भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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पृष्ठ 172

१४६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पृथुलं पृथिवीभारं वहन्नेष न खिद्यताम्। कन्धरायाः परीणाहमिति तस्याऽतनोद् वयः ॥६१॥ युवावस्था ने उनके कंधों को विशाल बना दिया ताकि उन्हें भूमि का विपुल भार वहन करने में कष्ट न हो ॥६१॥ स्वच्छन्दं रमतामत्र रमया सहितो हरिः। विशालमिति वक्षोऽस्य सदृक्षो विदधे विधिः ॥६२॥ विष्णु के मित्र ब्रह्मा ने सुर्जन का वक्षःस्थल विशाल बनाया ताकि उसमें विष्णु भगवान् लक्ष्मी के साथ स्वच्छन्द रमण कर सकें ॥६२॥ प्रायो मदनिदानं स्यादन्येषामध्यमं वयः। तेनव नीतमेतस्य विनयप्रह्रतां वपुः ॥६३॥ और लोगों के लिये युवावस्था प्रायः मादक सिद्ध होती है, किन्तु सुर्जन के शरीर को उसी युवावस्था ने विनय से नम्र बना दिया ॥६३॥ धर्म एवाऽभवत् तस्य प्रणयः सर्वतोमुखः। अतस्तदनुवृत्यैनमन्ववर्तत मन्मथः ॥६४॥ सुर्जन की धर्म में ही सर्वतोमुखी प्रीति हुई, अतः कामदेव भी उनमें धर्मानुकूल रीति से ही रहते रहे ॥६४॥ शौर्यसाहससत्वानि तस्य नैसर्गिकाण्यपि। पर्याप्ति प्रापयामास शैशवाच्चरमं वयः ॥६५॥ शैशव के बाद आने वाले यौवन ने सुर्जन के स्वाभाविक बल, साहस और पराक्रम को पूर्ण बना दिया ॥६५॥ तत्र तत्र तता रीतिररातिततितुत्तरा । तारितार्तातुरातीतरुता रतिरा तत ॥६६॥ इसके बाद (ततः) सुर्जन ने सब जगह (तत्र तत्र), शत्रुओं के समूह की अत्यन्त कष्ट देने वाली (अरातिततितुत्तरा), पीड़ितों का उद्धार करने वाली (तारितार्ता) सर्वथा सम्पन्न (आतुरातीत) एवं फलीफूली (तरुता) तथा आनन्ददायिनी (रतिरा) रीति को विस्तृत किया (तता) ॥६६॥ उचिते समये शूरः संश्रित्योदयभूभृतम् । प्रथीयसा प्रतापेन प्राप सर्वोज्ज्वलां श्रियम् ॥६७॥ उचित समय पर (राजतिलक के समय) सुर्जन ने, उदयाचल परं चढ़कर उज्ज्वल तेज से सारी दिशाओं को प्रकाशित करने वाले सूर्य के समान, उन्नति शिखरारूढ़ होकर अपने महान् प्रताप से सबको उज्ज्वल बनाने वाली शोभा प्राप्त की ॥६७॥ (६६) ततः तदनन्तरं तत्र तत्र विभिन्नस्थलेषु अरातिततितुत्तरा अरातीनां ततिमतिशयेन तुदति इत्यर्थः, तारितार्ता तारिता आर्ताः यया सा, आतुरातीतरुता आतुरतामतीता सर्वथा सम्पनेत्यर्थः तरुता द्रुमत्वं छायाफल- प्रदानादिना यस्यां सा अतिशयेन फलितेत्यर्थः, रतिरा रतिं राति ददाति आनन्दप्रदेत्यर्थः, रीतिः तता विस्तुता ।