सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स पट्टनाख्यं नगरं पटीयः फलप्रकर्षे विहितक्रियाणाम् । अलञ्चकाराशु हृतान्तरायः सुनीतिवर्त्मैव मनःप्रसादः ॥३९॥ जिस प्रकार (सत्वगुण जन्य) मनःप्रसाद विघ्नों को दूर करके सुनीतिमार्ग को अलंकृत करता है, उसी प्रकार विघ्नों को दूर करने वाले एवं सत्वगुणसम्पन्न राजा हम्मीर ने विहित कर्मों का उत्तम फल देने में निपुण पट्टन (केशवराय पाटन) नामक नगर को शीघ्र ही अलंकृत किया ॥३९॥ सुराङ्गनावर्जितपारिजातप्रसूनपर्याप्ततरङ्गशोभा । चर्मण्वती शर्ममयप्रवेणी प्रवीणयामास यशांसि यस्य ॥४०॥ (स्नान करने के लिये आई हुई) स्वर्ग की देवियों द्वारा लाये गये पारिजात पुष्पों से जिसकी लहरों की शोभा बढ़ रही है ऐसी मंगलमय प्रवाह वाली चर्मण्वती (चम्बल) नदी हम्मीरदेव के यश को अपने कल-कल शब्दों द्वारा मानों वीणा बजा कर गाया करती है ॥४०॥ चर्मण्वतीवारिणि धर्मपत्न्या समं समाप्याऽभिषवं स वीरः । संसिद्धिदात्रीं विमलोपचारैरानर्च मृत्युञ्जयमञ्जुमूर्तिम् ॥४१॥ वीर हम्मीर ने अपनी धर्मपत्नी के साथ चर्मण्वती के जल में स्नान करके उत्तम सिद्धि देने वाली मृत्युंजय महादेव की सुन्दर मूर्ति की शुद्ध उपचारों से पूजा की ॥४१॥ भासामथो भर्तरि सोपरागे विश्राणनेषु प्रथितानुरागः । अन्यैरतुल्योऽपि तुलामुदारः सधर्मदारः सुखमारुरोह ॥४२॥ उस समय सूर्यग्रहण होने पर, दान देने में अत्यन्त अनुरागी उदार हम्मीरदेव, अन्य-पुरुषों से अतुलनीय होने पर भी, अपनी धर्मपत्नी के साथ सुख से तुला पर चढ़े ॥४२॥ स्वच्छत्वसाद्गुण्यसुवृत्तताभिर्मुक्तामणीनां गुरुवंशजानाम् । साम्यं समीचीनमनेन तावत् परन्तु नाऽसौ नृपतिः सरन्ध्रः ॥४३॥ स्वच्छता, सद्गुणता (मोती उत्तम गुण अर्थात् सूत्र में पिरोये जाते हैं; हम्मीर में उत्तम गुण थे), सुवृत्तता (मोतियों में सुन्दर गोलाई होती है; हम्मीर में सच्चरित्रता थी) आदि के कारण उत्तम वंश में उत्पन्न होने वाले मोतियों में (जो तुला के दूसरे पलड़े में चढ़ाये गये थे) और उत्तम वंश में उत्पन्न हम्मीरदेव में तुलना के लिये समानता उचित थी, किन्तु केवल एक अन्तर था—वह यह कि मोती 'सरन्ध्र' (छेद वाले) थे और हम्मीर के राज्य में कोई 'रन्ध्र' (छेद या कमी) नहीं था ॥४३॥ कामं महार्घैरपि गौरवाढ्यैर्वज्रैः समग्रा तुलना न राज्ञः । स केवलं वैरिणि वज्रतुल्यो मित्रेऽतिमात्रं मृदुलस्वभावः ॥४४॥ (तुला के दूसरे पलड़े पर जो हीरे चढ़ाये गये थे उन) बहुमूल्य और भारी वज्रों (हीरों) में और अमूल्य एवं गौरवान्वित हम्मीर में सम्पूर्ण समानता नहीं थी क्योंकि हम्मीर केवल शत्रुओं के लिये ही वज्रतुल्य थे, किन्तु मित्रों के लिये अत्यन्त कोमल थे ॥४४॥ (४२) उपरागो ग्रहणम् । (४४) वज्रमिन्द्रायुधं हीरकञ्च ।