भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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त्रयोदशः सर्गः १४९ कर रखा था) परास्त करके और शीघ्र ही, जैसे भगवान् विष्णु ने नरकासुर को दूर भगा दिया था वैसे ही, मालवा के सुलतान को दूर भगाकर, कूटयन्त्र बनाने में निपुण कारीगरों द्वारा निर्मित और जंगल के कारण दुर्गम तथा कठिन मार्ग वाले कोटा नामक भीषण दुर्ग को अपने अधिकार में कर लिया ॥७६॥ विस्रस्तैः केशहस्तैर्नवसलिलभुवां विभ्रमं दर्शयन्त्यः शम्पाः सम्पादयन्त्यो दिशि दिशि कनकस्निग्धगौरैः प्रतीकैः। धाराभिर्बाष्पवारां धरणिधरधुनीधोरणीः पूरयन्त्यः क्लान्ताः कान्तारसीमन्यहितयुवतयः प्रावृषन्ति स्म यस्य ॥७७॥ अपने बिखरे हुये केशपाशों से नवीन मेघों की छटा दिखलाने वालीं, अपने सोने जैसे चम- चमाते हुये अंगों से सारी दिशाओं में बिजलियाँ चमकाने वालीं और अपने आँसुओं की धाराओं से पर्वतों की नदियों के प्रवाह को पूर्ण करने वालीं तथा जंगलों में घूमने के कारण थक जाने वाली