भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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त्रयोदशः सर्गः १४७ सञ्चिकाय समर्थोऽपि पुमर्थोत्पादने स्वयम् । स वाहिनीपरीवारं व्यवहाराय वीरहा ॥६८॥ स्वयं पुरुषार्थ प्राप्ति के लिये समर्थ होने पर भी वीरों को परास्त करने वाले सुर्जन ने व्यवहार का निर्वाह करने के लिये सेना का संग्रह किया ॥६८॥ भवन्ति शक्तयस्तिस्रः क्ष्माभृतां जयहेतवः । चतुर्थी शक्तिरेतस्य विष्णुभक्तिरजायत ॥६९॥ राजाओं की विजय का कारण तीन शक्तियाँ (प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मंत्र-शक्ति) हुआ करती हैं, किन्तु सुर्जन के पास इन तीनों से विशिष्ट विष्णुभक्ति रूपी चौथी शक्ति भी थी ॥६९॥ दूनानन्दनिदानेन नन्दनन्दननन्दिना । दीतनादनुदाऽनेन ददे दानं दिने दिने ॥७०॥ पीडित जनों को आनन्द देने वाले, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने वाले और दीनों के आर्तनाद को नष्ट करने वाले सुर्जन प्रतिदिन दान देते थे ॥७०॥ न केवलं कुलायातामयं वृन्दावतीं पुरीम् । सुदुर्गाण्यपि दुर्गाणि चकार करसात् कृती ॥७१॥ सुर्जन ने, केवल परम्परा से चली आने वाली वृन्दावती (बूंदी) नगरी को ही आधीन नहीं किया, किन्तु अन्य कई दुर्गम दुर्गों को भी अपने वश में कर लिया ॥७१॥ सर्वाशाः परिपूरयन् वसुचयैः पद्माकरालम्बनैः सूरः शूरजनश्च तुल्यमुदयं यातः प्रतापोन्नतौ । सूरः पर्वणि सङ्गतः परमवत्येकं द्विजाधीश्वरं नित्यं शूरजनो धिनोति शतशस्तादृग्द्विजाधीश्वरान् ॥७२॥ कमलों के समूह का आलम्बन लेने वाले किरण-समूहों से सारी दिशाओं को व्याप्त करने वाला सूर्य और लक्ष्मी के कोश का आलम्बन लेने वाले धनसमूहों से सारी दिशाओं को परिपूर्ण करने वाले राजा सुर्जन, दोनों ही प्रतापोन्नति के उदयाचल पर समानरूप से आरूढ़ हुये; किन्तु सूर्य तो केवल अमावास्या के दिन ही चन्द्रमा (द्विजाधीश्वर) से मिलकर उसकी रक्षा करता है, लेकिन राजा सुर्जन ने नित्य ही सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों (द्विजाधीश्वर) का संग करके उनको प्रसन्न किया ॥७२॥ (६८) संचिकाय संजग्राह । (७०) दीनानां नादं नुदति दूरीकरोतीति दीनानादनुत् तेन । (७२) पर्वणि अमायाम् ।

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