सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें२० इस अमूल्य ग्रन्थरत्न के इतिहास पक्ष का इतिहास के विद्वान् और साहित्यिक पक्ष का साहित्य के विद्वान् विवेचन करें। मेरा कार्य तो इस महान् महाकाव्य को प्रकाश में लाना है। इस ग्रन्थ को हिन्दी अनुवाद और संस्कृत टिप्पणी सहित प्रकाशित करके मैंने संस्कृत-साहित्य और हिन्दी-साहित्य की कुछ सेवा करने का प्रयास किया है। कुछ शब्द अपने अनुवाद के विषय में भी कह दूं । अनुवाद अनुवाद ही होता है और उसमें मूल का सौन्दर्य कदापि नहीं आ सकता । अनुवाद भावों का हो सकता है; शब्द-लालित्य का नहीं हो सकता । और फिर प्रत्येक साहित्य की अपनी अपनी परम्परा होती है जिसका सौन्दर्य अनुवाद में नहीं आ सकता। मेरे सामने कठिनाई यह थी कि यदि संस्कृत का शाब्दिक अनुवाद करूँ तो हिन्दी की हत्या होती है और यदि हिन्दी का ध्यान रखूँ तो संस्कृत का यथार्थ अनुवाद नहीं होता । अपने अनुवाद में मैंने संस्कृत और हिन्दी दोनों का ध्यान रखने का प्रयत्न किया है। जो संस्कृत साधारण जानते हैं वे इस अनुवाद की सहायता से श्लोकों को समझ लेंगे और जो संस्कृत बिलकुल नहीं जानते वे भी, केवल अनुवाद ही पढ़ कर, मेरे विचार से, साहित्य का कुछ रसास्वाद ले सकेंगे । सबसे पहले मैं श्रीमान् दानवीर, गुणग्राही, विद्या-प्रेमी और उदार कोटानरेश के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ क्योंकि उन्हीं की कृपापूर्ण आर्थिक सहायता के कारण यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है। इस सत्कार्य में श्रीमान् कोटानरेश के प्रातिस्विक अमात्य और मेरे परम- स्नेहास्पद साहित्य-प्रेमी श्रीमान् आप दलेलसिंह जी साहब ने अत्यन्त सहायता दी है और एतदर्थ उनको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । एक ही आदर्शपुस्तक होने पर पाठसंशोधन आदि का कार्य अत्यन्त जटिल हो जाता है । कहीं कहीं पाठ खण्डित हो रहा है । जो श्लोक आधे से अधिक छूट रहे हैं उनको मैंने वैसे ही रहने दिया है। जहाँ जहाँ कुछ कुछ लेख-त्रुटि हुई है उसे अपनी बुद्धि के अनुसार शुद्ध और पूर्ण कर दिया है। कहीं कहीं जो पाठ मैंने अधिक उचित समझा उसे ही दिया है। पाठ संशोधन और संस्कृत-टिप्पण आदि सत्कार्य में मुझे महामहोपाध्याय वाचस्पति श्रीमान् पण्डित गिरि- धर जी शर्मा चतुर्वेदी और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र कवितार्किकचक्रवर्ती श्रीमान् पण्डित महादेव जी पाण्डेय से अत्यधिक सहायता मिली है। इन दोनों गुरुजनों की मुझ पर पूर्ण कृपा रही है और इन दोनों की सहायता और आशीर्वाद के कारण ही यह ग्रन्थ इतने शुद्ध और सुन्दर रूप में निकल रहा है। मैं इन दोनों गुरुजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रदर्शित करता हूँ । मैं अपने स्नेही श्रीयुत पं० गौरीशङ्कर जी मिश्र और भार्गव भूषण प्रेस के सर्वस्व श्रीयुत पं० पृथ्वीनाथ जी भार्गव को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता क्योंकि इस ग्रन्थ की इतनी सुन्दर छपाई का सारा श्रेय इन सज्जनों को ही है। हिन्दू विश्वविद्यालय, चन्द्रधर शर्मा काशी २५-११-५२