भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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११० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् संभावनीयेपि नृणामपाये तदांगमाय त्वरितो नहि स्यात् । कुत्रापि दैवस्य विपर्ययेण पराजयः स्याद् विजयस्य हेतुः ॥१४२॥ विनाश की संभावना होने पर भी उसे बुलाने के लिए जल्दी नहीं करना चाहिये। हो सकता है कि विधाता की इच्छा से पराजय ही विजय का कारण बन जाय ॥१४२॥ वदन्तमेवं मृदु वन्दिनं तं प्रीत्या च नीत्या च नितान्तरम्यम् । प्रत्याहताशेषमनोरथोऽसौ प्रत्याह कृच्छ्रेण पतिः प्रजानाम् ॥१४३॥ इस प्रकार प्रीति और नीति से अत्यन्त मनोहर एवं मधुर वचन बोलनेवाले चारण को पृथ्वी- राज ने, जिनकी सारी इच्छाएं मर चुकी थीं, बड़ी कठिनाई से यह उत्तर दिया ॥१४३॥ मग्ने निकारायतनीरराशौ प्रेमानुबन्धं मयि सन्दधानः । भवानभाणीद् यदिदं विचार्य श्रद्धालुतां तत्र भजेन्न मेऽन्तः ॥१४४॥ अपमान के इस विस्तृत समुद्र में निमग्न मुझ पर उत्कट प्रेम दिखाते हुए आपने जो कुछ विचार पूर्वक कहा उसके प्रति मेरे मन में श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो पा रही है ॥१४४॥ सैन्याः सुहृद्बन्धुजनाः सहाया धनान्यथान्यान्यपि साधनानि । कार्यानुबन्धीनि भवन्ति यानि मय्येकमप्यस्ति किमङ्ग ! तेषाम् ? ॥१४५॥ प्रिय मित्र ! कार्य को सफल करने के लिए सेना, मित्रगण, बन्धु-वर्ग, सहायक, धन तथा अन्य जिन-जिन साधनों की अपेक्षा होती है उनमें से एक भी इस समय मेरे पास नहीं है ॥१४५॥ आस्तामनास्थावसतिः क्रियासु साधारणी विप्रतिपत्तिरन्या । स्वभावसिद्धं बत देहिनां यत् तदप्यपास्तं नयनद्वयं नः ॥१४६॥ अस्तु, इन बातों में सन्देह न भी हो, तो भी एक और साधारण शंका है। वह यह कि लोगों के जो स्वाभाविक दो नेत्र होते हैं मुझ अभागे के तो वे भी नष्ट कर दिए गए हैं ॥१४६॥ यथा विपाणेरिह शिल्पकार्ये यथा कदर्यस्य यशोऽर्जनेषु । तथा ममान्धस्य मनोरथोऽयं वीरोचितायां बत ! वैरशुद्धौ ॥१४७॥ अतः मुझ जैसे अन्धे के लिए वीरोचित वैर शुद्धि की इच्छा करना वैसा ही असंभव है जैसा कि हस्तहीन पुरुष के लिये शिल्पकार्य करना अथवा कापुरुष के लिये यश प्राप्त करना ॥१४७॥ ज्ञातप्रभावः पुनराह बन्दी मन्दीकरिष्यन् नृपतेरनास्थाम् । मतं मदीयं मतिमन् निशम्य रोचेत चेत् तत् त्वरितं विधेयम् ॥१४८॥ पृथ्वीराज के प्रभाव को जाननेवाले चारण ने राजा के अविश्वास को कम करने के लिए फिर यों कहा—बुद्धिमान् नरेश ! मेरी बात सुनें और यदि पसन्द आ जाय तो उसे शीघ्र पूरा करें ॥१४८॥ अनन्यसाध्यः किल शब्दवेधी बाणस्तवाधीनतरस्तरस्वी । तेनैव मन्मन्त्रसमेधितेन समीहितं साधय सावधानः ॥१४९॥ आपके पास वह वेगशाली शब्दवेधी बाण है जो औरों के पास नहीं है। मेरी बुद्धि द्वारा रचे गए जाल से परिवर्धित शक्ति वाले उस बाण से आप, सावधान होकर अपनी इच्छा पूर्ण कीजिये ॥१४९॥