सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् न परं निजवंशस्य सोऽभूदालम्बनं शिशुः। कलिना क्लिश्यमानस्य धर्मस्याऽपि महामनाः ॥४६॥ महान् आत्मा वाला वह बालक केवल अपने वंश का ही आलम्बन नहीं हुआ, किन्तु कलियुग द्वारा सताये गये धर्म का भी आलम्बन हुआ ॥४६॥ पुरा देवान् पुरोडाशैः पुरुभिः पूरयत्यसौ। इतीव मुदितो जातः प्रदक्षिणशिखः शिखी ॥४७॥ उस बालक ने पूर्वजन्म में बहुत से पुरोडाश (हव्य विशेष, सोमरस, हुतशेष) से देवताओं को तृप्त किया था इसलिये उसके जन्म के समय अग्निदेव प्रसन्न होकर दक्षिण ज्वाला से प्रज्वलित थे (अग्नि का दक्षिण ज्वाला से जलना शुभ शकुन है) ॥४७॥ तस्य जन्मनि संभूतैः शुभवादित्रनिःस्वनैः। पूरिता हरितो हर्षात् प्रसन्नमुखतां दधुः ॥४८॥ उसके जन्म के समय बजने वाले शुभ बाजों के शब्दों से पूरित होकर दिशायें हर्ष से प्रसन्न- मुख हो रही थीं ॥४८॥ शूरः स्वकुलपद्मानां शूरोऽसौ रणधर्मयोः। इति शूरजनं नाम्ना तमाहुः सूरयः शिशुम् ॥४९॥ वे शिशु अपने कुल-कमल के लिये सूर्य (शूर) थे और युद्ध में तथा धर्म में वीर (शूर) थे, इसलिये बुद्धिमान् पुरुष उन्हें 'शूरजन' (सुर्जन) नाम से पुकारते थे ॥४९॥ शुद्धसंस्कारसंभेदादथ सातिशयां दधे। अर्जुनप्रभवः शोभां मुकुरो मार्जनादिव ॥५०॥ विशुद्ध संस्कारों के संसर्ग से अर्जुनपुत्र सुर्जन की शोभा अत्यन्त बढ़ गई थी, जैसे माँजने से शीशे की चमक बढ़ जाती है ॥५०॥ प्रतिपत्तिर्नृणां तुल्या प्रतिपत्तिथिमाश्रिते। सुधामहसि तस्मिंश्च सुधामहसितस्मरे ॥५१॥ प्रतिपदा (द्वितीया) तिथि के उदीयमान अमृत-वर्षी नव चन्द्रमा को और अपनी आभा से कामदेव का उपहास करने वाले शिशु सुर्जन को लोग समान समझते थे ॥५१॥ विद्याः कुलोचितास्तेन गुरुणा गुरुणार्पिताः। प्रज्ञाबलेन बालेन सहस्रशिखरीकृताः ॥५२॥ मेधावी बालक सुर्जन ने पूज्य गुरु द्वारा सिखाई गईं कुलोचित विद्याओं को अपनी प्रतिभा से हज़ार गुना बना दिया ॥५२॥