सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् समुद्रनेमिं स विजित्य वीरः कृत्वाऽवनीशान् करदान् क्रमेण । उपाद्रवद् वाजिबलेन दृप्यद्वरूथिनीकांस्तरसा तुरुष्कान् ॥१५॥ वीर हम्मीरदेव ने समुद्र-रशना पृथ्वी को जीतकर क्रमशः राजाओं को कर देनेवाला बनाया और अपनी अश्व-सेना द्वारा गर्वयुक्त सेना वाले यवनों को वेग से खदेड़ भगाया ॥१५॥ शकान् निराकृत्य बकानुकारान् स्वपौरुषेणैव स राजहंसः । पद्माकरं शीलितसाधुचक्रं सुखेन दिल्लीनगरं जगाहे ॥१६॥ जिस प्रकार राजहंस बगुलों को भगा कर साधु पुरुषों द्वारा सेवित तथा कमलों से सुशोभित सरोवर में विहार करता है, उसी प्रकार हम्मीर रूपी राजहंस ने अपने पराक्रम से यवन-रूपी बगुलों को भगा कर साधु पुरुषों के समूह से सेवित और लक्ष्मी से सुशोभित दिल्ली नगर पर अधि- कार कर लिया ॥१६॥ सैन्यानि विद्राव्य स यावनानि दूरन्तमांसीव समुद्ध