भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

११८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नदीं तिलद्रोणिमदीनसत्वः स तां जगाहे गहनप्रवाहाम् । यस्याः स्पृशन् पावनमम्बुबिन्दुं पापोऽपि तापत्रितयं जहाति ॥२७॥ पराक्रमी राजा ने गहरे प्रवाह वाली तिलद्रोणि नदी में स्नान किया, जिस नदी के पवित्र जलबिन्दु का स्पर्श करके पापी भी त्रिविध ताप (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) से मुक्त हो जाता है ॥२७॥ स्फुरन्महानीलमणीमनोज्ञं कदम्बमालाकलितोपकण्ठम् । सुपर्णसम्पादितसौम्यपादच्छायं मयूरच्छदचित्रमौलिम् ॥२८॥ उपात्तरत्नैः कटकैरशून्यं पीताम्बरोत्तङ्गकलेवराढ्यम् । मुखानिलापूरितवेणुरन्ध्रनिनादसंमोहितवन्यरामम् ॥२९॥ श्रियं दधानं भृगुपादजानां हिरण्यगर्भं दधतं तथान्तः । विलोकयामास स पारियात्रं गिरि मुरारातिमिवाऽवनीशः ॥३०॥ देदीप्यमान नीलम मणियों से मनोहर अथवा देदीप्यमान नीलमणि के समान श्याम कान्ति से शोभित ('नीलमणि' भगवान् कृष्ण का नाम भी है), कदम्बमाला से शोभित कण्ठ वाले, अपने वाहन गरुड़ में प्रतिबिम्बित सुन्दर पैरों की कान्ति वाले, मयूरपंख की शोभा को मस्तक पर धारण करने वाले, हाथों में रत्नजड़ित कड़े पहनने वाले, उन्नत शरीर में पीताम्बर (पीला रेशमी वस्त्र) धारण करने वाले, मुख की वायु से बजाई गई मुरली के छेदों से निकलनेवाली ध्वनि से गोपियों का मन मोहित करने वाले, महर्षि भृगु के पादप्रहार जन्य चिह्न को लक्ष्मी के समान वक्षःस्थल पर धारण करने वाले और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को अपने नाभि-कमल के अन्दर धारण करने वाले भगवान् कृष्ण के समान, देदीप्यमान नीलम मणियों से मनोहर, कदम्ब वृक्षों की पंक्ति से शोभित उपत्यका वाले, सुन्दर पत्तों वाले वृक्षों की घनी छाया से शोभित, अपने शिखर पर नाचने वाले मयूरों के रंग-बिरंगों पंखों से सुन्दर, रत्नों की खान वाले मध्यभाग से युक्त, उच्च शिखरों पर छाये हुए पीले आकाश से शोभित, गुफाओं से निकलने वाले वायु से बजाये गये बाँसों के छेदों से निकलने वाली ध्वनि से वन की स्त्रियों को मोहित करने वाले, तटहीन प्रताप के पास उगने वाले वृक्षों की शोभा को धारण करने वाले और अपने गर्भ में सोने की खान को धारण करने वाले पारियात्र (अरावली) पर्वत को हम्मीरदेव ने देखा ॥२८-३०॥ सात्राजितीसौहृदभङ्गभीरोः प्राक् पारिजातं हरतो मुरारेः । पुलोमजावर्धितमत्सरेण वृत्रद्विषा यत्र रणः प्रवृत्तः ॥३१॥ प्राचीन काल में, सत्राजित् की पुत्री सत्यभामा के प्रणयभंग के भय से, स्वर्ग से पारिजात हर लाने वाले भगवान् कृष्ण से, अपनी पत्नी शची द्वारा बढ़ाये गये क्रोध वाले इन्द्र ने इस पारि- यात्र पर्वत पर युद्ध छेड़ा था ॥३१॥ (२८) सुपर्णानि सुन्दराणि वृक्षपत्राणि । सुपर्णः गरुत्मान् । (२९) कटकं कराभरणमद्रिनितम्बश्च । अम्बरमाकाशं वस्त्रञ्च । (३०) भृगुः महर्षिभृगुः अतटप्रपातश्च । (३१) सात्राजिती सत्राजितस्य कन्या कृष्णपत्नी सत्यभामा ।