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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 256 में से

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१९ राव सुर्जन के काशी में प्रतिदिन असीम वस्त्र बाँटने के कारण एक स्वतन्त्र भगवान् शिव ही ऐसे बच गये थे जो अपनी आदत से मज़बूर होकर गजचर्म पहनते थे— 'विश्राणयत्यनुदिनं ननु दीनबन्धौ तस्मिन्नसीमवसनान्यविशेषदृष्ट्या। आत्मस्वभावपरतन्त्रतया स्वतन्त्रोऽप्येकः परं पुरहरोऽजनि कृत्तिवासाः ॥' (१९,३४) कवि ने भगवान् शिव की क्या मीठी चुटकी ली है—स्वामी चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो और चाहे कितना ही प्रसन्न क्यों न हो जाय, किन्तु वह अपने वैभव के अनुसार ही पुरस्कार दे सकता है; यही कारण था कि भगवान् शिव ने राव सुर्जन से अत्यन्त प्रसन्न होकर भी उनको पहिनने के लिये गजचर्म और सवारी के लिये बैल ही दिया ! — 'भूरिप्रसादसुमुखोऽपि सदीश्वरोऽपि भृत्यं यथाविभवमेव पुरस्करोति । यद् वाहनं वृषभमम्बरमैभकृत्तिं तस्मै ददे प्रमुदितोऽपि स कृत्तिवासाः ॥' (१९, ४४) राव भोज के शुभ्र यश को प्रसन्न किन्नर कामिनियां विन्ध्याचल पर बैठ कर गाती है; इसलिये वह यश शुभ्र हिम के समान जम कर विन्ध्याचल पर व्याप्त हो गया है; शायद यही कारण है कि पिता के पास रहने की इच्छुक भगवती विन्ध्यवासिनी, विन्ध्याचल को हिमालय समझ कर उसे छोड़ना नहीं चाहती— पिण्डीभूततुषारपाण्डरतरे यस्यानुविन्ध्यं यशः- स्तोमे किन्नरकामिनीभिरभितः प्रोद्गीयमाने मुदा । प्रालेयाचलशङ्कया पितृगृहावासाय बद्धस्पृहा शैलेन्द्रं तमपोहितुं न सहते मन्ये नगेन्द्रात्मजा ॥' (२०, ५६) ओज और शब्दाडम्बर का नमूना भी देखिये— 'कोदण्डं गाण्डिवस्याप्युपचितयशसचण्डतां खण्डयन्तं दोर्दण्डोद्दण्डदर्पप्रकटितविकटध्वानधन्यं धुनानः । काण्डीरः काण्डपातैरथ रिपुरथिनां खण्डयन् मुण्डजालं । तस्तार स्फारधारोद्धुररुधिरधुनीधोरणीभिर्धरित्रीम् ॥' (४, ३९) विविध स्वरों, शब्दों और नादों के वर्णन में हमारे कवि ने कमाल किया है। तृतीय सर्ग में (श्लोक ४६–५०) देवी के मन्दिर में होने वाली विविध ध्वनियों और शब्दों का वर्णन ; अट्ठारहवें सर्ग में (श्लोक ४५–४९) वृन्दावन में भ्रमरों की गूँज, मयूरों की केका, कोयलों की काकली, शुकसारिकाओं की कथा, कपोती का घूत्कार, सारसों और हंसों के शिञ्जित तथा दात्यूह, कबूतर, तीतर आदि के स्वरों का वर्णन; एवं सत्तरहवें सर्ग में (श्लोक ८–१०) युद्ध में होने वाले विविध घोषों का वर्णन बहुत सुन्दर है। ऊपर दिये गये उद्धरणों से पाठकों को हमारे कवि की प्रतिभा का कुछ परिचय प्राप्त हो जायगा। यदि इसका विस्तृत वर्णन और आलोचना की जाय तो भूमिका का कलेवर बहुत बढ़ जायगा। महाकवि चन्द्रशेखर को संस्कृत साहित्य में निःसन्देह बहुत उच्च स्थान प्राप्त होगा। 0

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