सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् से अन्ध (ग्रस्त) होकर (अज्ञानान्ध तामसी कंजूस की तरह) अपने करों (किरणों; हाथों) को खींच लिया, किन्तु दूसरे ने (हम्मीर ने) मुक्तकर होकर (हाथ खोलकर) दान दिया (अथवा कर माफ़ कर दिया) ॥५१॥ हम्मीरदेवेन वितीर्यमाणाः पयः सुरभ्यः करिणो मदाम्भः । यत् तत्त्यजुस्तेन सरित्समूहः शरत्कृतं कार्श्यमपोहति स्म ॥५२॥ हम्मीरदेव द्वारा दान दी गई गायों से और दान दिये गये हाथियों से, क्रमशः जो दूध की और मद-जल की धारायें बहीं उनके कारण नदियों की, शरद्-ऋतु में होने वाली जल की कमी, दूर हो गई ॥५२॥ उपप्लवोऽभूत् स कृतोपकारः कुर्वन् शरीरावरणं खरांशोः । तुरङ्गदानावसरे न यस्मात् सस्मार देवोऽयममुष्यरथ्यान् ॥५३॥ ग्रहण के समय राहु ने सूर्यबिम्ब को ढक लिया था, किन्तु सूर्य ने इसे अपना उपकार समझा क्योंकि इस आवरण के कारण घोड़ों के दान के समय हम्मीरदेव को सूर्य के घोड़े याद नहीं आये ॥५३॥ गजाधिपाः केऽपि हयाधिपत्यमन्ये गता भूपतयः परे च । किमन्यदस्मिन् वितरत्यभीक्ष्णं वित्तेशतां विप्रगणाः प्रपन्नाः ॥५४॥ हम्मीर देव के निरन्तर दान देते रहने के कारण कोई गजपति, कोई अश्वपति और कोई भूपति बन गये; अधिक क्या कहें, विप्र लोग भी वित्तेश (कुबेर) बन गये ॥५४॥ मुक्ताकलापे पतिता द्विजानां प्रसूनदामभ्रमतो द्विरेफाः । विलेपनामोदविलीनचित्ता नोत्पेतुरुच्चैरपि वार्यमाणाः ॥५५॥ ब्राह्मणों के मोतियों के हार पर पुष्पमाला के भ्रम से भ्रमर टूट पड़े और चन्दन के तिलक की सुगन्ध से मस्त होकर जोरों से हटाने पर भी नहीं हटे ॥५५॥ कस्यापि कुत्रापि कदाचिदेव याल्पं प्रसूते स्म वसु प्रसन्ना । वनीयकानामवनिस्तदानीं सा रत्नसूः सर्वत एव जाता ॥५६॥ जो भूमि प्रसन्न होने पर किसी किसी के लिये कहीं-कहीं कभी-कभी थोड़ा सा धन उत्पन्न करती है वह भूमि उस समय याचकों के लिये भी सदा और सर्वत्र रत्नों को उत्पन्न करने लगी ॥५६॥ अशेषदानानि स दीनबन्धुरशेषयित्वा स्वयमेव विज्ञः । न्यवेदयद् वेदविदोऽवदातानुपक्रमायाऽद्भुतसप्ततन्तोः ॥५७॥ बुद्धिमान् और दीनवत्सल हम्मीरदेव ने, जब सब प्रकार के दान दिये जा चुके तब वेदज्ञ और पुण्यात्मा ब्राह्मणों से अद्भुत यज्ञ का आयोजन करने की प्रार्थना की ॥५७॥ (५३) उपप्लवो ग्रहणम् ।