सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः ११७ उसी प्रकार सूर्य भी दिन पर प्रजा को अपने करों (किरणों) का सहारा देकर सायंकाल करों को समेट लेते थे। अतः सूर्य हम्मीर के प्रतिद्वन्द्वी हुए। इसलिये हम्मीर के प्रताप ने मित्र (सूर्य) को प्रतिपक्षी होने के कारण शत्रु के समान अपने गुणों (रस्सों) से बाँध लिया अर्थात् हम्मीर के प्रताप के आगे सूर्य भी फीका पड़ गया) ॥२०॥ समाप्तकृत्यः प्रशमादरोणां नृपः स्वपुर्यामनयन् नयज्ञः । कालं कियन्तं किल यन्त्रितोऽसौ समुत्सुकानां प्रणयात् प्रियाणाम् ॥२१॥ शत्रुओं का दमन कर देने के कारण कार्य से निवृत्त नीति-कुशल राजा ने, अत्यन्त उत्सुक प्रियाओं के प्रेम-बन्धन के कारण, कुछ समय अपनी नगरी में बिताया ॥२१॥ पुरो हितेन स्वपुरोहितेन पुरस्कृतैर्भूमिमुरैः परीतः । नृपः प्रतस्थे सहपट्टराज्ञ्या स पट्टनाख्यं पुटभेदनं तत् ॥२२॥ सदा हित करने वाले राजपुरोहित जिनके प्रमुख थे ऐसे ब्राह्मणों से घिरे हुए राजा हम्मीरदेव ने अपनी पटरानी के साथ पट्टन (केशवराय पाटन) नामक नगर की ओर प्रस्थान किया ॥२२॥ ययुश्च तस्यानुपदं सदस्याः सदोशितुश्चित्तविदो वयस्याः । मन्त्रप्रधानाः सचिवास्तथान्ये नियोजिताः कोशगृहाधिकारे ॥२३॥ उनके पीछे-पीछे सभासद, श्रेष्ठ स्वामी की चित्तवृत्ति को जाननेवाले मित्र, मन्त्रकुशल मन्त्रीगण और कोषाधिकारीगण चले ॥२३॥ निरामया नीरधितोरजाताः समोरिता वल्लभपालमुख्यैः । जग्मुर्युवानः शतशो विनीता जवेन वाहा जितवैनतेयाः ॥२४॥ समुद्रतट पर उत्पन्न होने वाले और अपने वेग से गरुड़ को भी जीतनेवाले सैकड़ों जवान और निरोगी घोड़े अपने प्रिय सक्टरों से प्रेरित होकर विनयपूर्वक चले ॥२४॥ उत्तुङ्गतप्ताजितशैलशृङ्गं मातङ्गसैन्यं शनकैः प्रतस्थे । कलिङ्गराजेन कलिप्रशान्त्यै बलीयसोऽमुष्य बलीकृतं यत् ॥२५॥ अपनी ऊँचाई से पर्वतों के शिखरों को मात करनेवाली हाथियों की सेना, जिसे कलिंग देश के राजा ने कलह (युद्ध) की शान्ति (सन्धि) के लिए बलवान् हम्मीरदेव को भेंट किया था, धीरे-धीरे चली ॥२५॥ अथापतत् पत्रिरजवैः स वाहैस्तीरं तिलद्रोणितरङ्गवत्याः । तरङ्गसङ्गत्वरगन्धवाहस्निग्धीकृतच्छायतमालमालम् ॥२६॥ पक्षियों के समान वेग से हवा में उड़ने वाले घोड़ों से युक्त राजा हम्मीरदेव तिलद्रोणि (दूणी) नदी के, लहरों का आलिंगन करने वाले वायु के कारण स्निग्धच्छाया वाले तमाल वृक्षों की पंक्ति से शोभित तीर पर पहुँचे ॥२६॥ (२५) कलिः कलहः । बलीकृतमुपहारीकृतम् ।