सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः १२३ कुण्डान्यखण्डानि समेखलानि समानि सम्यग् विरचय्य विप्राः । आरेभिरे कोटिमखं कृतज्ञा मुहूर्तमासाद्य मनोऽनुकूलम् ॥५८॥ वेदविधि में निपुण ब्राह्मणों ने अपने मन के अनुकूल शुभ मुहूर्त में अखण्ड, बराबर और मेखला युक्त यज्ञ-कुण्ड बनाकर कोटियज्ञ (वह यज्ञ जिसमें एक करोड़ आहुतियाँ दी जाती हैं) प्रारम्भ किया ॥५८॥ विशुद्धवर्णोज्वलसामिधेनीसंस्कारमासाद्य समेधमानः । समिद्भिराज्यैरपि हूयमानः स सप्तजिह्वोऽपि सहस्रजिह्वः ॥५९॥ वेद की विशुद्ध वर्णों से उज्ज्वल 'सामिधेनी' नामक ऋचाओं से (वे ऋचायें जिनका पाठ करके समिधाओं की आहुतियाँ दी जाती हैं) संस्कृत होकर समिधाओं के हवन से प्रवृद्ध एवं हव्य पदार्थ और घृत की आहुतियों से प्रज्वलित यज्ञ के अग्निदेव 'सप्तजिह्व' कहलाने पर भी 'सहस्र- जिह्व' होकर (सहस्र ज्वालाओं के साथ) प्रकट हुए ॥५९॥ विशुद्धमन्त्रेरितहव्यगन्धं घ्राणोपयुक्तं हरितां दधानः । वितानवैश्वानरगन्धवाहः सुधाभुजां संसदमाचकर्ष ॥६०॥ विशुद्ध वेदमन्त्रों द्वारा यज्ञाग्नि में हवन किये गये हव्य की दिशाओं की नासिका को अत्यन्त प्रिय लगनेवाली सुगन्ध को धारण करने वाला यज्ञाग्नि का हव्यगन्धित वायु देवताओं की सभा को (आहुतियाँ ग्रहण करने के लिये) खींच लाया ॥६०॥ तस्मिन् मखे मेध्यतमोऽन्तरिक्षे समन्ततो यः समियाय धूमः । तमङ्कपालोकृतमिन्दुनाङ्कनाम्ना प्रसिद्धिं जनता निनाय ॥६१॥ उस यज्ञ में यज्ञाग्नि का जो अत्यन्त पवित्र धूम आकाश में चारों ओर फैला उसे चन्द्रमा ने अपनी गोद में समेट लिया । जनता ने उसे चन्द्रबिम्ब के 'अंक' (चिह्न) के नाम से प्रसिद्ध किया ॥६१॥ ते वीतविघ्नं विरचय्य वह्नौ वषट्कृतैः प्रीणनमाप्तविप्राः । समापितं संसदि सप्ततन्तुं प्रदक्षिणीचक्रुरपेतशङ्काः ॥६२॥ सत्यवादी ब्राह्मणों ने निर्विघ्न आहुतियों से अग्निदेव को प्रसन्न करके यज्ञ समाप्त हो जाने पर निःशंक होकर यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा की ॥६२॥ एवं स दाने विविधेऽध्वरे च निविष्टचेता विरतान्यकृत्यः । गतान्यनेकान्यपि वासराणि विशालकीर्ति र्न विदाञ्चकार ॥६३॥ इस प्रकार विविध दान देने में और यज्ञ कराने में चित्त लगाने के कारण महा यशस्वी हम्मीरदेव अन्य सब कार्य भूल गये और अनेक दिन व्यतीत हो जाने का भी उन्हें ध्यान नहीं रहा ॥६३॥ (५९) समित्प्रक्षेपेण वह्निप्रज्वलने या ऋक् प्रयुज्यते सा सामिधेनी।