसी हुई चोली वाला वधू का शरीर सहसा पुलकित होता गया ॥६६॥ दधिचन्दनाईकलशोपशोभितं विलसद्विचित्रतरचारुतोरणम् । पवमाननर्तितपताकमुच्चकैरविशद् वितानविततं स मण्डपम् ॥६७॥ दही, चन्दन और गीले कलशों से शोभित, मनोहर विविध चित्रों से युक्त सुन्दर तोरण वाले, पवन से नचाई गईं पताका वाले तथा ऊँचे विस्तृत शामियाने से शोभित मण्डप भवन में सुर्जन ने प्रवेश किया ॥६७॥ धृतचारुमङ्गलपटावगुण्ठनां कनकासने विनिहितां कुमारिकाम् । परिणेतुमानतमुखीमुपानयन्नहमप्रिकाभिरुचिताप्तबान्धवाः ॥६८॥ सुन्दर मांगलिक वस्त्र का घूंघट निकाले नीचा सिर करके सुवर्ण के सिंहासन पर बैठी हुई राजकुमारी को श्रेष्ठ बन्धुवर्ग, "मैं आगे चलूँ" "मैं आगे चलूँ" ऐसी इच्छा रखनेवाली (सखियों) द्वारा, (मण्डपभवन में) विवाह के लिये लिवा लाया ॥६८॥
१६२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् चिरकालमुत्सुकतया धृतात्मनोरनयोः परस्परवलोकनं प्रति । अभवद् विशालतरशैलसन्निभः क्षणमन्तरालविततीकृतः पटः ॥६९॥ वर-वधू की चिरकाल से एक दूसरे को देखने की तीव्र उत्कण्ठा थी, किन्तु उन दोनों के बीच में विस्तृत पर्दा कुछ देर के लिये एक बड़े भारी पहाड़के समान लग रहा था ॥६९॥ अपसारिते जवनिकापवारणे मिलितं कुमारमिथुनं परस्परम् । मनसोरिवात्तगुणयोः सुवाससोः कुसुमस्त्रजोर्विनिमयं विनिर्ममे ॥७०॥ जब पर्दा हटा लिया गया तो वर-वधू आपस में मिले और उन्होंने सूत्र में गूंथी गई सुगन्धित पुष्पमालाओं के साथ-साथ मानों अपने गुणवान् मन भी परस्पर बदल लिये ॥७०॥ हुतहव्यवाहपुरतः पुरोधसा समयोजि पाणियुगलं तयोर्मिथः । हृदयं तु पुष्पधनुषो निदेशतः प्रणयेन तत् प्रथममेव योजितम् ॥७१॥ यज्ञाग्नि की साक्षी में पुरोहित ने उन दोनों के हाथ एक दूसरे से मिला दिये, किन्तु उन दोनों के हृदयों को तो कामदेव के आदेश से प्रेम पहले ही मिला चुका था ॥७१॥ यदसुस्रुवन् करसरोजयोस्तयोरनिवारिताः सपदि घर्मबिन्दवः । समरोपयन् सपदि तत्र दूषणं हुतजातवेदसि जनाः सभासदः ॥७२॥ उन दोनों के करकमलों से शीघ्र (सात्विक भाव के कारण) जो अनिवार्यित पसीने की बूंदें निकलीं उसका दोष सभासद लोगों ने झट यज्ञाग्नि को दिया ॥७२॥ शिखिनः प्रदक्षिणविधेरनन्तरं गुरुणार्पिता हवनलाजमुष्टयः । अनवाप्य कम्प्रकरसम्पुटं तयोर्व्यवधिं विनैव पतिता हुताशने ॥७३॥ अग्नि की प्रदक्षिणा करने के बाद गुरु ने हवन करने के लिये जो लावे मुट्ठी में लेकर वर- वधू को दिये वे उनके कम्पित करसम्पुट में न ठहरने के कारण बिना व्यवधान के ही अग्नि में गिर गये ॥७३॥ अवलोकितुं पतिमुखेन्दुमादराद् वदनं मुहुर्गुरुजनेन यन्त्रिता । दरमुन्नमय्य भृशमानतं शिरः क्षणमक्षिपद्ममुदमुद्रयद् वधूः ॥७४॥ पति के मुखचन्द्र को देखने की उत्कण्ठा के कारण वधू ने, गुरुजनों की उपस्थिति से बारबार संकुचित होकर भी, (किसी न किसी प्रकार) अपने मुख को थोड़ा सा उठाकर पति का अत्यन्त चौड़ा सिर देखा और क्षण भर के लिये अपने नेत्र-कमलों की शोभा को विकसित किया ॥७४॥ अधिरोपिता नववधूः शिलातलं हृदयं निजञ्च परिणायकेन सा । प्रथमं कठोरतरमस्पृशत् पदा चरमे ममज्ज करुणास्रदीयसि ॥७५॥ नववधू को पति ने शिलातल पर और अपने हृदय पर आरूढ़ कराया, जिसमें से पहले को (शिलातल को), अत्यन्त कठोर होने के कारण वधू ने पैर से छुआ और दूसरे में, करुणा से कोमल होने के कारण, वह स्वयं डूब गई ॥७५॥
दयितस्तु सन्ततमभूत् कथापरः ।" Wait, is it "वधूर्दयितस्तु" or "वधूर्वदयितस्तु"? Look at the word: "वधूर्दयितस्तु" - wait, there is an extra letter or repha: व - धू - र् - द - यि - त - स्तु Wait, look at image line 27: "प्रतिवाचमीरयतु वा न वा वधूर्दयितस्तु सन्ततमभूत् कथापरः ।" Wait, look at "वधूर्दयितस्तु": There is व, धू with repha on... wait, on the next letter? Let's zoom in: "व धू र्द यि त स्तु" -> yes, "वधूर्दयितस्तु"! Next line of verse 82 (line 28): "अदस्रीयलोचनयुगं विलोकयन् वचनश्रुतौ सुचिरमुत्तरङ्गितम् ॥८२॥" Wait, "अदस्रीयलोचनयुगं" or "अदसीयलोचनयुगं"? Look at line 28: "अदसीयलोचनयुगं विलोकयन् वचनश्रुतौ सुचिरमुत्तरङ्गितम् ॥८२॥" Wait, let's look at the first word: अ - द - सी - य - लो - च - न - यु - गं Yes, "अदसीय
१६४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शनकैर्विधृत्य करपल्लवं मुहुः सुतनोर्विधूनयति कौतुकात् प्रिये । निजकङ्कणक्वणितभाजि सा त्रपाचकितं दधे प्रतिगवाक्षमक्षिणी ॥८४॥ जब प्रियतम ने धीरे से प्रिया का कोमल हाथ पकड़ कर कुतूहलवश उसे हिलाया, तब अपने कंकणों की ध्वनि के कारण लज्जा से चकित होकर प्रिया झरोखे की ओर झाँकने लगी ॥८४॥ उपचीयमानविभवेन सन्ततं निबिडानुरागरुचिरेण सुभ्रुवः । अतिशयितां शिथिलयन्त्यथ त्रपा मदनेन सन्धिविधिमैहत स्वयम् ॥८५॥ निरन्तर बढ़ने वाले वैभव से युक्त तथा गहरे प्रेम के कारण सुन्दर कामदेव के साथ सुन्दर भौंहों वाली नायिका की लज्जा ने, अपने आधिक्य को ढीला करके, स्वयं सन्धि करना चाहा ॥८५॥ परिचुम्बनेच्छुरलमावृणोन्मुखं परिरिप्सुरङ्गमधिकं जुगूह सा । नियतं च नेतिपदमोरितं तया सुचिरं रहःसु विधिवाचकं प्रिये ॥८६॥ यद्यपि प्रिया स्वयं चुम्बन करना चाहती थी, तो भी चुम्बन के समय वह अपने मुख को काफी छिपा लेती थी ; यद्यपि उसकी इच्छा स्वयं आलिंगन करने की थी, तो भी आलिंगन के समय वह अपने शरीर को अधिक सिकोड़ लेती थी ; और एकान्त में प्रिय के प्रति बहुत देर तक वह निषेधात्मक पद (न कार) का उच्चारण करती थी, यद्यपि वह निषेध निश्चय ही विधि- वाचक (स्वीकृति सूचक) था ॥८६॥ उपगूहनानि चकिता नखक्षतादपि चुम्बनानि रदना॑र्पितव्रणात् ॥ स्फुरितस्पृहाऽपि दयितस्य सङ्गमे न तदाऽन्वमोदत नवोढकामिनी ॥८७॥ प्रिय के समागम के समय वह नवोढा वधू, अपनी इच्छा होने पर भी, नखक्षत के भय से आलिंगन का और दन्तक्षत के भय से चुम्बन का अनुमोदन नहीं कर सकी ॥८७॥ नवसौहृदं मृदुनयेन पालयन् मदनोपदेशमपि नातिलङ्घयन् । कियतीभिरेव रजनीभिरर्जुनिः सुतनोः स विश्वसितपात्रतां ययौ ॥८९॥ कोमलता की नीति से नये प्रेम की पालना करते हुये और कामदेव के उपदेश का भी अधिक उल्लंघन न करते हुये वे अर्जुन-पुत्र सुर्जन, कुछ रातों में ही, प्रिया के विश्वासपत्र बन गये ॥८८॥ उपनाभि चञ्चलकरे नरेश्वरे प्रतिषेधवाचकमसर्वमीरितम् । मदनस्य मङ्गलऋचस्तदाऽभवत् प्रणवो नवोढहरिणीदृशो वचः ॥८९॥ प्रियतम के नाभि के समीप चंचल हाथ बढ़ाने पर नवोढा प्रिया ने जिस निषेधात्मक पद (ऊँ ऊँ ऊँ) का अपूर्ण उच्चारण किया, वह उस समय कामदेव की मंगल ऋचाओं (मंत्रों) के प्रणव अर्थात् ओंकार (ऊँ) के समान सुशोभित हुआ ॥८९॥ न चकार चुम्बनविधौ विरोधितां न जुगूह देहमुपगूहनेष्वपि । उपनीविसञ्चरणचञ्चलं वधूः करपल्लवं रतिगुरोरवारयत् ॥९०॥ अब प्रिया चुम्बन का विरोध नहीं करती थी और न आलिंगन के समय अपने शरीर को सिकोड़ती थी ; अब वह रतिकलाप्रवीण पति के अपनी नाभि के पास चंचल हाथ को ही हटाती थी ॥९०॥
चतुर्दशः सर्गः १६५ चिरनिर्गतास्वपि सखीषु मन्दिरात् मदिरेक्षणा क्षणमवाङ्मुखी स्थिता । भृशमाचकाङ्क्ष शयनाधिरोहणे दयितेन पाणितलकर्षणं बलात् ॥९१॥ रतिगृह से सखियों के चले जाने के बाद भी बहुत देर तक मादकनयनी प्रिया नीचा मुख किये खड़ी रही क्योंकि उसकी प्रबल इच्छा थी कि प्रियतम ही उसका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक शय्या पर खींच लें ॥९१॥ नवसौहृदस्य परिपालनोत्सुका चकिता पुरः प्रणयभङ्गवैशसात् । उररीचकार निजखेदमप्यसौ हृदयेश्वरस्य हृदयानुवृत्तये ॥९२॥ नवीन प्रणय का उत्सुकता से पालन करने की इच्छा के कारण प्रेम के भंग के भय से घबरा कर प्रिया ने, हृदयेश्वर के मनोनुकूल कार्य करने के लिये कुछ कष्ट पाना भी स्वीकार कर लिया ॥९२॥ इति निर्विशन् विषयसम्भवं सुखं प्रमनाः समं वसुमतीशकन्यया । दिवसानि वंशबहुलानि वासिनां कतिचित् ततान सुकृतो सकौतुकम् ॥९३॥ इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक पुण्यात्मा राजा सुर्जन ने राजकुमारी कनकावती के साथ विषय सुख भोगते हुये, अपने बड़े वंश वाले ससुराल के लोगों में मिल कर कुछ दिन कुतूहलवश व्यतीत किये ॥९३॥ जिगमिषुः स्वपुरं स पुरस्कृतः सुकृतिनां नृपतिः सह भार्यया । अनुमतिं मतिमान् सुखमग्रहीद् विनयतो जगमालमहीपतेः ॥९४॥ पुण्यशील पुरुषों में अग्रगण्य राजा सुर्जन ने धर्मपत्नी के साथ अपनी नगरी में लौट जाने के लिये, विनय के कारण आसानी से, राजा जगमाल की स्वीकृति प्राप्त कर ली ॥९४॥ प्रतिष्ठासुः प्रातर्निजनगरमागामिनि दिने समेतः सम्बन्धव्यतिकरितमैत्रीमधुरितैः । कथानामाभोगैः प्रणयविनयोद्रेकपिशुनै- रनैषीदासीनः क्षणमिव निशां तां नरपतिः ॥९५॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अपनी नगरी की ओर प्रस्थान करने वाले राव सुर्जन ने, विवाह सम्बन्ध और मित्रता दोनों के मेल से मधुर लोगों के साथ बैठ कर प्रेम और विनय के उत्कर्ष को सूचित करने वाली कथाओं के विस्तार से उस रात्रि को पल के समान व्यतीत कर दिया ॥९५॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्दशः सर्गः
(९३) वासिनां तत्रत्यानां जनानां येषु बहुलानि वंशानि कुलानि संमिलन्ति स्म तादृशानि दिवसानि । (९५) सम्बन्धेन विवाहसम्बन्धेन व्यतिकरिता समृद्धा मैत्री तया मधुरितैः मनोहरैः ।
पञ्चदशः सर्गः नाथः कलानामथ कालयन्त्रितां विभावरीं यानमुखीं विभावयन् । छायाव्यपायाद् वहति स्म धूसरं वियोगिनारीवदनोपमं वपुः ॥ १ ॥ काल से नियमित रात्रि को जाते हुये देख कर कान्तिहीन चन्द्रमा ने विरहिणी स्त्री के मुख के समान पीला शरीर धारण किया ॥ १ ॥
- यो वर्धयत्यम्बुनिधीन् दिवौकसां बिभर्ति कुक्षिं वपुषो व्ययेन यः । जीवातुराद्योऽस्य जगत्त्रयस्य यः स दुर्दशाया दशनान्तरं गतः ॥ २ ॥ जो समुद्रों के हृदयों को उछालता है, जो अपने शरीर तक को अर्पण करके देवताओं का पेट भरता है (देवगण चन्द्रमा की अमृतमयी कलाओं का उपभोग करते हैं) और जो तीनों लोकों के लिये जीवनौषधि है, वह चन्द्रमा भी दुर्भाग्य के मुंह में चला गया ! ॥ २ ॥ पीतारुणेनाक्षिगतेन कौमुदी जगाम लक्ष्मीर्मुदिताब्जकाननम् । कुत्रापि याता प्रथमं निशीथिनी कलङ्कशेषः पतितः कलाधिपः ॥ ३ ॥ लाल अरुण (सूर्य-सारथि) के उदित होने पर प्रसन्न कुमुद-लक्ष्मी कमलों के समूह में चली गई; रात्रि तो पहले ही कहीं चली गई थी। अतः अकेला चन्द्रमा भी, जिसका (कान्तिहीन होने के कारण और अपनी स्त्रियों के अन्यत्र भाग जाने के कारण) केवल कलंक ही शेष रह गया था, अस्त हो गया ॥ ३ ॥ दोषाः परं वृद्धिमयन्ति सन्ततं गुणास्तु मुञ्चन्ति विपत्सु पूरुषम् । कान्त्या विहीनस्य विधोः पतिष्यतः कलङ्क एवोद्भटतां जगाम यत् ॥ ४ ॥ विपत्ति में पुरुष के दोष बढ़ जाते हैं और गुण उसे छोड़ जाते हैं; अस्त होने वाले कान्तिहीन चन्द्रमा का कलंक ही बढ़ता गया ॥ ४ ॥ उद्यन्ननूरुर्मुखरञ्जनं पुरा दिशो विधाय क्षणमङ्गरागजाम् । लक्ष्मीं समग्रां निदधे निरत्ययामुदञ्चिताङ्गीषु सरोजराजिषु ॥ ५ ॥ उदय होने वाले अरुण ने पूर्वदिशा का शृङ्गार करने के लिये उसके मुख पर लाल उबटन लगाया और बचे-खुचे लाल उबटन की सारी शोभा को विकसित अंगों वाली कमलपंक्तियों पर फेंक दिया ॥ ५ ॥ कामं कलाभिः परिपूर्णमण्डलो धुनोतु धाम्ना तिमिराणि चन्द्रमाः । धाम्नां निधेरग्रसरेऽपि यद् बलं तमोनिरासे न भवेत् तदन्यतः ॥ ६ ॥ भले ही पूर्णविम्ब वाला चन्द्रमा अपनी सारी कलाओं के प्रकाश से अन्धकार को नष्ट करे, किन्तु अन्धकार को नष्ट करने की जो शक्ति सूर्य के सारथी में भी है वह अन्यत्र नहीं है ॥ ६ ॥
पञ्चदशः सर्गः १६७ शोणैः करैः संक्रमयन् मनोगतं पतङ्गकान्तेष्वनलं रथाङ्गयोः । सौभाग्यलक्ष्मीं गलहस्तयन् पुरः कुमुद्वतीनामुदगान् मरीचिमान् ॥ ७ ॥ चकवा-चकवी की विरहाग्नि को अपने लाल करों से सूर्यकान्त मणियों में सरकाते हुये और कुमुदिनी की सौभाग्यलक्ष्मी को गर्दन पकड़ कर बाहर निकालते हुये, भगवान् सूर्य उदित हुये ॥७॥ वातायनेभ्यः पतिता नभोमणेर्मरीचयो गैरकरागरोचिषः । मर्माण्यभिन्दन् नितरां भुजान्तराद् विमोचयन्तो दयितान् नतभ्रुवाम् ॥८॥ सूर्य की खिड़कियों की जालियों में से आनेवाली गेरू के समान लाल किरणों ने कामिनियों के बाहुपाश से प्रियतमों को छुड़ा कर उन्हें मर्मान्तिक कष्ट दिया ॥ ८ ॥ पद्माकराणां विरलाः शनैः शनैस्तरङ्गलेखा गणयन्निवोदिताः । सौरभ्यसारं सरसीरुहां हरन् समीरणः सञ्चरति स्म मन्थरम् ॥ ९ ॥ [L1
१६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नवोढवध्वा नमदाननश्रीयो नवीनमापीनकुचप्रसाधनम् । अन्योन्यमक्षिभ्रुवविभ्रमेङ्गितैर्नखक्षतं निर्दिदिशुर्मृगीदृशः ॥१४॥ लज्जा से नतमस्तक नई दुलहिन के सुडौल स्तनों पर नये आभूषण के समान सुशोभित, प्रियतम के नखक्षत को, मृगनयनी सखियों ने एक दूसरी को आँखों ही आँखों के कलापूर्ण इशारों से दिखाया ॥१४॥ इत्थं प्रवृत्ते दिवस्य सम्भ्रमे समाप्य कृत्यं कृतिनां पुरःसरः । देवान् द्विजातीन् मिलितान् गुरून्नपि प्रतिष्ठते स्म प्रयतः प्रणम्य सः ॥१५॥ इस प्रकार प्रातःकाल हो जाने पर कर्मठ-श्रेष्ठ सुर्जन ने, नित्य-कृत्य से निवृत्त होकर, देवताओं को, ब्राह्मणों को और एकत्रित गुरुवर्ग को सविनय सावधानीपूर्वक प्रणाम किया ॥१५॥ भूयिष्ठभूषामपि नव्यभूषणैः प्रसाध्य भूयः कनकावतीं सुताम् । यानोन्मुखीं
२२ पञ्चदशः सर्गः १६९ देवद्विजन्मातिथिदुर्गतान् मुहुः प्रयत्नतः प्रीणय तत्तदर्हणैः । मुक्त्वा मुखम्लानिमनीचमानसा वनीयकेभ्यो वितरोचितं वसु ॥२१॥ देव, ब्राह्मण, अतिथि और विपद्ग्रस्त व्यक्तियों को वार वार प्रयत्न से विविध सेवाओं द्वारा प्रसन्न करना और प्रसन्नमुख तथा विशालहृदय होकर याचकों को उचित धन देना ॥ २१ ॥ शुश्रूषमाणा गुरुवर्गमुद्गतश्रमा यदि स्याः सुकुमारभावतः । निर्वेदखेदं खलु तत्र मा कृथाः कृतार्थतामेव ततोऽवधारय ॥२२॥ यदि गुरुजनों की सेवा करते समय, सुकुमार होने के कारण, तुम थक भी जाओ, तो उससे कष्ट का अनुभव मत करना, किन्तु उस सेवा के कारण अपने आपको धन्य समझना ॥ २२ ॥ आम्रेडनं चेत् कुरुते गुरुः स्वयं प्रसन्नचेताः सुकुमारभाषितैः । भवेस्तदायासभिदे त्वदीशितुः सभाजनार्थं शुभवेशपेशला ॥२३॥ जब गुरुजन तुम्हारी सेवा से प्रसन्नचित्त होकर प्रेमपूर्ण कोमल वचनों से परिश्रम दूर करने के लिये तुमसे दो-तीन बार कहें ('तुम थक गई हो, अब भीतर जाओ' इस प्रकार दो-तीन बार कहें) तब सुन्दर वेश और शृङ्गार से सुसज्जित होकर अपने पति के सत्कार के लिये जाना ॥२३॥ चेष्टाभिरिष्टाभिरुदारभाषितैरकृत्रिमप्रेमपवित्रया धिया । सर्वास्ववस्थास्वपि सर्वतोमुखी विवर्धनीया दयितेऽनुकूलता ॥२४॥ प्रिय कर्मों से, उदार वचनों से और निश्छल प्रेम द्वारा पवित्र मन से, सब अवस्थाओं में सब प्रकार से, पति के प्रति अनुकूलता बढ़ाना ॥ २४ ॥ पत्यौ प्रतीपेऽपि तिरोहितव्यथा हिताय तस्याऽऽहितमानसा भव । विरुद्धभाषिण्यपि तत्र सत्रपा कृपानिदानं वद दैन्यवद् वचः ॥२५॥ पति के प्रतिकूल होने पर भी अपनी व्यथा को छिपा कर सदा उनके हित के लिये मन लगाना और पति के तुम्हारे विरुद्धवचन बोलने पर भी तुम लजीली और दीन बनकर उनको प्रसन्न करने वाले वचन बोलना ॥ २५ ॥ ईर्ष्यातिरेकोत्थवितर्कविभ्रमान् न चानुसन्धेयममुष्यदूषणम् । मा श्रद्दधीथाः श्रुतमप्युपेक्षया प्रतीतमप्यात्मतुदं विदूरय ॥२६॥ ईर्ष्या के आधिक्य से उत्पन्न तर्क-वितर्क के कारण पति के दूषण ढूँढ़ने का प्रयत्न मत करना । यदि उनके दोष सुन भी लो तो भी उनकी उपेक्षा कर देना और उनका विश्वास मत करना एवं यदि तुम स्वयं पति की कष्टदायक प्रतिकूलता का अनुभव करो तो भी उसे भुला देना ॥२६॥ निर्याति नो चेन् मनसस्तदुद्भटं प्रकाशनीयं न च दूषणं प्रिये । लौल्यात् प्रमादादथ चेत् प्रकाशितं निवेशनीयं परिहासभाषिते ॥२७॥ यदि पति का उग्र दोष मन से निकाला न जा सके तो भी उसे कभी पति के सामने प्रकट मत करना और यदि चापल्य से अथवा भूल से उसे प्रकट कर दो तो उसका समावेश हँसी में कर देना ॥ २७ ॥ (२३) आम्रेडनं द्विस्त्रिरुक्तम् ।
१७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् बुद्ध्यां विनिधाय च भर्तुराशयं बिभर्ति येनायमवारितां मुदम् । तेन प्रबन्धेन मनोऽस्य सन्ततं स्वतन्त्रमाराधय वीतमत्सरा ॥२८॥ पति के हृदयगत भावों को सोच-समझकर जिन बातों से उनको अत्यन्त प्रसन्नता मिले उन बातों से, सदा ईर्ष्यारहित होकर, पति के स्वतन्त्र मन को प्रसन्न रखना ॥ २८ ॥ द्रागुद्वहन्तं वनितामथापरामसूयया खेदय माऽवनीपतिम् । भूयिष्ठभार्या हि भवन्ति भूभृतस्त्ववापि तावच्छ्रुतिगोचरं गताः ॥२९॥ यदि तुम्हारे पति शीघ्र किसी अन्य स्त्री से भी विवाह कर लें तो भी ईर्ष्यालु बन कर उन्हें कष्ट मत देना। यह तो तुमने भी सुना ही है कि राजाओं के अनेक रानियाँ होती हैं ॥ २९ ॥ भवन्ति भार्याः शतशो महीभृतां गुणैर्भवत्येकतमा प्रतिष्ठिता । ताराः कलत्राण्यखिलाः कलाभृतो न रोहिणीसाम्यमुपैति काचन ॥३०॥ भले ही राजाओं के अनेक रानियाँ हों, किन्तु गुणों के कारण एक पटरानी ही प्रतिष्ठित होती है; चन्द्रमा के अनेक तारा-रूपी स्त्रियाँ हैं, किन्तु कोई भी रोहिणी की बराबरी नहीं कर सकती ॥ ३० ॥ मर्मस्पृशाप्यन्यगिरा निपीडिता न पीडयेस्तं प्रतिकूलचेष्टितैः । पत्युः प्रसादातिशयेऽपि पुत्रिके! न लङ्घनीयो विनयोचितः क्रमः ॥३१॥ अन्य (सपत्नी) की मर्मस्पर्शी वाणी से पीड़ित होकर भी तुम प्रतिकूल चेष्टाओं से उसे कष्ट मत देना। पुत्रि! पति के अत्यन्त प्रसन्न होने पर भी विनयोचित क्रम का उल्लंघन मत करना ॥ ३१ ॥ एवंविधैस्त्वं पतिदेवताव्रतैर्वितन्वती विश्वजनानुरञ्जनम् । सीमन्तिनीनामुपगम्य मौलितां स्वबान्धवानां मुखमुज्वलीकुरु ॥३२॥ इस प्रकार पतिव्रताधर्मों से तुम सब लोगों को आनन्द देती हुई स्त्रियों में शिरोभूत (श्रेष्ठ) बनकर अपने बन्धुओं का मुंह उजला करना ॥ ३२ ॥ एवं ब्रुवाणा विनयानताननां दृगम्बुपूरैः स्नपयन्त्यशीतलैः । मूर्धन्युपाघ्रायभृशोपगूहतां मुमोच कृच्छ्रेण कृशोदरीं प्रसूः ॥३३॥ विनय से नतमुख कृशोदरी कनकावती को पूर्वोक्त उपदेश देकर अपने गरम आँसुओं की धारा से उसे नहलाती हुई माता ने उसका गाढ़ आलिंगन करके और मस्तक सूंघकर बड़ी कठिनता से उसे छोड़ा ॥ ३३ ॥ मान्यास्तथान्या मिलिताः कुटुम्बिनीः क्रमेण सम्भाव्य पदाभिवन्दनैः । ताभिः कृताशीर्भिरथानुमोदिता नरेन्द्रपुत्रीनरयानमागमत् ॥३४॥ कनकावती ने (माता से विदा लेकर) अन्य एकत्रित सम्मान्य कुटुम्बिनी स्त्रियों को उनके पैर छूकर प्रणाम किया और उनसे शुभाशीर्वाद तथा आज्ञा लेकर वह राजकुमारी पालकी पर चढ़ गई ॥ ३४ ॥
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पञ्चदशः सर्गः १७१ यानान्तरं यातमन्वन्तरं नृपः समेतबन्धुर्गुणसिन्धुरन्वगात् । प्राप्तः पुरं शूरजनोऽपि सम्भृतप्रभूतमङ्गल्यमनोज्ञमण्डनम् ॥३५॥ बन्धुवर्ग से घिरे हुये गुणसमुद्र राव सुर्जन दूसरे यान पर चढ़कर पालकी के साथ-साथ चले और अनेक एकत्रित मांगलिक सुन्दर पदार्थों से सुसज्जित अपनी नगरी में पहुँच गये ॥ ३५ ॥ ऋद्धां समासाद्य पुरीं प्रथीयसा प्रतापजालेन तिरोहिताऽहितः । कालं कियन्तं कनकावतीसखो विहारभूमिं भ्रमति स्म भूपतिः ॥३६॥ प्रबल प्रताप से शत्रुओं को छिपा देने वाले राव सुर्जन अपनी समृद्ध नगरी में आकर कुछ समय तक कनकावती के साथ विहारभूमि में भ्रमण करते रहे ॥ ३६ !! पुंस्कोकिलालापपरिष्कृतिव्रतैः स वीज्यमानो मलयाद्रिमारुतैः । तल्पे नवीनाम्रदलोपकल्पिते निनाय रम्या मधुयामिनीरसौ ॥३७॥ [L12
१७२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भर्तुः प्रभावातिशयेन भूयसीं समश्नुते वृद्धिमसंशयं जनः । तेजोधिकं बिभ्रति वासराधिपे महत्त्वमुच्चैर्यदवाप वासरः ॥४२॥ लोग अपने स्वामी के अत्युत्कृष्ट प्रभाव के कारण भारी वृद्धि प्राप्त करते हैं; यही कारण था कि दिन के स्वामी सूर्य के (ग्रीष्म-ऋतु में) प्रचण्ड तेजस्वी बन जाने पर दिन भी बहुत बड़ा हो गया ॥ ४२ ॥ स्पर्शं खरोष्णं किल सोढुमक्षमा करैः कठोरैः क्वथितं विवस्वतः । आमूलमुत्सर्पि मृणालविग्रहा मुमोच चाल्पेन पयः सरोजिनी ॥४३॥ कोमल मृणाल शरीरवाली और इसीलिये सूर्य के अत्यन्त उष्ण स्पर्श को सहने में असमर्थ कमलिनी ने सूर्य की गरम किरणों से खौलने वाले और जड़ के आसपास ही फैलने वाले थोड़े से पानी को भी छोड़ दिया ॥ ४३ ॥ जग्मुर्युवानो न तथाऽतिनिर्वृतिं सगन्धसारैर्घनसारशीकरैः । स्नानोत्थितप्राणसमास्तनान्तरप्रसक्तिशीतैर्जलबिन्दुभिर्यथा ॥४४॥ युवकों को चन्दन और कपूर के लेप से उतनी शान्ति नहीं मिली जितनी उन्हें स्नान करके निकली हुईं प्रियतमाओं के स्तनों पर लगे हुये जलबिन्दुओं के शीतल स्पर्श से मिली ॥ ४४ ॥ अश्रान्तनिष्यन्दिजलार्द्रकञ्चुकप्रसन्नपीनस्तनकुम्भविभ्रमम् । धारागृहे रागभृतो मृगीदृशां विलोकयन्तो दिवसानयापयन् ॥४५॥ फौव्वारों के नीचे बैठ कर निरन्तर बरसने वाले जल के कारण गीली चोलियों में से स्पष्ट प्रतीत होने वाले मृगनयनियों के सुडौल स्तनों की शोभा को देख-देख कर प्रेमी युवकों ने गरमी के दिन व्यतीत किये ॥ ४५ ॥ पीताः पुरश्चण्डरुचो मरीचिभिर्निसर्गरूक्षैश्च समीरणैस्ततः । निःशेषितापाः सततं विगाहनै र्जलाशयाः कर्दमशेषतां ययुः ॥४६॥ सरोवरों के जल को पहले तो प्रचण्ड सूर्य की किरणों ने पिया, फिर स्वभाव से ही रूखे गरम पवनों ने पिया, फिर बचा-खुचा जल प्राणियों के निरन्तर स्नान करने के कारण समाप्त हो गया और उनमें कीचड़ ही शेष रह गया ॥ ४७ ॥ आरूढहर्म्याणि हिमाम्बुनिःसृतिप्रकामरम्ये मिथुनानि रात्रिषु । शीतांशुकांतोपलकुट्टिमोदरे शिरीषपुष्पास्तरणे स्म शेरते ॥४७॥ गरमी की रातों में पतिपत्नी महलों के ऊपरी भाग में चन्द्रकान्त मणियों से जड़े हुये फर्श पर, जो (चन्द्रोदय के कारण) बहने वाले शीतल जल से अत्यन्त आनन्ददायक बन रहा था, शिरीष पुष्पों का बिस्तर बिछा कर सोते थे ॥ ४७ ॥ (४३) मृणालशरीरा नलिनी आमूलमल्पेनाल्पतया उत्सर्पि विसारि पयोऽपि मुमोच ।
पञ्चदशः सर्गः १७३ पान्थो युवा पाटलपुष्पमुद्गतं मनोभुवो गन्धवहं स्म मन्यते । तन्निर्गता गन्धवहाः सुगन्धयोऽप्यमूर्च्छयन् मानसमस्य यन्मुहुः ॥४८॥ युवक पथिक ने गुलाब के विकसित पुष्प को कामदेव के अभिमान को धारण करने वाला माना क्योंकि उसमें से निकलने वाले (उसका स्पर्श करके आने वाले) सुगन्धित पवनों ने भी उसके मन को बार बार मूच्छित कर दिया ॥४८॥ झङ्कारिणः क्वापि गता मधुव्रताः स्वनप्रसङ्गोऽपि पिकस्य न क्वचित् । धिग् दैवमाम्रस्य फले पचेलिमे शुकस्य काकस्य च तुल्यभागिता ॥४९॥ (वसन्त में) गूँजनेवाले वे भ्रमर (अब ग्रीष्म में) पता नहीं कहाँ चले गये और अब तो कहीं कोयल की कूक भी सुनाई नहीं देती । धिक्कार है उस विधाता को जो आम के पके फल में तोते को और कौवे को बराबर भाग दे रहा है ! ॥४९॥ भ्राम्यन् पिपासुः पथि मारवे मुहुर्मरीचिकावोचिनिरुद्धनिर्गमे । अम्भोविहीने गहने तपोरयैः पपात सिन्धाविव विक्लवोऽध्वगः ॥५०॥ गर्मी के वेग से गहन, जलविहीन, मारवाड़ के रेतीले मार्ग में, जिसमें से मृगमरीचिका की लहरों के कारण निकलने का कोई चारा नहीं था, घूमता हुआ प्यासा पथिक व्याकुल होकर गिर पड़ा, मानों समुद्र में कूद पड़ा हो ॥५०॥ भ्रान्त्वाऽतिदूरं तरुगुल्मसंवृतं मृगः समासाद्य मितं पयः क्वचित् । आवृत्य तस्थौ तृषितोऽपि कातरां शनैश्चलन्तीं प्रतिपालयन् मृगीम् ॥५१॥ बहुत दूर तक इधर-उधर दौड़धूप करने वाले एक हिरण को किसी झाड़ी के नीचे थोड़ा-सा पानी मिल गया । प्यासा होने पर भी वह धीरे-धीरे चलने वाली (प्यास से) व्याकुल मृगी की प्रतीक्षा करते हुये उस जल को ढक कर बैठ गया ॥५१॥ एकस्य पाथोजदलस्य पार्श्वतो निलीय नेतुं तपतीव्रमातपम् । छायामदीर्घामपि सेवितुं समं रथाङ्गयुग्मं यतते स्म मौग्ध्यतः ॥५२॥ एक कमलदल के पास छिप कर, भयंकर गर्मी को बिताने के लिये, चकवा-चकवी का जोड़ा, मूढ़ता के कारण, उसकी छोटी-सी छाया में बराबर बराबर बैठने का यत्न कर रहा था ॥५२॥ कुञ्जोदरे वा तरुकोटरे वा निलीय कुत्रापि विनीय वासरम् । अस्तं गते घर्मघृणौ शनैः शनैः विनिर्ययौ कौशिकवत् पृथग्जनः ॥५३॥ किसी कुञ्ज के भीतर अथवा किसी वृक्ष की कोटर में छिप कर और किसी प्रकार दिन भर बिता कर, ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के अस्त हो जाने पर, तुच्छ पुरुष, उल्लुओं की तरह, धीरे धीरे बाहर निकले ॥५३॥ सूक्ष्मान्तरीये जघने घनस्तनी सहा न वोढुं रशनाकलापकम् । उत्फुल्लमल्लीकुसुमस्त्रजः परं नितम्बशोभां नितरामुपानयत् ॥५४॥ विशाल स्तनवाली कामिनी ने, पतले वस्त्र से शोभित नितम्ब पर करधनी का भार न सह सकने के कारण, विकसित मल्लिका के पुष्पों की माला से ही अपने नितम्ब की शोभा बढ़ाई ॥५४॥ (५३) घर्मघृणौ ग्रीष्मर्तुसूर्ये ।
१७४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स्वेदोदबिन्दुस्तिमितं मृगीदृशो वपुर्वहन्त्यास्तपतापनिःसहम् । गाढं ललाग स्फुटरागि कञ्चुकं स्वत्याजनत्रस्तमिव स्तनद्वये ॥५५॥ ग्रीष्म की गरमी को न सह सकने वाले सुकुमार शरीर वाली मृगनयनी की पसीने की बूंदों से गीली और इसलिये प्रकटित राग (लाली; अनुराग) वाली चोली, उतार कर फेंक दिये जाने के भय से, स्तनों से कस कर चिपक गई ॥५५॥ ग्रीष्मानुरोधादनुभूय भूपतिः स वारिधारा जलयन्त्रनिर्गताः । वारां विहारैश्चकमे निषेचनं विलासिनीनां करयन्त्रधारया ॥५६॥ ग्रीष्म के कारण राजा ने फौव्वारों से निकलने वाली जल की धाराओं का सेवन करके, जल-क्रीड़ा द्वारा करयन्त्र की धारा से कामिनियों को भिगोने की इच्छा की ॥५६॥ हंसान् हसन्त्यो गमनैरथालसैः सखीकरालम्बनलब्धसाहसाः । पेतुः पतङ्गांशुनिपातकातरास्तरङ्गिणीं त्रस्तकुरङ्गलोचनाः ॥५७॥ अपनी मन्द चाल से हंसों की हंसी उड़ाने वाली और भयभीत हिरणों की सी आँखों वाली तथा सूर्य की किरणों के गिरने से व्याकुल स्त्रियों ने, सखियों के हाथों के सहारे के कारण साहस करके, नदी में प्रवेश किया ॥५७॥ आकर्ण्य तारं कलनूपुरध्वनि पुराङ्गनानां पतगाः सितच्छदाः । आपेतुरुत्तानितदीर्घकन्धराः स्वयूथ्यनादभ्रमतः ससम्भ्रमाः ॥५८॥ उन रमणियों के सुन्दर नूपुरों की उच्च ध्वनि को सुनकर, अपने झुण्डों के शब्द के भ्रम से, सफेद पंखों वाले हंस, चकित होकर और अपनी लम्बी गर्दनें तान कर, आये ॥५८॥ सीमन्तिनीनां कलमेखलारवैर्जितस्वराः सारसपत्रिपंक्तयः । द्रागेव जग्मुः सलिलाशयान्तरं पराभवोद्भूतह्रियैव ताडिताः ॥५९॥ रमणियों की रशनाओं के सारसों के स्वरों को जीतने वाले स्वरों से परास्त होकर सारस पक्षियों की पंक्तियाँ मानों पराजय की लज्जा के कारण शीघ्र जलाशय के भीतर घुस गईं ॥५९॥ दूरादहंपूर्विकया समागतास्तटावधि प्रौढकुतूहलेरिताः । तोयावगाहे क्षणजातसम्भ्रमा नतभ्रुवस्तद्विपरीततां दधुः ॥६०॥ अत्यन्त कुतूहल से प्रेरित हुई रमणियाँ दूर से तट तक तो "मैं पहले चलूँ", "मैं पहले चलूँ" इस प्रकार की स्पर्धा से आईं, किन्तु जल में उतरने के समय, क्षण भर चकित होकर, "तुम पहले उतरो", "तुम पहले उतरो" कहने लगीं ॥६०॥ कामं समर्थापि पुरो नितम्बिनी नितम्बदघ्नेम्भसि साध्वसादिव । हस्तावलम्बे दयितस्य सस्पृहा निवर्तितुं सम्बवृते पराङ्मुखी ॥६१॥ नितम्ब तक आने वाले जल में उतरने के लिये समर्थ होने पर भी कोई कामिनी, प्रियतम के हाथ के सहारे को पाने की इच्छा के कारण, मानों भय से विमुख होकर लौटने लगी ॥६१॥
पञ्चदशः सर्गः १७५ कान्तेन सिक्तं प्रथमं पृथुस्तनी विपक्षमालोक्य विवृद्धवेपथुः । शीतातिरेकं प्रतिपाद्य कोपना जवादुदस्थाज्जलवेणिमध्यतः ॥६२॥ प्रियतम ने पहले सपत्नी पर जल छिड़का, यह देखकर किसी विशाल स्तनवाली कामिनी को क्रोध से रोमाञ्च हो गया और वह काफी सर्दी लगने का बहाना बना कर वेग से जल के प्रवाह से बाहर जाने के लिये उठ खड़ी हुई ॥ ६१ ॥ कान्ताभिषेकाय पुरः समुद्यता भुजद्वयाऽऽन्दोलननर्तितस्तनी । दोर्मूललोलेक्षणमेनमुन्मुखी विलोक्य भूयिष्ठमसिञ्चदक्षिणी ॥६३॥ प्रियतम पर दोनों हाथों से जल फेंकने के कारण भुजाओं के हिलने से नाचने वाले स्तनों वाली रमणी ने जब मुँह उठा कर देखा कि प्रियतम तो उसकी भुजाओं के मूल पर दृष्टि जमाये हैं, तो उसने प्रियतम की आँखों पर गहरा पानी फेंकना प्रारम्भ किया ॥ ६३ ॥ लग्नं कुचे केसरमम्बुजन्मनो विदूरयामीति नखक्षतस्पृशम् । सीत्काररुद्धस्मितमाक्षिपत् प्रियं सरोरुहाक्षी कटुसाचिवीक्षणैः ॥६४॥ 'तुम्हारे स्तन पर कमल का केसर लग गया है, इसे हटा देता हूँ'—यह कहकर नखक्षत का स्पर्श करने वाले प्रियतम पर, कमलनयनी ने, जिसकी मुस्कान को सीत्कार ने रोक दिया था, बनावटी क्रोध से टेढ़ी नजर डाली ॥ ६४ ॥ गत्वा कियद्दूरमुदीक्ष्य कौतुकाद् ग्रहीतुकामा कमलानि कामिनी । आलम्बितुं नालमुदग्रनालकं विदूनपाणिः परिगाढकण्टकैः ॥६५॥ कोई कामिनी कुतूहलवश कमलों को देख कर उनको तोड़ने के लिये कुछ दूर तक गई, किन्तु उठे हुये कमल-नाल के घने काँटों से हाथ छिलने के कारण उसे नहीं पकड़ सकी ॥ ६५ ॥ विम्बाधराक्रान्तिवितीर्णवेदनैर्निरुध्यमाना परितो मधुव्रतैः । त्रासादिव स्रस्तदुकूलमाकुला प्रियं सपत्नीपुरतोपि सस्वजे ॥६६॥ बिम्बाधर पर आक्रमण से कष्ट देने वाले भ्रमरों से चारों ओर घिरी हुई कामिनी ने, जिसका दुकूल गिर गया था, भय से घबरा कर सपत्नी के सामने ही प्रिय का आलिंगन कर लिया ॥ ६६ ॥ कस्याश्चिदम्भःस्नपितं नतभ्रुवः क्षणादसंलक्षितसूक्ष्मकञ्चुकम् । वक्षोजयुग्मं द्रुतहेमपूर्णयोर्ववाह कान्तिं किल काचकुम्भयोः ॥६७॥ किसी सुभ्रू के स्तन, जिनकी पतली चोली, कुछ समय के लिये, पानी से भींग जाने के कारण दिखाई नहीं दे रही थी, पिघले हुये सोने से भरे हुये काच के घड़ों के समान लगे ॥ ६७ ॥ दष्टाधरा मुग्धवधूर्मधुव्रतैः प्रियेण साकूतसहासमीक्षिता । तत्कालयोग्यप्रतिपत्तिकातरा विनष्टबाधेव नतानना स्थिता ॥६८॥ किसी मुग्धा को, जिसके अधर को भ्रमरों ने काट लिया था, प्रियतम ने हँस कर साभिप्राय देखा, इसलिये उस समय क्या करना चाहिये यह न सोच सकने के कारण, वह नीचा मुख करके इस प्रकार खड़ी हो गई मानों उसे पीड़ा ही न हो रही हो ॥ ६८ ॥
१७६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धारातिपाताच्चकिता कृशोदरी करेण यावत् पिहिताननेक्षणा । तावत् प्रियः पार्श्वगतां तथापरामसिञ्चदाशुस्मितपूर्वमम्बुभिः ॥६९॥ प्रियतम द्वारा फेंके गये जल की अधिक धाराओं के गिरने से चकित कृशोदरी ने जैसे ही अपने हाथों से मुँह और आँखें ढक लीं वैसे ही प्रियतम ने पास में खड़ी दूसरी प्रिया को, मुस्कुरा कर, शीघ्र पानी से सींचना शुरू किया ॥ ६९ ॥ दन्तच्छदं दन्तपदैर्यावकं गतानुलेपौ नखरक्षतैः स्तनौ । रागेण वीताञ्जनमीक्षणद्वयं व्यरोचयद् वारिचयो वरस्त्रियाः ॥७०॥ जिस प्रकार प्रियतम (चुम्बन के समय) प्रिया के अधर की लाक्षादिजन्य लालिमा को अपने दाँतों से हटा देता है, स्तनों के (चन्दन केसर आदि के) लेप को नखक्षत से दूर कर देता है और नेत्रों के अञ्जन को (चुम्बन, करस्पर्श आदि से) मिटा देता है, उसी प्रकार नदी के जल ने भी श्रेष्ठ काम