भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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एकादशः सर्गः १११ तार्क्ष्यस्य पक्षातिरयात् पतिष्णोः सुरेन्द्रनागस्य शरीरभारात् । अवाप्तभङ्गानि यदस्य शृङ्गाण्यतोऽरुणन्नाहणवर्त्म शैलः ॥३२॥ झपटने वाले गरुड़ के पंखों के वेग से और इन्द्र के ऐरावत हाथी के शरीर के बोझ से इस पारियात्र पर्वत के शिखर टूट गये थे, यही कारण था कि इस पर्वत ने सूर्य के मार्ग को नहीं रोका ॥३२॥ हृत्वा यशोभिः सह वृत्रशत्रोः सुरद्रुमालीं सुरभिं सभार्यः । यस्मिन् विशश्राम भवश्रमार्तविश्रामभूमिर्भगवान् मुकुन्दः ॥३३॥ वृत्रशत्रु इन्द्र के यश के साथ-साथ उसके सुगन्धित पारिजात वृक्ष को हर कर, सत्यभामा के साथ भगवान् कृष्ण ने, जो स्वयं मुकुन्द (मोक्षदाता) होने के कारण संसारदुःख से पीड़ित मनुष्यों की विश्रामभूमि हैं, इस पारियात्र पर्वत पर विश्राम किया था ॥३३॥ स भूभृतं भूमिभृतां वरीयान् निषेवितं नाकसदां निकायैः । बभ्राम बिभ्राणमनल्पतीव्रतपोजुषां पावनपर्णशालाः ॥३४॥ राजाओं में श्रेष्ठ हम्मीरदेव, देव-वृन्दों से सेवित तथा उग्र तप करने वाले ऋषियों की पवित्र पर्णकुटियों को धारण करने वाले उस पारियात्र पर्वत पर घूमे ॥३४॥ तस्यान्तरे शान्तरजाः स राजा सुदुर्भालोकनमन्यलोकैः । व्यलोकयद् बिल्वपलाशमूले बिल्वेश्वरं वल्लभमीश्वरायाः ॥३५॥ तत्पश्चात् रजोगुण को जीतने वाले राजा हम्मीर ने, अन्य पुरुषों के लिये दुर्लभ-दर्शन पार्वती- प्रिय बिल्वेश्वर महादेव के, जो एक विल्ववृक्ष की जड़ के पास, विराजमान थे, दर्शन किये ॥३५॥ विडौजसं वीर्यवता विजित्य महं महीध्रस्य महामहिम्नः । विधित्समानेन सनातनेन यः स्थापितः पावितविश्वलोकः ॥३६॥ महा बलवान् सनातन पुरुष भगवान् कृष्ण ने , इन्द्र को जीत कर, विजयोत्सव द्वारा महान् महिमा वाले पारियात्र पर्वत का गौरव बढ़ाने के निमित्त, विश्व को पवित्र करने वाले बिल्वेश्वर महादेव को वहाँ स्थापित किया था ॥३६॥ विधाय भक्त्या विधिवत् सपर्यां प्रजेश्वरः पञ्चमुखस्य तस्य । वितीर्य तीर्थोचितभूरिदानमानन्दयद् ब्राह्मणवर्गमग्र्यम् ॥३७॥ राजा हम्मीरदेव ने उन बिल्वेश्वर महादेव की भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा की और तीर्थो- चित विपुल दान देकर प्रथमवर्ण ब्राह्मण-वर्ग को आनन्दित किया ॥३७॥ ततः पुरं षट्पुरनामधेयमध्यास्त विध्वस्ततमोविकारः । यदाश्रयाद् बुद्धिभृतां नराणां षड्वैरिणो न स्वपुरं विशन्ति ॥३८॥ तत्पश्चात् अपने तमोगुण (और अज्ञान) के विकार को नष्ट कर देने वाले हम्मीरदेव षट्पुर (खटकड़) नामक नगर में पहुँचे जहाँ रहने वाले बुद्धिमान् पुरुषों के शरीर में षड् वैरी (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य रूपी छ शत्रु) प्रवेश नहीं कर पाते ॥३८॥